प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर को 76 साल की उम्र पूरी कर ली. वो बुधवार (सात अक्टूबर) को सार्वजनिक जीवन में 25 साल पूरे कर रहे हैं. देशभर में इसे लेकर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. बीजेपी ने भी पूरे एक महीने तक कई कार्यक्रमों का आयोजन किया है. यह उस नेता के लिए एक बड़ी तैयारी है, जिसकी व्यक्तिगत लोकप्रियता पिछले दो दशक से बीजेपी की चुनावी सफलता से लगभग जुड़ी हुई मानी जाती है. साल 2002 से गुजरात में हुए विधानसभा चुनावों (2002-2012) और देश में हुए लोकसभा चुनावों (2014-2024) में बीजेपी को कोई चुनावी हार नहीं मिली है. इन चुनावों में चेहरा नरेंद्र मोदी ही थे.
अब सवाल यह उठता है कि मोदी फैक्टर की खासियत क्या है? इसकी सबसे बड़ी वजह है कि मोदी लगातार खुद को बदलते और नई परिस्थितियों के मुताबिक अपनी राजनीतिक छवि को ढालते रहे हैं.
मोदी फैक्टर है क्या?
'मोदी फैक्टर' का मतलब प्रधानमंत्री मोदी की वह क्षमता है, जिसके जरिए वे बीजेपी के पारंपरिक और पक्के समर्थकों के साथ-साथ दूसरे मतदाताओं को भी पार्टी के पक्ष में ला पाते हैं. दूसरे शब्दों में, इससे यह पता चलता है कि बीजेपी को मिलने वाले वोटों में कितने वोट ऐसे हैं, जो पार्टी के कट्टर समर्थकों से नहीं बल्कि उन लोगों से आते हैं, जो खास तौर पर मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने की वजह से बीजेपी को वोट देते हैं.
सीएसडीएस की ओर से चुनाव बाद किए गए सर्वे के मुताबिक 2014 में बीजेपी को मिलने वाले वोटों में करीब 20 फीसद वोट ऐसे मतदाताओं के थे, जिन्होंने मोदी की वजह से बीजेपी को वोट दिया. साल 2019 के चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 25 फीसद और 2024 में करीब 27 फीसद हो गया.
इन मतदाताओं का कहना था कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होते तो वे बीजेपी को वोट नहीं देते.
बीजेपी के सहयोगी दलों को भी मिलता है मोदी का फायदा
यह असर केवल बीजेपी तक सीमित नहीं है. मोदी की लोकप्रियता का फायदा एनडीए में शामिल दूसरी पार्टियों को भी मिलता है. इसे कोटटेल इफेक्ट कहा जा सकता है, यानी किसी लोकप्रिय नेता की वजह से उसके साथ चुनाव लड़ने वाली दूसरी पार्टियों को भी अतिरिक्त वोट मिलना.

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बीजेपी की लगातार चुनावी सफलता में मोदी फैक्टर की भूमिका क्या है
2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर की वजह से एनडीए को करीब 5.5 करोड़ अतिरिक्त वोट मिलने का अनुमान है. एनडीए को कुल करीब 21.6 करोड़ वोट मिले थे. एनडीए को कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से करीब 8.7 करोड़ वोट ज्यादा मिले थे. यानी एनडीए की जीत के अंतर में मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता का योगदान करीब 63 फीसद था.
इसका मतलब यह नहीं था कि एनडीए मोदी के बिना चुनाव जीत ही नहीं सकता था. लेकिन मोदी के बिना उसकी जीत का अंतर काफी कम हो सकता था. साल 2019 में मोदी से जुड़े वोटों की संख्या बढ़कर करीब 8.5 करोड़ हो गई. इस चुनाव में एनडीए को कुल करीब 27.5 करोड़ वोट मिले. एनडीए को यूपीए से करीब 11 करोड़ वोट ज्यादा मिले. ऐसे में जीत के अंतर में मोदी फैक्टर की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 77 फीसद हो गई.
इससे पता चलता है कि बीजेपी की कुल चुनावी स्थिति मजबूत होने के बावजूद उसकी बड़ी जीत मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता पर और अधिक निर्भर होती जा रही थी. लेकिन 2024 में तस्वीर काफी बदल गई
2024 के लोकसभा चुनाव में स्थिति कुछ अलग रही. मोदी से जुड़े वोटों की संख्या करीब 7.1 करोड़ रही, जबकि एनडीए को कुल करीब 28.1 करोड़ वोट मिले. वहीं दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा और इंडिया ब्लॉक को करीब 26.5 करोड़ वोट मिले.
इस तरह एनडीए और विपक्षी इंडिया ब्लॉक के बीच वोटों का अंतर घटकर केवल करीब 1.5 करोड़ रह गया. एनडीए की सीटों की संख्या भी 300 से नीचे चली गई और '400 पार' का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ.
ऐसे में मोदी से जुड़े वोटों की संख्या एनडीए और विपक्ष के बीच जीत के अंतर से कई गुना ज्यादा थी. यह अंतर 1.5 करोड़ वोट था, जबकि मोदी से जुड़े वोट करीब 7.1 करोड़ थे.इसका सीधा मतलब यह है कि अगर मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता से मिलने वाले वोटों को हटा दिया जाए, तो संभव है कि एनडीए 2024 का चुनाव इंडिया ब्लॉक से हार जाता.
इस लिहाज से मोदी सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच सबसे बड़ा अंतर पैदा करने वाला चेहरा रहे.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर की वजह से एनडीए को करीब 5.5 करोड़ अतिरिक्त वोट मिलने का अनुमान है.
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बीजेपी के वोट शेयर की तस्वीर क्या है?
बीजेपी के अपने वोट शेयर को देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखाई देती है. साल 2019 में बीजेपी को कुल 37.8 फीसद वोट मिले थे. इनमें करीब 25.7 फीसद वोट पार्टी के पारंपरिक और वैचारिक समर्थकों से आए थे, जबकि करीब 12.1 फीसद वोट मोदी फैक्टर से जुड़े माने गए. 2024 में बीजेपी का वोट शेयर थोड़ा घटकर 36.6 फीसद रह गया. लेकिन पार्टी के पारंपरिक समर्थकों का आधार कमजोर नहीं हुआ. इससे करीब 27.4 फीसद वोट मिले. वहीं मोदी से सीधे जुड़े वोटों का हिस्सा घटकर करीब 9.2 फीसद रह गया. यानी 2019 की तुलना में मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता से मिलने वाला अतिरिक्त वोट कुछ कम हुआ है. इसे 'मोदी प्रीमियम' कहा जा सकता है. यह 2019 में करीब 12 फीसद था, जो 2024 में घटकर करीब नौ फीसद रह गया. नौ फीसद का यह आंकड़ा छोटा नहीं है. साल 2024 में एनडीए और इंडिया ब्लॉक के वोट शेयर के बीच जितना अंतर था, मोदी से जुड़े वोट उससे करीब चार गुना ज्यादा थे.
सीधी भाषा में कहें तो मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता अपने सबसे ऊंचे स्तर से कुछ कम जरूर हुई है, लेकिन यह अभी भी इतनी बड़ी है कि अगर इसे पूरी तरह हटा दिया जाए तो एनडीए की विपक्ष पर बढ़त खत्म हो सकती है.
दो अलग-अलग रुझान क्या हैं
इस पूरी कहानी को केवल मोदी की लोकप्रियता में गिरावट या मोदी की सफलता के तौर पर देखना सही नहीं होगा. दरअसल, यहां दो अलग-अलग रुझान एक साथ दिखाई दे रहे हैं.
पहला, बीजेपी के लिए नए और गैर-पारंपरिक मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की मोदी की व्यक्तिगत क्षमता शायद 2019 में अपने चरम पर थी. उस समय बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद देश में राष्ट्रवाद की भावना काफी मजबूत थी. इसके बाद मोदी की व्यक्तिगत अपील में कुछ कमी आई है. दूसरा रुझान यह है कि एनडीए की मोदी पर निर्भरता बढ़ गई है.इसकी वजह यह है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की चुनावी बढ़त पहले की तुलना में तेजी से कम हुई है. इंडिया ब्लॉक को पहले के यूपीए की तुलना में काफी ज्यादा वोट मिले हैं. इससे विपक्ष और एनडीए के बीच का अंतर काफी कम हो गया है. अब इस अंतर को बनाए रखने में मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है.

मोदी फैक्टर का फायद केवल बीजेपी को ही नहीं मिलता बल्कि इसका फायदा उसके सहयोगी दलों को भी मिलता है.
राज्यों में अभी भी काम कर रहा है मोदी फैक्टर
वोट वाइव के चार राज्यों के ओपिनियन पोल ट्रैकर के मुताबिक, मोदी फैक्टर अभी भी महत्वपूर्ण है. इन राज्यों में पांच से 11 फीसद मतदाता ऐसे हैं, जिनके लिए प्रधानमंत्री का चेहरा वोट देने का मुख्य आधार है. हालांकि, हाल के कुछ मुद्दों ने केंद्र की बीजेपी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है.
कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए युवाओं के प्रदर्शन, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग, राम मंदिर में कथित चंदा चोरी का मामला, बीजेपी सरकार की ओर से एफसीआरए बिल पास न कर पाना और परिसीमन विधेयक लाने जैसे मुद्दों ने सरकार के प्रति नकारात्मक धारणा पैदा की है.
मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मोदी के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हो सकती है.सवाल यह है कि क्या मोदी का राजनीतिक ब्रांड और व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी भी पहले जैसी मजबूत है या धीरे-धीरे उसका असर कम हो रहा है?
इसका जवाब अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में काफी हद तक सामने आ सकता है.
(डिस्क्लेमर: लेखक एक राजनीतिक टिप्पणीकार और चुनाव विश्लेषक हैं. वो इनवेस्टमेंट बैंकर के रूप में भी काम कर चुके हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)