डीएमके नेता एमके स्टालिन ने सोमवार को रानीपेट में एक जनसभा को संबोधित करते हुए एक अप्रत्याशित कदम उठाया, उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता का नाम लेते हुए कहा कि अगर वह आज जीवित होतीं, तो एनडीए सरकार द्वारा प्रस्तावित परिसीमन के खिलाफ जरूर बोलतीं, जैसा उन्होंने पहले जीएसटी और NEET का विरोध किया था. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस तुलना का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया कि मौजूदा एआईएडीएमके और एडप्पडी के पलानीस्वामी (ईपीएस) बीजेपी के सामने झुके हुए हैं और वो केंद्र सरकार की कथित तमिलनाडु विरोधी नीतियों के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाते हैं. 2026 के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में स्टालिन एक तरफ ईपीएस को जयललिता की विरासत से अलग दिखाना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर वह उसी रणनीति से प्रेरणा भी ले रहे हैं, जिसका इस्तेमाल पुरच्ची थलैवी (क्रांतिकारी नेता) कही जाने वाली जयललिता ने करीब 12 साल पहले किया था.
एमके स्टालिन को क्यों याद आईं जयललिता
2014 के लोकसभा चुनाव में आम धारणा के विपरीत कि वह नरेंद्र मोदी का समर्थन करेंगी, जयललिता ने खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किया. उन्होंने खुद को मोदी के सीधे प्रतिद्वंद्वी के तौर पर पेश किया. उन्होंने आंकड़ों के जरिए यह दिखाने की कोशिश की कि आज तमिलनाडु, गुजरात से काफी आगे है. उन्होंने मतदाताओं के सामने सवाल रखा उन्हें क्या पसंद है, 'गुजरात का मोदी या तमिलनाडु की यह महिला?'. उनकी यह रणनीति काम कर गई, उनकी पार्टी ने राज्य की 39 में से 37 सीटें जीतने में सफल रही.
2026 में एमके स्टालिन तमिलनाडु के लोगों के सामने लगभग वैसा ही सवाल रख रहे हैं. उन्होंने चुनाव को 'तमिलनाडु बनाम दिल्ली' की लड़ाई बना दिया है. लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव ने डीएमके को यह कहने का मौका दिया है कि यह कदम दक्षिण भारत के बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के हितों के खिलाफ जाएगा. स्टालिन का तर्क है कि दक्षिण भारत के राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम करने की 'सजा' दी जाएगी, जबकि उत्तर के राज्यों को अधिक लोकसभा सीटें देकर 'इनाम' मिलेगा. इससे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य राजनीतिक रूप से और ज्यादा ताकतवर हो जाएंगे, जबकि दक्षिण भारत की राजनीतिक पकड़ कमजोर पड़ सकती है.

बीजेपी के इस कदम ने डीएमके के नारे 'Stalin Thodaratum, Tamilnadu Vellattum' को और आक्रामक बना दिया है. 23 अप्रैल के मतदान से पहले आखिरी हफ्ते में यह नारा एक तरह से जयललिता-स्टाइल के विकल्प के रूप में बदल सकता है, 'मोदी या स्टालिन' यानी कि नरेंद्र मोदी बनाम स्टालिन. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि स्टालिन प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं. एक क्षेत्रीय नेता के तौर पर वह खुद को दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं की आवाज के रूप में पेश कर रहे हैं, ताकि दिल्ली एकतरफा फैसले न ले सके.
डीएमके को किस बात का डर है
स्टालिन यह जानते हैं कि उनकी सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) या कम से कम कुछ मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ नाराजगी है.यह 23 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में डीएमके को नुकसान पहुंचा सकती है. इसलिए स्टालिन चुनाव को अपनी सरकार के प्रदर्शन पर जनमत संग्रह की जगह संघीय ढांचे पर जनमत संग्रह में बदलने की कोशिश कर रहे हैं.
'गुजरात बनाम तमिलनाडु'की तुलना कोई नई बात है. स्टालिन सरकार के मंत्री पी त्यागराजन अक्सर सवाल उठाते रहे हैं कि जब शिक्षा, स्वास्थ्य और महिलाओं की कार्य भागीदारी जैसे मानकों पर तमिलनाडु का प्रदर्शन पहले ही मध्यम-आय वाले यूरोपीय देशों के करीब है, ऐसे में उसे 'गुजरात मॉडल' अपनाने की क्या जरूरत है. इसी तरह वे तमिलनाडु की मजबूत मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का हवाला देकर यह तर्क देते हैं कि सामाजिक न्याय और औद्योगिकीकरण पर आधारित राज्य का मॉडल, उत्तर के कई राज्यों में अपनाए गए पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) आधारित विकास मॉडल से बेहतर है.
इसी तरह जयललिता ने सवाल उठाया था,''बेहतर प्रशासक कौन है?'', वहीं एमके स्टालिन अब पूछ रहे हैं,''2026 के बाद तमिलनाडु के हितों की रक्षा कौन करेगा?'' इससे यह मुकाबला 2014 की तुलना में और भी ज्यादा अहम हो जाता है. जयललिता ने खुद को बीजेपी और नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में पेश किया था, जबकि स्टालिन खुद को पूरे दक्षिण भारत के अग्रदूत के रूप में स्थापित कर रहे हैं. उन्होंने पिछले साल मार्च में परिसीमन पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया था. दक्षिण के हितों के कमजोर होने और उसकी राजनीतिक आवाज के कमज़ोर पड़ने को लेकर स्टालिन की चेतावनी, जयललिता के 'तमिलनाडु फर्स्ट' रुख की ही झलक देती है. उनका यह भी कहना कि तमिलनाडु 1950 और 1960 के दशक के आंदोलन वाले दौर में भी वापस जा सकता है. यह इस बात का संकेत है कि बीजेपी के कदमों के जवाब में तमिल उप-राष्ट्रीयता (Sub-nationalism) फिर से उभर सकती है.
यह टकराव चुनाव को कैसे प्रभावित करता है? 1960 के दशक के 'एंटी-हिंदी आंदोलन' की भावना को याद दिलाकर स्टालिन, शिक्षित मतदाताओं के बीच गुस्से और भावनात्मक ऊर्जा को फिर से डीएमके के पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं. वो केंद्र सरकार को मुख्य विरोधी के रूप में पेश कर रहे हैं. दक्षिण भारत में 'आत्मसम्मान' का नारा पहले भी चुनाव जिताता रहा है. इसका सबसे चर्चित उदाहरण एनटी रामाराव का 1983 का चुनाव है, जब उन्होंने 'तेलुगु आत्म गौरव' का मुद्दा उठाकर बड़ी जीत हासिल की थी.
स्टालिन का ईपीएस और विजय के लिए क्या संदेश है
'दिल्ली से खतरे' की बात उठाकर स्टालिन अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वियों ईपीएस और विजय को भी घेरने की कोशिश कर रहे हैं. 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती पर वीडियो जारी कर स्टालिन यह संदेश देना चाहते थे कि प्रस्तावित परिसीमन 'संविधान-विरोधी' कदम है. राजनीतिक तौर पर, यह दलित और अल्पसंख्यक वोटों को अपने पक्ष में करने की एक सूक्ष्म रणनीति भी थी, जिन पर विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) नजर लगाए हुए है. इससे खासकर पलानीस्वामी की स्थिति मुश्किल हो जाती है, क्योंकि एक तरफ स्टालिन तमिलनाडु के हितों की बात कर रहे हैं, वहीं ईपीएस खुलकर केंद्र के पक्ष में भी नहीं जा सकते. स्टालिन की ओर से जयललिता और ईपीएस के बीच अंतर को रेखांकित करना भी इसी रणनीति का हिस्सा है, यह दिखाने के लिए कि यह अम्मा की एआईएडीएमके नहीं, बल्कि एडप्पडी की एआईएडीएमके है.
स्टालिन का यह आक्रामक रुख एनडीए के भीतर भी मतभेदों को उजागर कर सकता है. उम्मीद है कि तमिलनाडु के 39 लोकसभा सांसद, जो सभी डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन से हैं परिसीमन पर बहस के दौरान ऐसे भाषण देंगे, जिनमें एक नजर संसद पर होगी और दूसरी चुनावी मशीन (ईवीएम) पर. जैसे-जैसे यह मुद्दा जोर पकड़ेगा, यह अंतिम चरण में चुनावी नैरेटिव को पूरी तरह बदल सकता है.
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