नरेंद्र मोदी ने 10 जून 2026 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ते हुए भारत के सबसे लंबे समय तक सेवारत निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए.यह एक संख्या भर नहीं है, यह एक सभ्यता के करवट लेने की आवाज है. इन बारह सालों को पीछे मुड़कर देखें, तो एक प्रश्न सबसे पहले उठता है, इन वर्षों में भारत की विदेश नीति को चलाने वाला सबसे गहरा आवेग क्या था? नीति-विश्लेषक इसे बहु-संरेखण कहते हैं, रणनीतिकार इसे रणनीतिक स्वायत्तता कहते हैं और आलोचक इसे हिंदुत्व की विदेश नीति में घटाने की कोशिश करते हैं. किंतु इनमें से कोई भी उत्तर पर्याप्त नहीं है. मोदी की विदेश नीति का सबसे सच्चा और गहरा सूत्र इन सब से अधिक मौलिक है, वह है भारतीय सभ्यता की खोई हुई महिमा और गौरव को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पुनः स्थापित करने का संकल्प.
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का इस्तेमाल
यह समझना जरूरी है कि यह संकल्प केवल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का राजनीतिक उपकरण नहीं है. यह एक गहरी, सुसंगत और विकासशील अंतरराष्ट्रीय दृष्टि है, एक ऐसा टेम्पलेट है, जिसके भीतर मोदी की प्रत्येक कूटनीतिक पहल अपना अर्थ पाती है. जब मोदी कहते हैं कि भारत केवल 1947 का इंडिया नहीं, बल्कि हजारों सालों की अटूट सभ्यता-धारा वाला भारत, इस सदी में विश्व का नेतृत्व करेगा, तो यह घोषणा किसी पार्टी के घोषणापत्र से नहीं, किसी सभ्यता के आत्मबोध से निकलती है. और जब इसी दृष्टि को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक के बाद एक साकार होते देखते हैं, तो 12 सालों की विदेश नीति एक सुसंगत, अर्थपूर्ण और ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण आख्यान बन जाती है.
नेहरू ने भी भारत को एक महान देश माना किंतु उनकी दृष्टि में भारत की महानता का स्रोत उसकी आधुनिकता थी, उसकी प्राचीनता नहीं. उन्होंने भारत को एक नवजात राष्ट्र-राज्य की तरह देखा जो अभी-अभी उपनिवेशवाद की बेड़ियों से मुक्त हुआ है. मोदी की दृष्टि इससे मूलतः भिन्न है. उनके लिए भारत कोई नवजात नहीं, वह एक चिरंतन सभ्यता है जो दो-तीन शताब्दियों के पतन के बाद अपनी स्वाभाविक ऊंचाई पर लौट रही है. यही दृष्टिभेद उनकी विदेश नीति को एक अलग चरित्र देता है. नेहरू की विदेश नीति में भारत उपनिवेशवाद के विरुद्ध संगठित नव-स्वतंत्र देशों का प्रवक्ता था; मोदी की विदेश नीति में भारत उस प्राचीन सभ्यता का प्रतिनिधि है जिसने एक बार विश्वगुरु का दायित्व वहन किया था और जो उसे पुनः वहन करने के लिए तैयार है.
इस सभ्यतागत पुनर्प्रतिष्ठा के संकल्प को संभव बनाने के लिए दो ऐतिहासिक परिस्थितियां एक साथ आईं. भीतर से, 2014 में पूर्ण बहुमत ने वह राजनीतिक शक्ति दी जो दशकों से भारत को नहीं मिली थी, गठबंधनों की विवशता खत्म हुई और दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि से काम करने की स्वतंत्रता मिली. बाहर से, एक बहुध्रुवीय संसार उभर रहा था, जिसमें अमेरिकी एकध्रुवीयता टूट रही थी, चीन आक्रामक रूप से विस्तार कर रहा था और वैश्विक व्यवस्था एक नए स्थापत्य की तलाश में थी. इस रिक्तता में एक सभ्यतागत दृष्टि से लैस भारत के लिए असाधारण अवसर था. मोदी ने इसे पहचाना और भुनाया.
'वसुधैव कुटुम्बकम्' की प्रतिष्ठा
'वसुधैव कुटुम्बकम्' को भारत की विदेश नीति के दर्शन के रूप में स्थापित करना इसी सभ्यतागत पुनर्प्रतिष्ठा की सबसे प्रतीकात्मक और ठोस अभिव्यक्ति है. G20 की थीम 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य', नटराज की प्रतिमा का वैश्विक मंच पर अधिष्ठान, भारत मंडपम का नामकरण, इंडिया के स्थान पर भारत का सचेत प्रयोग, ये सब छोटे-छोटे सांकेतिक निर्णय नहीं हैं. ये एक सुसंगत और सुविचारित सभ्यतागत घोषणा के विभिन्न अंश हैं. जब मोदी संयुक्त राष्ट्र में संगच्छध्वं, संवदध्वं का उद्घोष करते हैं,तो वे हजारों साल पुराने वेदमंत्र को आधुनिक वैश्विक मंच पर लाते हैं. यह केवल वाग्मिता नहीं है. यह एक सभ्यता की यह घोषणा है कि उसके पास देने के लिए अभी भी बहुत कुछ है.
इस सभ्यतागत आत्मबल की सबसे कठिन परीक्षा 2020 में गलवान में हुई. 45 साल में सबसे घातक भारत-चीन सीमा संघर्ष के सामने भारत ने न 1962 जैसी स्तब्धता दिखाई, न अनावश्यक उत्तेजना. सेना ने रणनीतिक चोटियां थामीं, आर्थिक संकेत भेजे गए, सीमा पर बुनियादी ढांचे का अभूतपूर्व विस्तार हुआ और चार साल की दृढ़ कूटनीति के बाद 2024 में देपसांग-डेमचोक में सेनाओं की वापसी हुई. बिना एक इंच जमीन छोड़े हुए, बिना किसी सिद्धांत से समझौता किए हुए. यह उस सभ्यता का आत्मविश्वास था जो जानती है कि वह किसके लिए खड़ी है.
कैसी थी मोदी सरकार की वैक्सीन मैत्री
कोविड-19 महामारी में वैक्सीन मैत्री ने इसी सभ्यतागत दृष्टि का एक और रूप दिखाया. जब समृद्ध देश खुराकें जमा कर रहे थे, तब भारत ने करीब 100 देशों को 30 करोड़ से अधिक टीके दे रहा था. यह देने की वह सभ्यतागत प्रवृत्ति है जो 'अतिथि देवो भव' और दान की परंपरा से आती है. वैक्सीन मैत्री ने सिद्ध किया कि पुनर्जागृत भारत की महानता केवल शब्दों में नहीं, कर्म में भी है.
2023 की G20 अध्यक्षता इस सभ्यतागत परियोजना का सर्वोच्च बिंदु थी. 100 फीसदी सर्वसम्मति से नई दिल्ली घोषणापत्र, वह भी तब जब यूक्रेन युद्ध पर वैश्विक विभाजन गहरा था, असाधारण उपलब्धि है. अफ्रीकी संघ को G20 की स्थायी सदस्यता दिलाना, ग्लोबल साउथ के मुद्दों को एजेंडे के केंद्र में लाना और भारत-मध्यपूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे की घोषणा, ये सब एक ऐसी सभ्यता के स्वाभाविक कदम थे जो उपेक्षितों को स्थान देने और नए मार्ग प्रशस्त करने को अपना धर्म मानती है. वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट के तीन संस्करणों ने 120 से अधिक विकासशील देशों को एक ऐसा मंच दिया जो उनकी आवाज को वैश्विक एजेंडे को आकार देने की शक्ति देता है, यह भी उसी सभ्यतागत दायित्वबोध की अभिव्यक्ति है.
अहिंसा और संवाद की परंपरा
क्वाड और ब्रिक्स में एक साथ सक्रियता इस सभ्यतागत दृष्टि की तार्किक परिणति है. एक सभ्यतागत राज्य किसी एक खेमे का बंधक नहीं बनता, वह सभी के साथ संवाद करता है, किसी का दास नहीं होता. यूक्रेन और ईरान-इजरायल संघर्ष में यही दृष्टि काम आई. जब पश्चिम ने पक्ष चुनने का दबाव डाला, मोदी का उत्तर वही था जो एक शांतिप्रिय सभ्यता का होना चाहिए,''भारत तटस्थ नहीं है, भारत की स्थिति शांति की है.'' यह अहिंसा और संवाद की उसी परंपरा की आधुनिक भाषा है. यूक्रेन ने भारत को अपना प्रमुख मध्यस्थ चुना; रूस ने भारत की भूमिका की सराहना की. संसार एक बार फिर विश्वमित्र की तलाश में भारत की ओर देख रहा है.
ट्रंप 1.0 सधे हाथों से संभाला, चारों रक्षा आधार समझौते, व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी.ट्रंप 2.0 के तूफान में 50 फीसदी टैरिफ और व्यापारिक तनाव में भारत ने वही धैर्य और दूर दीर्घदृष्टि दिखाई जो एक पुरानी सभ्यता की पहचान है. फरवरी 2026 में अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा बनी. चुनौतियां शेष हैं, चीन के साथ संरचनात्मक जटिलता, अस्थिर पड़ोस और बहुध्रुवीय संसार की अनिश्चितताएं. किंतु एक सभ्यता जो हजारों सालों के उतार-चढ़ाव से गुजरी हो, वह अल्पकालिक बाधाओं से विचलित नहीं होती.
कितनी बदली है भारत की विदेश नीति
इन बारह सालों को समग्रता में देखें तो एक बात स्पष्ट है, भारत की विदेश नीति में जो परिवर्तन आया है, वह केवल रणनीतिक है, केवल आर्थिक है या केवल राजनीतिक है, यह कहना अधूरा होगा. यह परिवर्तन मूलतः सभ्यतागत है. यूपीआई का वैश्विक विस्तार, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्यात, ये सब उस प्राचीन सभ्यता के आधुनिक उपकरण हैं, जो भारत एक बार फिर संसार को देने की स्थिति में है.
इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब कोई सभ्यता अपनी नियति के प्रति सचेत होती है और उसे साकार करने के लिए उठ खड़ी होती है. मोदी के 12 साल ऐसे ही एक क्षण के बारह अध्याय हैं. यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है, महानता की पुनर्प्रतिष्ठा एक पीढ़ी का काम नहीं होती. किंतु यह यात्रा शुरू हो चुकी है. यह आरंभ अपने आप में ऐतिहासिक है.
(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)