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नेपाल चुनाव 2026 में Gen Z के लिए कौन सी पार्टी क्या ऑफर दे रही है, नए बनाम पुराने राजनीतिक दलों की लड़ाई

संगीता थपलियाल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 25, 2026 19:09 pm IST
    • Published On फ़रवरी 25, 2026 19:08 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 25, 2026 19:09 pm IST
नेपाल चुनाव 2026 में Gen Z के लिए कौन सी पार्टी क्या ऑफर दे रही है,  नए बनाम पुराने राजनीतिक दलों की लड़ाई

नेपाल में पांच मार्च 2026 को होने वाले आम चुनाव की तैयारी चल रही है. चुनाव प्रचार और भाषणों से माहौल गरमाया हुआ है. चुनाव प्रचार 17 फरवरी से शुरू हुआ था. चुनाव आयोग के निर्देशों के मुताबिक यह दो मार्च तक चलेगा. संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा (275 सदस्य) के लिए 68 राजनीतिक पार्टियों के 3484 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. इनमें से 165 सदस्य फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली से चुने जाते हैं, यानी इनका चुनाव मतदाता करते हैं. वहीं 110 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से चुने जाते हैं. इसमें पार्टियों को मिले वोट के आधार पर सीटों का आबंटन होता है. 

नेपाली संसद का विघटन वैध या अवैध

नेपाल में पिछले साल आठ और नौ सितंबर को हुए युवाओं के हिंसक आंदोलन के बाद कराए जा रहे हैं. इस आंदोलन को 'जेन जी' का आंदोलन कहा जाता है.युवाओं का प्रदर्शन भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही यह नियंत्रण से बाहर हो गया. बाहरी लोगों के इसमें शामिल होने की वजह से यह हिंसक हो गया था. आठ सितंबर को पुलिस फायरिंग में कई युवा नेपाली मारे गए थे. पुलिस फायरिंग की लोगों ने बड़े पैमाने पर निंदा की थी. इसके अगले दिन कई लोग सड़कों पर उतर आए थे. उग्र भीड़ ने संसद, सुप्रीम कोर्ट और नेताओं की निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया था. कुछ नेताओं के साथ मारपीट भी की गई थी. इसके बाद नौ सितंबर को प्रधानमंत्री ओली ने इस्तीफा दे दिया था.  कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी नेपाल सेना ने अपने हाथ में ले ली थी. नेपाल के इतिहास में पहली बार सेना प्रमुख और राष्ट्रपति सरकार गठन पर वार्ता में शामिल हुए थे. उन्होंने जेन जी आंदोलन के नेताओं से मिलकर अगले प्रधानमंत्री की पहचान की. जेन जी ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री चुना. उन्हें अगला चुनाव कराने का जनादेश दिया गया. प्रधानमंत्री कार्की की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने संसद के निचले सदन को भंग कर पांच मार्च 2026 को अगला आम चुनाव कराने की घोषणा की.

सुशीला कार्की ने 12 सितंबर को पदभार संभाला था. उनकी शुरुआती प्रतिक्रिया मिश्रित रही. नेपाल बार काउंसिल ने सरकार गठन को 'अवैध' और 'असंवैधानिक' बताया. आठ राजनीतिक दलों ने निचले सदन के विघटन को असंवैधानिक मानते हुए फैसले को वापस लेने की मांग की. प्रधानमंत्री कार्की ने स्थिति संभाली और सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं और सभी प्रांतों के मुख्यमंत्रियों से आगामी चुनाव पर विचार-विमर्श के लिए मुलाकात की. कुछ हिचकिचाहट के बाद, निचले सदन में प्रतिनिधित्व रखने वाली 14 पार्टियां पांच मार्च के चुनाव में भाग ले रही हैं. 

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नेपाल के राजनीतिक दलों में हलचल

नेपाली कांग्रेस में शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व को पार्टी के युवा महासचिवों गगन थापा और बिश्व प्रकाश शर्मा ने चुनौती दी. 15 जनवरी 2026 को उन्होंने पार्टी का विशेष आम अधिवेशन बुलाकर गगन थापा को नया पार्टी अध्यक्ष चुना. पार्टी की केंद्रीय समिति ने थापा और शर्मा को पार्टी संविधान के खिलाफ काम करने के आरोप में निष्कासित कर दिया. दोनों गुट चुनाव आयोग के पास मान्यता के लिए गए. आयोग ने थापा गुट को वैध पार्टी के रूप में मान्यता दी. 

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) के नेता पुष्प कमल दहाल प्रचंड ने नवंबर 2025 में 10 अन्य दलों के साथ मिलकर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया. इस बीच ओली दिसंबर 2025 में दोबारा अपनी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का अध्यक्ष चुने गए. इस तरह उन्होंने अपनी पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत की. 

जेन जी का आंदोलन और संसदीय चुनाव

नेपाल की राजनीति में कुछ नई पार्टियां भी उभरी हैं. इनमें कार्की सरकार के पूर्व ऊर्जा मंत्री कुलमान घिसिंग की उज्यालो नेपाल पार्टी, हरका साम्पांग के नेतृत्व वाली श्रम शक्ति पार्टी और दिनेश परसाई की गतिशील लोकतांत्रिक पार्टी शामिल है.

जेन जी आंदोलन की पृष्ठभूमि में यह चुनाव विशेष रूप से दिलचस्प है. बदलते समय के मुताबिक प्रमुख पार्टियों ने उम्मीदवार उतारने में पुराने और युवाओं को तरजीह दी है. नेपाल के चुनाव आयोग के अनुसार, कुल 3406 उम्मीदवारों में से 1056 उम्मीदवार 25 से 40 साल आयु वर्ग के हैं.

राजनीतिक दलों ने जनता से क्या वादे किए हैं

नेपाली कांग्रेस के 49 साल के गगन थापा ने अपने युवा कार्यकर्ताओं में उत्साह भरा है. उनके घोषणापत्र 'प्रतिज्ञा पत्र' का नारा है, 'समृद्ध नेपाल, सम्मानित नेपाली'. इसमें 10 बिंदुओं की योजना का वादा किया गया है. इसमें स्वदेशी भाषाओं, संस्कृति और विरासत पर गर्व, आधुनिकता, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्रीय गरिमा, संतुलित विदेश नीति, सुशासन और आर्थिक विकास पर जोर दिया गया है. जेन जी की भावनाओं के मुताबिक इसमें सत्ता और विशेषाधिकार आधारित प्रभावों को समाप्त करने की बात कही गई है.

ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन (यूएमएल) बीते साल सितंबर में जेन जी के आंदोलन में विवादों के केंद्र में थी, उसने अपने घोषणापत्र में 18 से 28 साल के युवाओं को एक साल तक प्रति माह 10 जीबी मुफ्त इंटरनेट डेटा देने का वादा किया है. युवाओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए उसने 10 हजार डॉलर का कार्ड, सभी क्षेत्रों के श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 25 हजार नेपाली रुपये, तकनीकी उच्च शिक्षा के लिए 20 लाख नेपाली रुपये तक का ब्याज मुक्त कर्ज और अन्य प्रोत्साहनों का वादा किया है. गरीब परिवारों के लिए ऋण माफी और हर साल डेढ़ लाख नौकरियां सृजित करने का भी वादा सीपीएन (यूएमएल) ने किया है. एनसीपी के घोषणापत्र में भी हर साल डेढ़ लाख नौकरियों, अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आईटी, ई-कॉमर्स और शिक्षा व स्वास्थ्य में सुधार का वादा किया गया है.

नई बनाम पुरानी राजनीति की लड़ाई

राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी, जिसका नेतृत्व रबी लामछिने के हाथ में है, उसने काठमांडू के पूर्व मेयर बालेंद्र शाह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है. शाह ने जेन जी आंदोलन का समर्थन किया था. वे इतने आत्मविश्वासी हैं कि वे केपी ओली को उनके पारंपरिक निर्वाचन क्षेत्र झापा-5 में उन्हें चुनौती दे रहे हैं. इस पार्टी ने युवा नेपालियों की कल्पना को अपनी ओर आकर्षित किया है. राष्ट्रीय राजनीति में अपेक्षाकृत नई होने के बावजूद, 2022 के आम चुनाव में इसने संसद में 20 सीटें जीती थीं. पार्टी के घोषणापत्र में '100 सूत्रीय नीतिगत बदलाव' की बात की गई है. इसमें भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति, प्रशासनिक और न्यायिक सुधार, संवैधानिक संशोधन, संघीय और स्थानीय सरकारों से जुड़े राजकोषीय सुधार शामिल हैं. इसमें नेपाली मुद्रा को भारतीय मुद्रा से जोड़े रखने की व्यवस्था की समीक्षा की बात भी कही गई है. वर्तमान व्यवस्था में एक भारतीय रुपया 1.6 नेपाली रुपया के बराबर होता है. यह व्यवस्था 1957 में स्थापित की गई थी ताकि नेपाली अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिल सके.

जैसे-जैसे पार्टियां दृढ़ता के साथ प्रचार कर रही हैं, यह देखना बाकी है कि पुरानी पार्टियां अपने प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बनाए रखने के साथ-साथ अस्थिर मतदाताओं को आकर्षित कर पाती हैं या नहीं. 2021 की जनगणना के अनुसार लगभग 42.5 फीसदी आबादी 16 से 40 साल के बीच की है. 52 फीसदी मतदाता भी इसी आयु वर्ग के हैं. इसके बावजूद नेपाली कांग्रेस, सीपीएन (यूएमएल) और एनसीपी ने नाममात्र के युवा उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. आरएसपी, उज्यालो नेपाल और श्रम शक्ति पार्टी जैसी नई पार्टियों ने बदलती जनसंख्या संरचना और उसकी मांगों के मुताबिक 40 साल से कम आयु के उम्मीदवारों को तवज्जो दी है. क्या यह रणनीति उन्हें अधिक वोट दिला पाएगी, यह कहना कठिन है. क्या पारंपरिक पार्टियों के कार्यकर्ता और वफादार समर्थक नई पार्टियों की ओर रुख करेंगे? पिछले चुनाव में पारंपरिक पार्टियों से मतदाताओं की नाराजगी दिखी थी, जिससे उनका झुकाव आरएसपी की तरफ हुआ था.

दुनिया भर में देखा गया है कि आंदोलनों से उभरने वाली राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं का ध्यान आकर्षित करती हैं. उनका कोई चुनावी इतिहास नहीं होता है और वो जनभावनाओं से लाभ उठाती हैं, जैसे लामिछाने, जिन्हें ओली सरकार ने जेल में डाला था, लेकिन उन्हें जमी-जमाई भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था का शिकार माना गया. नई पार्टियां अच्छा प्रदर्शन कर सकती हैं, लेकिन सरकार गठन में पारंपरिक ताकतों को कितनी चुनौती दे पाएंगी, यह एक अलग सवाल है.

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डिसक्लेमर: लेखक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में पढ़ाती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. 

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