- बिहार विधानसभा के बजट सत्र में विपक्ष की भूमिका कमजोर और प्रभावहीन नजर आ रही है.
- नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी से विपक्ष की दिशा और ताकत पर नकारात्मक असर पड़ा है.
- तेजस्वी सदन से दूर रहने के पीछे संगठन मजबूत करने और चुनावी हार के बाद रणनीति तय करने के कारण माने जा रहे हैं.
बिहार विधानसभा के बजट सत्र 2026 में इस बार वो सियासी तपिश गायब है, जो आमतौर पर सदन की पहचान रही है. लोकतांत्रिक ढांचे में बजट सत्र सरकार की जवाबदेही तय करने का सबसे बड़ा मंच होता है. लेकिन इस बार विपक्ष की भूमिका बेहद फीकी और प्रभावहीन नजर आ रही है. सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्षी बेंचों का खाली रहना या वहां मौजूद सदस्यों की चुप्पी यह संकेत दे रही है कि विपक्ष फिलहाल दिशाहीनता से जूझ रहा है.
इस पूरे परिदृश्य में सबसे चौंकाने वाली बात नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति है. तेजस्वी न केवल आरजेडी के सबसे बड़े चेहरे हैं, बल्कि पूरे विपक्ष के ऊर्जा केंद्र भी माने जाते हैं. उनकी गैर-मौजूदगी का सीधा असर सदन की सक्रियता पर पड़ा है. जहां पहले जनहित के मुद्दों पर सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाता था, वहीं अब चर्चाएं महज औपचारिकता बनकर रह गई हैं. बिना 'कैप्टन' के विपक्षी टीम बिखरी हुई नजर आ रही है. इससे यह सवाल उठने लगा है कि चुनाव के बाद क्या महागठबंधन सदन में भी मौके गंवा रहा है.

तेजस्वी यादव ही सदन से हुए गायब
तेजस्वी यादव न केवल नेता प्रतिपक्ष हैं, बल्कि विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा भी हैं. सदन में उनकी मौजूदगी विपक्ष को दिशा और ताकत देती है. जब वे सदन में नहीं रहते, तो बाकी विधायकों की आवाज भी कमजोर पड़ जाती है. यही वजह है कि इस बार विपक्ष सरकार पर वैसा दबाव नहीं बना पा रहा, जैसा आमतौर पर बजट सत्र में देखा जाता है.
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि तेजस्वी यादव की गैर मौजूदगी केवल एक व्यक्तिगत कारण नहीं, बल्कि इसका राजनीतिक असर भी पड़ता है. जब नेता प्रतिपक्ष सदन में सक्रिय नहीं होते, तो सरकार को अपने फैसलों पर जवाब देने की मजबूरी भी कम हो जाती है. इसका फायदा सीधे तौर पर सत्ता पक्ष को मिलता है.

सदन से क्यों दूर है तेजस्वी यादव
तेजस्वी यादव के सदन से दूर रहने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. कुछ लोगों का मानना है कि चुनाव के बाद वे संगठन को मजबूत करने और भविष्य की रणनीति बनाने में लगे हैं. वहीं, कुछ यह भी कहते हैं कि महागठबंधन अभी चुनावी हार के बाद अपनी दिशा तय करने की कोशिश में है, जिसका असर सदन में दिख रहा है. इसका सीधा असर यह हुआ है कि सरकार को विधानसभा में ज्यादा विरोध का सामना नहीं करना पड़ रहा. बजट की मांगों पर चर्चा अपेक्षाकृत शांत तरीके से हो रही है. जिन मुद्दों पर पहले हंगामा और तीखी बहस होती थी, वे इस बार उतनी मजबूती से नहीं उठ पा रहे हैं.
विपक्ष की कमजोर भूमिका, क्यों है चिंता का विषय
विपक्ष की कमजोर भूमिका जनता के लिए भी चिंता का विषय है. लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार की गलतियों की ओर ध्यान दिलाना और जनता की आवाज बनना होता है. अगर विपक्ष ही शांत रहे, तो सरकार पर निगरानी भी कमजोर हो जाती है. ऐसे में जनता के मुद्दे पीछे छूटने का खतरा बढ़ जाता है. तेजस्वी यादव की गैर मौजूदगी का असर विपक्षी कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर भी पड़ रहा है. पार्टी के भीतर यह सवाल उठने लगे हैं कि जब सदन में मजबूती से बात नहीं रखी जा रही, तो आगे की राजनीतिक लड़ाई कैसे लड़ी जाएगी. यह स्थिति लंबे समय तक रही, तो संगठन पर भी असर पड़ सकता है.
हालांकि, महागठबंधन के नेता यह तर्क दे रहे हैं कि विपक्ष का काम सिर्फ हंगामा करना नहीं है. उनका कहना है कि वे सही समय पर मुद्दों को मजबूती से उठाएंगे. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बजट सत्र जैसा बड़ा मंच छोड़ना विपक्ष के लिए नुकसानदेह हो सकता है. कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा के बजट सत्र में विपक्ष की शांति और नेता प्रतिपक्ष की गैर मौजूदगी कई सवाल खड़े कर रही है. क्या महागठबंधन चुनाव के बाद अपनी भूमिका को लेकर असमंजस में है? क्या तेजस्वी यादव की यह दूरी किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में सामने आएंगे. फिलहाल इतना तय है कि सदन में कमजोर विपक्ष का फायदा सरकार को मिल रहा है और लोकतांत्रिक बहस का स्तर भी प्रभावित हो रहा है.
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