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OPINION

पढ़े-लिखे लोगों ने बीजेपी और कांग्रेस को क्या संदेश दिया है, क्या कह रहे हैं MLC चुनाव के नतीजे

चार राज्यों की 28 सीटों पर कराए गए विधान परिषद चुनावों के नतीजे करीब-करीब आ गए हैं. इस चुनाव के परिणाम बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और दूसरे दलों के लिए क्या संदेश लेकर आए हैं बता रहे हैं राजनीतिक और चुनाव विश्लेषक अमिताभ तिवारी.

पढ़े-लिखे लोगों ने बीजेपी और कांग्रेस को क्या संदेश दिया है, क्या कह रहे हैं MLC चुनाव के नतीजे

उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों के चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है. प्रधानमंत्री ने इन नतीजों के बहाने कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्होंने कांग्रेस के 'एसआईआर/वोट चोरी' अभियान का मजाक उड़ाते हुए कहा कि पार्टी बैलेट पेपर से हुए चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई, जबकि वह ईवीएम पर सवाल उठाती रहती है. कांग्रेस लंबे समय से बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करती रही है. उसने पलटवार करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री के अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी और आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में भी बीजेपी को सीटें गंवानी पड़ी हैं. हालांकि, राजनीतिक बयानबाजी से अलग इन चुनावों के आंकड़े एक ऐसी कहानी बताते हैं, जिसे दोनों पक्ष पूरी तरह स्वीकार नहीं कर रहे हैं.

इन चुनावों में वोट कौन डालता है?

नतीजों को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि ये किस तरह के चुनाव हैं. विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों पर होने वाले चुनाव बहुत सीमित क्षेत्र में लड़े जाते हैं. इनमें हर नागरिक वोट नहीं डाल सकता.

स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में केवल योग्य स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में केवल योग्य शिक्षक ही वोट दे सकते हैं. इसके लिए उन्हें अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराना होता है. केवल सामान्य वोटर आईडी कार्ड होने से काम नहीं चलता. पंजीकरण की प्रक्रिया भी आसान नहीं है. इसलिए इन चुनावों में मतदान कम होता है और जीत-हार का अंतर अक्सर बहुत कम रहता है.

देश के केवल छह राज्यों में विधान परिषद है. ये राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना. विधान परिषद के सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है. हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं. यह व्यवस्था राज्यसभा जैसी है.

कैसे होती है एमएलसी चुनाव में जीत

कम मतदान के कारण ये चुनाव जनता के व्यापक मूड को समझने का पैमाना कम और राजनीतिक दलों की चुनावी तैयारी और प्रबंधन की परीक्षा ज्यादा होते हैं. आमतौर पर वही पार्टी या उम्मीदवार जीतता है, जो ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं का पंजीकरण कराने और उन्हें वोट डालने के लिए मतदान केंद्र तक लाने में सफल रहता है.

समय के साथ इन चुनावों में धनबल और बाहुबल का महत्व भी बढ़ा है. सत्ता में रहने वाली पार्टियों को अक्सर फायदा मिलता है, क्योंकि उनके पास संसाधन और प्रशासनिक तंत्र होता है. इसके उदाहरण महाराष्ट्र में 2020 के चुनाव में एमवीए का पांच में से 3 सीटें जीतना, उत्तर प्रदेश में बीजेपी का 11 में से 5 सीटें जीतना, बिहार में एनडीए का 8 में से 3 सीटें जीतना और कर्नाटक में बीजेपी का 4 में से 3 सीटें जीतना हैं.

इस चुनाव से क्या तस्वीर उभरती है 

28 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की सीटें 12 से बढ़कर 16 हो गईं. यानी उसे चार सीटों का फायदा हुआ है. बीजेपी की अपनी सीटें 10 से बढ़कर 13 हो गई हैं, जबकि उसके सहयोगियों की सीटें दो से बढ़कर तीन हो गई हैं. विपक्षी इंडिया गठबंधन की कुल सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन गठबंधन के भीतर सीटों का समीकरण बदल गया.

कांग्रेस की सीटें चार से घटकर सिर्फ एक रह गईं. वहीं, उसके सहयोगी दलों की सीटें पांच से बढ़कर आठ हो गईं. समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) को फायदा हुआ है.'अन्य' श्रेणी के उम्मीदवारों की चार सीटें कम हो गईं. दिलचस्प बात यह है कि एनडीए को भी चार सीटों का फायदा हुआ है.
इसका मतलब है कि एनडीए की बढ़त मुख्य रूप से निर्दलीय उम्मीदवारों और छोटे दलों की सीटें अपने खाते में आने से हुई. ऐसा नहीं है कि उसने सीधे इंडिया गठबंधन को हराकर चारों सीटें जीतीं हैं.

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Photo Credit: NDTV

किस राज्य में किस पार्टी को मिली जीत 

उत्तर प्रदेश: एनडीए को बढ़त, लेकिन सपा भी मजबूत

उत्तर प्रदेश में बीजेपी एनडीए की सीटें 11 में से पांच से बढ़कर छह हो गईं. इस तरह उसे स्पष्ट बहुमत मिला. लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) और उसके सहयोगियों ने भी अपने प्रदर्शन में सुधार किया और दो सीटें ज्यादा जीतीं. निर्दलीय और अन्य उम्मीदवारों की तीनों सीटें खत्म हो गईं. ये सीटें दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों के बीच बंट गईं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ में सपा की जीत का राजनीतिक महत्व है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी ने अपनी स्थिति बनाए रखी, जबकि अखिलेश यादव की सपा ने भी अच्छा प्रदर्शन किया. ये नतीजे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले एक कड़ी राजनीतिक लड़ाई के संकेत देते हैं.बीजेपी को कुछ सीटों पर हुए नुकसान से यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी के केंद्रीय और राज्य स्तर के नेताओं के बीच तालमेल की समस्या हो सकती है.

बिहार में एनडीए बहुमत से दूर 

बिहार में एनडीए ने आठ में से चार सीटें जीतीं. यानी वह बहुमत हासिल करने के बजाय विपक्ष के बराबर रहा. इंडिया गठबंधन को एक सीट का नुकसान हुआ.'अन्य' उम्मीदवारों के पास पहले की तरह तीन सीटें बनी रहीं. चारों राज्यों में बिहार अकेला ऐसा राज्य रहा, जहां छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने अपनी स्थिति बनाए रखी.

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी इन चुनावों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. इससे पहले बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में मिली जीत से पार्टी को गति मिली थी.नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए, जो अभी अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, ये नतीजे मिले-जुले संकेत देते हैं. विपक्ष के लिए चिंता की बात यह है कि मतदाता इंडिया गठबंधन के अलावा दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं.

कर्नाटक एनडीए ने कांग्रेस का सुपड़ा साफ किया 

कर्नाटक में एनडीए ने एमएलसी की चारों सीटों पर जीत दर्ज की. कांग्रेस के हिस्से में शून्य आया. राज्य में सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका है. सिद्धारमैया से सत्ता की कमान डीके शिवकुमार को सौंपे जाने के बाद कांग्रेस के भीतर मतभेद भी सामने आए हैं. ऐसे में इन नतीजों को शिवकुमार के लिए शुरुआती झटके के रूप में देखा जा सकता है.

महाराष्ट्र में कैसे हार गई महायुति 

महाराष्ट्र एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां इंडिया गठबंधन यानी महा विकास आघाड़ी (एमवीए) अभी भी आगे है. वहां एमवीए ने तीन और एनडीए ने दो सीटें जीतीं. एमवीए ने अपनी तीनों सीटें बरकरार रखीं, जबकि एनडीए को ‘अन्य' उम्मीदवारों की एक सीट अपने खाते में आने से फायदा हुआ.

कांग्रेस ने नागपुर सीट बरकरार रखी.आरएसएस का मुख्यालय नागपुर में है, इसलिए कांग्रेस की इस जीत का प्रतीकात्मक महत्व है. राज्य में सत्तारूढ़ महायुति के लिए नतीजे सहयोगी दलों के बीच तालमेल की कमी का संकेत देते हैं. बीजेपी ने आरोप लगाया कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने उसे पर्याप्त समर्थन नहीं दिया. देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री बनने और एकनाथ शिंदे के इस पद से हटने के बाद से दोनों दलों के बीच मतभेद दिखाई देते रहे हैं.अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी कमजोर होती दिख रही है, जबकि शरद पवार की पार्टी ने दो सीटें जीत ली हैं. 

कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या क्या है

इन चुनावों का सबसे अहम संकेत इंडिया गठबंधन के भीतर कांग्रेस की कमजोर होती स्थिति है. कांग्रेस की सीटें चार से घटकर एक रह गईं, जबकि क्षेत्रीय सहयोगियों की सीटें पांच से बढ़कर आठ हो गईं. इससे कांग्रेस गठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभरी है. पार्टी 2020 में जीती अपनी सीटों की संख्या भी बरकरार नहीं रख पाई.

इससे कई सवाल उठते हैं. क्या सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया पर दिखने वाले माहौल और जमीन पर मतदाताओं की सोच में अंतर है? क्या कांग्रेस का 'एसआईआर/वोट चोरी' अभियान वास्तव में मतदाताओं को प्रभावित कर रहा है? सरकार के खिलाफ नाराजगी होने का मतलब यह नहीं है कि वह अपने आप विपक्ष के लिए वोटों में बदल जाएगी.

कांग्रेस को अपना संगठन मजबूत करने और चुनाव प्रबंधन में सुधार करने की जरूरत है. खासकर उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके समर्थक वोट डालने के लिए घरों से निकलें. चुनाव जीतने के लिए ऐसे बुनियादी काम भी जरूरी हैं, जो अक्सर सुर्खियों में नहीं आते.

नतीजों में बीजेपी के लिए क्या संदेश है 

एनडीए के पास इन नतीजों से खुश होने की वजह है. छह साल बाद उसे चार सीटों का फायदा हुआ है. यह ऐसे समय में हुआ है, जब विरोध प्रदर्शनों और विपक्ष के हमलों के बीच बीजेपी को राजनीतिक रूप से दबाव में माना जा रहा है.एनडीए को चारों राज्यों में फायदा हुआ. इससे पता चलता है कि उसकी बढ़त किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रही. फिर भी वाराणसी, लखनऊ और नागपुर में मिली हार बीजेपी के लिए आत्ममंथन का विषय है.

ये स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां पढ़े-लिखे मतदाता वोट डालते हैं और इनमें बड़ी संख्या युवाओं की भी है. संभव है कि इन मतदाताओं ने रोजगार और अर्थव्यवस्था से जुड़ी अपनी नाराजगी जताने के लिए वोट का इस्तेमाल किया हो. उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनाव से पहले बीजेपी को अपने सहयोगी दलों के साथ-साथ पार्टी के भीतर मौजूद मतभेदों को भी दूर करना होगा.

इन नतीजों से क्या निष्कर्ष निकलते हैं?

एनडीए को फायदा हुआ, लेकिन बढ़त बहुत बड़ी नहीं है. एनडीए ने चार सीटें बढ़ाईं और सभी राज्यों में पहले से बेहतर प्रदर्शन किया. लेकिन कर्नाटक में ही वह चारों सीटें जीत पाया, जबकि उत्तर प्रदेश में उसे स्पष्ट बहुमत मिला.

इंडिया गठबंधन की कुल सीटें उत्तर प्रदेश में सपा के अच्छे प्रदर्शन के कारण बरकरार रहीं. सपा को दो सीटों का फायदा हुआ. इससे बिहार और कर्नाटक में हुए नुकसान की भरपाई हो गई.मुकाबला दो प्रमुख राजनीतिक खेमों के बीच सिमट रहा है. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में निर्दलीय उम्मीदवारों और छोटे दलों को नुकसान हुआ.'अन्य' की चार सीटों में आई पूरी गिरावट इन्हीं दो राज्यों में हुई.

इस चुनाव से एक बात और साफ हुई कि सत्ता में होना जीत की गारंटी नहीं है. बिहार और उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ खेमों ने अपनी स्थिति काफी हद तक बनाए रखी. लेकिन महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महायुति और कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस को झटका लगा. चुनाव में माहौल से ज्यादा संगठन और प्रबंधन मायने रखते है. जहां कम मतदाता वोट डालते हैं, वहां मतदाताओं का पंजीकरण कराना, समर्थकों को मतदान केंद्र तक लाना और बेहतर चुनाव प्रबंधन करना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है.इंडिया गठबंधन में कांग्रेस सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभरी है, उसकी सीटें चार से घटकर एक रह गईं, जबकि क्षेत्रीय सहयोगियों की सीटें पांच से बढ़कर आठ हो गईं.

विधानसभा चुनाव के लिए क्या संकेत हैं 

विधान परिषद चुनाव के आधार पर आम चुनावों के नतीजों का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता. इसकी वजह यह है कि इनमें मतदाताओं का दायरा सीमित होता है और केवल पंजीकृत स्नातक और शिक्षक ही वोट डाल सकते हैं. हालांकि, ये चुनाव राजनीतिक दलों के संगठन, सहयोगी दलों के बीच तालमेल और पढ़े-लिखे मतदाताओं के रुझान को समझने का एक उपयोगी संकेत जरूर देते हैं. उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में इन नतीजों ने बीजेपी और विपक्ष, दोनों को अपनी रणनीति पर विचार करने का मौका दिया है.

(डिस्क्लेमर: लेखक एक राजनीतिक टिप्पणीकार और चुनाव विश्लेषक हैं. वो इनवेस्टमेंट बैंकर के रूप में भी काम कर चुके हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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