वह समय पास आ गया है जब जैन साधु-साघ्वियां अगले चार महीनों के लिए किसी एक जगह ठहर जाएंगे. इस जैन उपक्रम को चातुर्मास या वर्षावास कहा जाता है. इस दौरान जैन समाज के लोगों को साधु-साध्वियों के सानिध्य में नियमित पूजा-पाठ और धर्मग्रंथों की चर्चा सुनने का मौका मिलता है.
चातुर्मास को धर्मकर्म और धर्मज्ञान की चर्चाओं के लिए बड़ा उर्वरा समय माना जाता है. लेकिन कुछ सालों से इस विशेष कालखंड में पूजा-पाठ की तुलना में धर्मज्ञान की गतिविधियां कम हो चली हैं.लेकिन इस वर्षावास में धर्मज्ञान के क्षेत्र में कुछ नया होने के आसार बन रहे हैं. दरअसल जैन जगत में विद्वानों के बीच एक ऐतिहासिक विचार-विमर्श की योजना बन रही है. विमर्श का विषय है 'णमोकार मंत्र'. इस मंत्र को लेकर जैन परंपरा के लगभग सभी आम्नाय और उनके उपपंथ एकमत हैं. जाहिर है कि ऐसे आयोजन में हर पंथ के साधु-साध्वियों,उन पंथों से जुड़े विद्वानों और श्रावकों की सहभागिता सुनिश्चित करना मुश्किल नहीं होगा.
जैन धर्म का 'णमोकार मंत्र'
भले ही इस मंत्र को कोई 'णमोकार' कहता हो या 'नवकार' या 'नमोकार' कहता हो लेकिन सभी जगह इसका मूल पाठ एक ही है. यानी दिगंबर, श्वेतांबर, स्थानकवासी या श्वेतांबर तेरापंथ किसी भी आम्नाय में कम से कम 'णमोकार मंत्र' के पाठ को लेकर कोई उल्लेखनीय मतभेद नहीं है. अलबत्ता मंत्र के किसी अक्षर की मात्रा या उच्चारण को लेकर कहीं कोई फर्क हो भी तो उसे अब तक विवाद की श्रेणी में रखा नहीं गया है. कहा जा रहा है कि अगर दो हजार साल पहले अपने शुरुआती अभिलेखन के बाद के लंबे दौर में मंत्र की वर्तनी में कहीं कुछ अंतर आ भी गया होगा तो विचार-विमर्श के उपक्रम में वह शोधित हो जाएगा.
दुनिया के हरेक धर्म में मंत्र, प्रार्थना, वंदना, अर्चना आदि के अपने-अपने रूप और अपने अपने कार्यउद्देश्य वर्णित हैं. इनमें ज्यादातर ऐसे मंत्र हैं जिनका आधार श्रृद्धा या आस्था है. लिहाज़ा किसी मंत्र की चमत्कारिता या जादुई प्रभाव पर कोई व्यवस्थित विमर्श नहीं हो सकता. कहते हैं कि आस्था उन्मुखी विषयों पर विमर्श की गुंजाइश बिलकुल भी नहीं होती. लेकिन वैश्विक विद्वत समाज में जैन धर्म को आस्था श्रृद्धा से ज्यादा एक व्यवस्थित दर्शन माना जाता है, इसीलिए उसका हर विषय तार्किक विचार-विमर्श के योग्य माना जाता है. इस लिहाज से जैन मंत्र भी बाकायदा विमर्श या पुनर्निरीक्षण योग्य हैं. यही बात जैन समाज में वैज्ञानिक सोच से संपन्न कुछ श्रावकों के ध्यान में आई है. जैन परंपरा में श्रावक उन्हें कहते हैं जो गृहस्थ होते हैं, जिनका आचार-व्यवहार धर्मोचित होता है और जो अपने धर्मस्थानों आचार्यों और मुनियों और साध्वियों की सेवा में तत्पर रहते हैं.
ऐसे ही जैन श्रावक कुलदीप जैन ने प्रस्तावित विमर्श की संकल्पना की है. वे सत्तर के दशक में आईआईटी कानपुर से पोस्ट ग्रेजुएट हैं. वो सरकारी सेवा में शीर्ष पदों पर रह चुके हैं.उनके मुताबिक 'णमोकार मंत्र' पर विमर्श के सिलसिले में उन्होंने कुछ प्रमुख आचार्यों और जैन विद्वानों से विस्तार से चर्चा की गई है. आमतौर पर सभी की सहमति है कि ज्ञान साधक मुनियों और आचार्यों के सानिध्य में 'णमोकार मंत्र' पर विद्वानों के बीच एक शोधपरक विमर्श आयाजित हो. कुलदीप जैन को दिगंबर परंपरा के प्रमुख आचार्य श्रीसौरभ सागर के दर्शन के दौरान इस परियोजना पर चर्चा करने का अवसर मिला. इस परियोजना के प्रतिवेदन को सुनने के बाद आचार्यश्री ने कहा है कि 'णमोकार मंत्र' के विभिन्न पहलुओं पर अगर विद्वानों के बीच कोई पुनर्निरीक्षण विमर्श होता है तो यह सहस्त्राब्दियों के संदर्भ में एक ऐतिहसिक घटना होगी.
'णमोकार मंत्र'पर व्यस्थित विमर्श
आचार्यश्री ने हाल ही में एक ग्रंथ 'मंगलं पुष्पदन्ताद्यो' की रचना की है. इस ग्रंथ में 'णमोकार मंत्र' के आदि स्वरूप की विस्तृत विवेचना की गई है. इसके साथ ही ग्रंथ में यह भी बताया गया है कि इस मंत्र को प्राचीन काल में पहली बार कब और कहां अभिलेखित किया गया था. विमर्श की प्रस्तावित योजना के सूत्रधार श्रावकों ने श्वेतांबर परंपरा के भी एक आचार्य से संपर्क किया. एकल विहारी रूप में इस समय दक्षिण भारत में गतिमान जैनाचार्य डाक्टर अनविंद मुनि ने भी 'णमोकार मंत्र' पर साद्योपांत विमर्श की योजना को जैन परंपरा के लिए एक ऐतिहासिक पहल बताया है.उनका कहना है कि अगर ऐसे विमर्श में जैन परंपरा के सभी आम्नाायों के विद्वानों की सहभागिता संभव हो सके तो यह पिछली कई सदियों की एक बड़ी धार्मिक घटना होगी.उन्होंने बताया कि श्वेतांबर जैन परंपरा के एक प्रमुख ग्रंथ महानिशीथ में इस मंत्र के प्रारंभिक रूप का उल्लेख है.डाक्टर अनविंद मुनि के मुताबिक कोई डेढ़ हजार साल पहले श्वेतांबर परंपरा की एक कथासाहित्य रचना 'वसुदेवहिण्डी' में भी इस मंत्र के कुछ अंश मिलते हैं. इस मंत्र पर वैज्ञानिक यानी व्यवस्थित विमर्श होगा तो देश दुनिया को इस मंत्र की ऐतिहासिकता का भी पता चलेगा.
'णमोकार मंत्र' की ऐतिहासिकता प्रतिष्ठित विद्वान डॉक्टर नरेंद्र जैन के मुताबिक धर्म और दर्शन के क्षेत्र में आमतौर पर पुरातात्त्विक साक्ष्यों का अभाव रहता है. लेकिन विश्व के प्रतिष्ठित पुरातत्त्ववेत्ताओं ने 'णमोकार मंत्र' के दो हजार साल पहले के शिलालेख खोज निकाले हैं. इन पुरातात्त्विक साक्ष्यों की रोशनी में जैन परंपरा की ऐसी ऐतिहासिक सामग्री पर एक विमर्श कई दशकों से अपेक्षित है. डॉक्टर जैन के मुताबिक दिगंबर परंपरा के सर्वमान्य आदिग्रंथ 'षटखंडागम' में 'णमोकार मंत्र'का विशेष स्थान है. यह विमर्श इसलिए और भी ज्यादा सार्थक हो जाएगा, क्योंकि 'णमोकार मंत्र' पर विमर्श के पार्श्व में 'षटखंडागम' के कुछ पहलुओं पर भी चर्चा होगी.
'णमोकार मंत्र' की सांगीतिक रचनाएं भी विमर्श के दायरे में हैं. अब तक बॉलीवुड के कई बड़े गायकों और संगीतकारों ने इस मंत्र को स्वरबद्ध किया है. इन संगीत रचनाओं की शास्त्रीयता पर एकमुश्त विमर्श का भी विचार है.इस मंत्र के भावानुरूप और मनमस्तिष्क के लिए अधिक प्रभावी संगीत रचना को अभिकल्पित करने के लिए विमर्श के सूत्रधारों ने दिल्ली, वाराणसी और जबलपुर के कुछ प्रशिक्षित और साधक संगीतकारों से भी संपर्क किया है. इन संगीतकारों का कहना था कि जैन परंपरा के ऐसे समय सिद्ध मंत्र की भावानुरूप संगीत रचना के लिए उन्हें इस मंत्र की एक शोधपरक व्याख्या मुहैया कराना जरूरी होगा.
'णमोकार मंत्र' की धुन बनाने की तैयारी
बहरहाल जैन जगत की इस नई हलचल से बहुत संभव है कि जैन समाज को अपने पांच परमेष्ठियों के नमस्कार के लिए 'णमोकार मंत्र' की कोई भावोचित, भावोनुरूप और सम्मोहनीय धुन भी मिल जाए.
जैन जगत से इतर समाज के लोगों में इस मंत्र की विशेषता को लेकर बड़ा कौतूहल रहता है. इस लिहाज से दोहराया जा सकता है कि यह मंत्र जैन परंपरा में पांच परमेष्ठियों को नमस्कार करने का उपक्रम है. इसकी एक सबसे बड़ी विशेषता है कि इन पांचों परमेष्ठियों को उनके व्यक्तिरूप की बजाए उनके गुणरूप को नमस्कार किया जाता है. पहले परमेष्ठी के रूप में किसी तीर्थकर विशेष को नहीं बल्कि सभी अरिहंतों या अरहंतों को नमस्कार किया जाता है. उसके बाद सभी सिद्धों को और फिर सभी आचार्यों फिर उपाध्यायों और उनके बाद लोक के सभी साधुओं को नमस्कार किया जाता है.
कोशिश है कि 'णमोकार मंत्र'पर ऐतिहासिक आयोजन में इस मंत्र के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर विमर्श के लिए नवीनतम शोध निष्कर्षों पर विचार किया जाए.अगर ऐसा हो पाया तो बहुत संभव है कि धर्म के मनोविज्ञान पर कुछ नया जानने को मिले.
(डिस्क्लेमर:लेखक मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय में क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर रहे हैं. उन्होंने सजायाफ्ता कैदियों पर शोध किया. विश्वविद्यालय से निकलकर उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक सेवाएं दीं. वो एनडीटीवी समेत कई दूसरी साइटों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते रहते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)