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दिल्ली की फैज-ए-इलाही मस्जिद: जहां पुलिस पर हुआ पथराव जानें उस इलाके के बारे में

फ़ैज़-ए-इलाही मस्जिद का निर्माण 18वीं सदी में हुआ था. यह मस्जिद अपने नाम की तरह ही ‘ईश्वर की कृपा’ का प्रतीक मानी जाती है.

दिल्ली की फैज-ए-इलाही मस्जिद: जहां पुलिस पर हुआ पथराव जानें उस इलाके के बारे में

दिल्ली सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि तहजीब और इबादत की भी राजधानी रही है. यहां की गलियों में मुगल सल्तनत की यादें बसी हैं और इन्हीं यादों में शामिल है फैज-ए-इलाही मस्जिद. एक ऐसी ऐतिहासिक मस्जिद, जो अपनी सादगी, आध्यात्मिक पहचान और मुगलकालीन विरासत के लिए जानी जाती है. लेकिन फिलहाल ये मस्जिद अपने आस-पास अवैध अतिक्रमण पर हुए बुलडोजर एक्शन को लेकर चर्चा में है. 

मस्जिद का निर्माण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

फ़ैज़-ए-इलाही मस्जिद का निर्माण मुगलों के जमाने का हुआ बताया जाता है. यह मस्जिद अपने नाम की तरह ही ‘ईश्वर की कृपा' का प्रतीक मानी जाती है. इतिहासकारों के अनुसार, इसका निर्माण किसी भव्य शाही आदेश से नहीं, बल्कि धार्मिक उद्देश्य और स्थानीय आस्था के केंद्र के रूप में हुआ था.

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मुगल काल में जहां एक ओर विशाल जामा मस्जिदें बनीं, वहीं फैज-ए-इलाही जैसी मस्जिदें आम मुसलमानों की इबादत और रोजमर्रा की धार्मिक जरूरतों का केंद्र बनीं.

लोकेशन भी है खास

यह मस्जिद पुरानी दिल्ली क्षेत्र में स्थित मानी जाती है, जहां मुगल दौर में रिहायशी बस्तियां, सरायें और बाजार विकसित हुए थे. फैज-ए-इलाही मस्जिद न सिर्फ नमाज की जगह रही, बल्कि सामाजिक संवाद, धार्मिक शिक्षा और सामुदायिक एकजुटता का भी केंद्र बनी. आज भी यह मस्जिद स्थानीय लोगों की जिंदगी से गहराई से जुड़ी हुई है.

देर रात यहीं हुआ बुलडोजर एक्शन

देर रात यहीं हुआ बुलडोजर एक्शन

वास्तुकला: सादगी में सौंदर्य

फैज-ए-इलाही मस्जिद की वास्तुकला मुगल शैली की सरल लेकिन प्रभावशाली पहचान लिए हुए है.

लाल पत्थर और चूने का सीमित प्रयोग.

छोटे गुंबद और साधारण मीनारें.

बिना अत्यधिक नक्काशी के साफ-सुथरी संरचना.

खुला आंगन, जहां सामूहिक नमाज़ अदा की जाती है.

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धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

फैज-ए-इलाही मस्जिद सदियों से पांच वक्त की नमाज़, जुमे की इबादत और रमज़ान की विशेष नमाज़ों का केंद्र रही है. यहां होने वाली इबादतों में धार्मिक अनुशासन के साथ-साथ सूफ़ियाना असर भी देखा जाता है. स्थानीय मान्यता है कि इस मस्जिद में मांगी गई दुआएं कबूल होती हैं, इसी वजह से इसे ‘फैज' यानी बरकत की जगह माना जाता है.

समय के थपेड़े और संरक्षण की चुनौती

दिल्ली की कई ऐतिहासिक इमारतों की तरह फैज-ए-इलाही मस्जिद भी समय, शहरीकरण और उपेक्षा की मार झेलती रही है. हालांकि स्थानीय समुदाय के सहयोग से मस्जिद की मूल संरचना को काफ़ी हद तक सुरक्षित रखा गया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे आधिकारिक हेरिटेज संरक्षण की जरूरत है.

फैज-ए-इलाही मस्जिद किसने बनवाई?

इतिहासकारों के मुताबिक दिल्ली की फैज-ए-इलाही मस्जिद का निर्माण 18वीं सदी में हुआ था. हालांकि इसके निर्माण को लेकर सीधे किसी शाही फरमान या शिलालेख का पुख़्ता प्रमाण नहीं मिलता है. 

कौन संभालता है मस्जिद की जिम्मेदारी?

वर्तमान में, फैज-ए-इलाही मस्जिद का प्रबंधन ‘दिल्ली वक्फ बोर्ड' के अंतर्गत आता है. सरकारी नियमों के अनुसार, वक्फ बोर्ड ही इसकी संपत्तियों और रखरखाव की देखरेख के लिए जिम्मेदार है. हालांकि, स्थानीय स्तर पर मस्जिद के दैनिक कार्यों, जैसे नमाज का समय, साफ-सफाई और धार्मिक उत्सवों का आयोजन एक स्थानीय प्रबंधन समिति द्वारा किया जाता है. 

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