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ब्लॉग: भारत की विदेश नीति के लिए जापान की अहमियत

डॉ. राजन कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 29, 2025 18:32 pm IST
    • Published On अगस्त 29, 2025 18:02 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 29, 2025 18:32 pm IST
ब्लॉग: भारत की विदेश नीति के लिए जापान की अहमियत

एशिया भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंद्विता के एक रंगमंच के रूप में उभर रहा है. 20वीं सदी के आरंभ में, प्रसिद्ध ब्रिटिश भू-राजनीतिक विचारक हैलफोर्ड मैकिंडर ने कहा था कि जो यूरेशिया पर नियंत्रण रखेगा, वही दुनिया पर राज करेगा. लेकिन अब इस सिद्धांत को संशोधित करने की आवश्यकता है और यह कहा जा सकता है कि जो एशिया पर प्रभुत्व रखेगा, वही 21वीं सदी में दुनिया पर राज करेगा. विकसित हो रही एशियाई भू-राजनीति में, अमेरिका का प्रभाव कम होगा, चीन का प्रभाव बढ़ेगा और भारत निर्णायक भूमिका निभाएगा.

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति और शीत युद्ध के बाद, अमेरिका ने जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान (ASEAN) जैसी एशियाई शक्तियों के साथ गठबंधन करके हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया. अमेरिका और जापान ने इस विश्वास के साथ चीन के आर्थिक विकास में भी योगदान दिया कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण, बीजिंग के राजनीतिक उदारीकरण में योगदान देगा. लेकिन यह नीति बुरी तरह विफल रही और बीजिंग अधिक केंद्रीकृत और सत्तावादी बन गया. चीन को अमेरिकी समर्थन का उद्देश्य तत्कालीन सोवियत संघ और चीन के बीच दरार पैदा करना तथा भारत को नियंत्रित करना भी था.

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लेकिन चीन के प्रति अमेरिका की शीत युद्ध नीति पूरी तरह बदल गई है. आर्थिक और तकनीकी महाशक्ति के रूप में चीन के उदय ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है. 1990 के दशक में जापान दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था हुआ करती थी, लेकिन केवल दो दशकों में ही वह पांचवीं अर्थव्यवस्था बन गई है. चीन की अर्थव्यवस्था जापान की अर्थव्यवस्था से चार गुना से भी ज़्यादा बड़ी है और यहां तक कि भारत ने भी जापान की लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ दिया है.

अपने आर्थिक उत्थान के साथ, चीन ने "अपनी ताकत छिपाओ और समय का इंतज़ार करो" की अपनी पुरानी नीति को त्याग दिया और अपनी ताक़त का प्रदर्शन शुरू कर दिया. दक्षिण चीन सागर में बीजिंग के आक्रामक रुख़, उसकी बेल्ट एंड रोड पहल और उसके व्यापक सैन्यीकरण कार्यक्रमों ने इस क्षेत्र में अमेरिका और जापान के लिए सुरक्षा संबंधी दुविधा पैदा कर दी है.

भारत और जापान ने 2011 में व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (Comprehensive Economic Partnership Agreement) पर हस्ताक्षर किए थे. यह दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते का एक हिस्सा है, जिसमें वस्तुओं के साथ-साथ सेवाओं का व्यापार भी शामिल है. भारत, जापान को उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी उपलब्धियों और उभरते एशियाई सुरक्षा ढांचे में उसकी भूमिका के कारण अनुकूल दृष्टि से देखता है.

इन कुछ घटनाक्रमों ने जापान को पूरी तरह से चिंतित कर दिया है:
उत्तर कोरिया का परमाणु शक्ति के रूप में उदय, रूस और चीन के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग और सुरक्षा गारंटी देने के मामले में अमेरिका की अविश्वसनीयता. इसलिए, जापान को ऐसे नए देशों की आवश्यकता है जो इस क्षेत्र को स्थिर करने में मदद कर सकें.

जापान में भारत को सकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है:
आंशिक रूप से बौद्ध धर्म में निहित सांस्कृतिक संबंधों के कारण, लेकिन उससे भी अधिक भारत की आर्थिक उन्नति, तकनीकी क्षमता, कुशल श्रम शक्ति और भविष्य में संभावित विकास के कारण. दोनों देशों ने उभरते मुद्दों से निपटने के लिए मजबूत द्विपक्षीय और बहुपक्षीय तंत्र विकसित किए हैं. उन्होंने कितनी दूरी तय की है, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद जापान ने उस पर प्रतिबंध लगा दिए थे. लेकिन 2005 में प्रधानमंत्री जुनिचिरो कोइज़ुमी की भारत यात्रा के बाद से, दोनों देश वार्षिक शिखर बैठकें करते हैं.

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तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की 2006 में यात्रा के दौरान इस संबंध को "वैश्विक और रणनीतिक साझेदारी" और 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान "विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी" के रूप में उन्नत किया गया. वार्षिक शिखर सम्मेलनों के अलावा, दोनों देश आपस में विदेश और रक्षा मंत्रिस्तरीय बैठकों के बीच सुरक्षा और रक्षा वार्ता भी करते हैं, जिसे "2+2" प्रारूप के रूप में जाना जाता है. ऐसे बहुत कम देश हैं जिनके साथ भारत के इतने उच्चस्तरीय संस्थागत तंत्र हैं. रूस एक और उदाहरण है.

भारत और जापान ने 2011 में व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (Comprehensive Economic Partnership Agreement) पर हस्ताक्षर किए थे. यह दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते का एक हिस्सा है, जिसमें वस्तुओं के साथ-साथ सेवाओं का व्यापार भी शामिल है. भारत, जापान को उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी उपलब्धियों और उभरते एशियाई सुरक्षा ढांचे में उसकी भूमिका के कारण अनुकूल दृष्टि से देखता है.

2023-24 के दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 23 अरब डॉलर का था. भारत को जापान का निर्यात लगभग 18 अरब डॉलर और आयात लगभग 5 अरब डॉलर था. भारत का व्यापार घाटा लगभग 13 अरब डॉलर का था. पिछले 25 वर्षों में, जापान ने भारत में लगभग 43 अरब डॉलर का निवेश किया है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment) स्रोतों में पाँचवें स्थान पर है. पिछले 3 वर्षों में, जापान से वार्षिक निवेश 2 से 3 अरब डॉलर के बीच रहा है.

ट्रंप की नीतियों के कारण आपूर्ति-श्रृंखला में आए व्यवधान को दूर करने में जापान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. अमेरिका और चीन विश्व के सेमीकंडक्टर और दुर्लभ-पृथ्वी पदार्थों की आपूर्ति बाधित करने की क्षमता रखते हैं. जिस तरह से राजनीति विकसित हो रही है, हम इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकते कि वाशिंगटन और चीन इनकी आपूर्ति जारी रखेंगे. नई दिल्ली और टोक्यो को उच्च गुणवत्ता वाले सेमीकंडक्टर के त्वरित विकास के लिए हाथ मिलाना चाहिए और दुर्लभ-पृथ्वी खनिजों के लिए खदानें हासिल करनी चाहिए.

इसके अलावा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जापान और भारत के लिए ‘मुक्त और खुले नौवहन' (Free and Open Navigation in Indo-Pacific) अत्यंत महत्वपूर्ण है. दक्षिण चीन सागर में 9 डैश-लाइन पर चीन के दावे की कोई अंतरराष्ट्रीय कानूनी वैधता नहीं है और यह उस मार्ग से होने वाले व्यापार को बाधित कर सकता है. भारत और जापान को अमेरिका और आसियान (ASEAN) देशों के साथ मिलकर मुक्त और खुले नौवहन के महत्व को रेखांकित करना जारी रखना चाहिए.

इस संदर्भ में, चतुर्भुज संवाद तंत्र (Quadrilateral Dialogue) एक महत्वपूर्ण मंच बना रहेगा. पूरी संभावना है कि टैरिफ को लेकर अमेरिका और भारत के बीच मौजूदा अड़चनें अस्थायी होंगी.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के पास दो विकल्प हैं:
या तो वह इस क्षेत्र से हट जाए और चीन के लिए जगह छोड़ दे, या चीन के विरोधी देशों के साथ साझेदारी करे.

अधिकांश अमेरिकी विशेषज्ञ और नीति निर्माता हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के निवेश की नीति का समर्थन करते हैं. चीन और अमेरिका के हित इतने भिन्न हैं कि वाशिंगटन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बीजिंग का मित्र नहीं हो सकता. ट्रंप लेन-देन के लिए शी जिनपिंग के साथ बातचीत कर सकते हैं, लेकिन उनके दीर्घकालिक हित स्पष्ट रूप से परस्पर विरोधी हैं. इसलिए, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत अमेरिका और जापान के लिए महत्वपूर्ण है. भारत-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नीति भारतीय सहयोग के बिना सफल नहीं होगी.

संक्षेप में, जापान और आसियान (ASEAN) देश भारत की एक्ट ईस्ट नीति के लिए महत्वपूर्ण हैं. भारत ने जापान और आसियान के साथ मजबूत मुक्त व्यापार तंत्र स्थापित किया है. आगे उन्हें सुरक्षा और संपर्क पर मिलकर काम करने की आवश्यकता है. जापान और आसियान दोनों ही चीन के बढ़ते प्रभाव और ट्रंप की संरक्षणवादी और अलगाववादी नीतियों से चिंतित हैं. वे भारत को भविष्य में एक संभावित संतुलनकर्ता के रूप में देखते हैं. हमारी कूटनीति को इस क्षेत्र में बेहतर संपर्क और सुरक्षा सहयोग की दिशा में काम करना चाहिए.

(डॉक्टर राजन कुमार दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फार रसियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज में पढ़ाते हैं.)

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उससे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.

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