13 अगस्त 2026 को मानसून सत्र खत्म होने तक कांग्रेस के पास दिखाने के लिए ठोस उपलब्धियां थीं. विपक्ष के दबाव में आखिरकार केंद्र की मोदी सरकार को एफसीआरए (FCRA) बिल यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक को जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (जेपीसी) के पास भेजना पड़ा, जिसमें लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे. कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने बिल का जमकर विरोध करते हुए इसे पूरी तरह वापस लेने की मांग रखी थी और आरोप लगाया था कि इससे एनजीओ और अल्पसंख्यकों को टारगेट किया जा सकता है. यह विपक्ष के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत थी.
कांग्रेस के अंदर भी सवाल उठे!
लेकिन इसी सेशन में विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन का अंदाज कुछ और ही रहा. सत्र के आखिरी दिन कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा की अगुवाई में विपक्षी सांसद हाथों में बंदर का खिलौना और टेडी बियर लेकर संसद परिसर पहुंचे और पीएम मोदी की 56 इंच वाली छवि पर तंज कसते हुए नारेबाजी की. यह प्रदर्शन सरकार पर छात्रों के मुद्दे पर चर्चा से बचने का आरोप लगाने के लिए था, लेकिन इस स्टाइल को लेकर पार्टी के अंदर भी सवाल उठे कि क्या इस तरह के ड्रामे असली मुद्दे से ध्यान भटका देते हैं. अगर इस तरह के कृत्य यहीं रुकते तो भी गनीमत रहती, लेकिन बात यहीं खत्म कहां होने वाली थी. रचनात्मक कांग्रेस कन्वेंशन में जब राहुल गांधी पीएम मोदी की विदेश नीति पर हमलावर थे, तभी मंच पर मौजूद कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी का नाम लेकर सरकार पर तंज कस दिया. इसी दौरान राहुल गांधी ने संदीप दीक्षित को गले भी लगाया, और यहीं से विवाद शुरू हो गया. बीजेपी नेताओं ने इस कमेंट को महिला-विरोधी और देश विरोधी बताते हुए कांग्रेस पर सीधा अटैक बोल दिया.
राहुल गांधी, पवन खेड़ा के बयानों में कंट्राडिक्शन
मामला इतना बढ़ गया कि विदेश मंत्रालय को भी सफाई देनी पड़ी. मंत्रालय के प्रवक्ता ने अपनी प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि भारत के इटली के साथ मजबूत रिश्ते हैं और पब्लिक डिबेट में एक-दूसरे का सम्मान बनाए रखना जरूरी है. दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी ने खुद इस टिप्पणी पर कोई रिएक्शन नहीं दिया और इसे इग्नोर करना ही सही समझा, लेकिन तब तक बीजेपी को अटैक करने के लिए नया मुद्दा मिल चुका था.
पार्टी के अंदर आपसी तालमेल की कमी सबसे ज्यादा आरएसएस को लेकर दिए गए बयानों में सामने आई. एक तरफ रचनात्मक कांग्रेस के मंच से राहुल गांधी ने कहा कि वे संघ की विचारधारा के कट्टर विरोधी हैं, लेकिन अगर आरएसएस को अपनी बात कहने से रोका गया तो वे उसकी अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करेंगे. यह एक बैलेंस्ड और डेमोक्रेटिक स्टैंड था. लेकिन इससे कुछ पहले ही पार्टी के नेशनल मीडिया इंचार्ज पवन खेड़ा रायपुर में बिल्कुल उल्टे सुर में बोल चुके थे. खेड़ा ने साफ कहा था कि कांग्रेस की सरकार आने पर संघ नाम की संस्था ही खत्म हो जाएगी. एक तरफ पार्टी का टॉप लीडरशिप टॉलरेंस और फ्रीडम ऑफ स्पीच की भाषा बोल रहा है, दूसरी तरफ पार्टी का ही एक बड़ा प्रवक्ता संगठन को खत्म करने की भाषा में बात कर रहा है. यह कंट्राडिक्शन बीजेपी के लिए तैयार हथियार बन गया, और सोशल मीडिया पर तुरंत यह सवाल उठने लगा कि कांग्रेस की असली पॉलिसी क्या है.
राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी को लेकर कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक ने बीजेपी पर लगातार दबाव बनाया था. पवन खेड़ा ने आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के बयान पर पलटवार करते हुए कहा था कि यह असली मामला सामने लाने के बजाय संघ की छवि बचाने की कोशिश भर है. लेकिन इस मुद्दे पर मिली बढ़त को पार्टी ने खुद ही गंवा दिया. पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव भगवा वस्त्र और साधु के वेश में हाथ में दानपात्र लेकर संसद परिसर पहुंचे, और राहुल गांधी ने प्रतीकात्मक रूप से उसमें पैसे भी डाले. इसके बाद पप्पू यादव ने पैसे लेकर भागने का ड्रामा किया. बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद समेत कई संगठनों ने इसे हिंदू आस्था का अपमान बताया, और वाराणसी में राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो गई. जिस मुद्दे पर कांग्रेस अटैकिंग मोड में थी, उसी पर अब उसे सफाई देनी पड़ रही है.
बीजेपी नहीं छोड़ रही कोई मौका
यह कोई अकेली घटना नहीं है. पिछले सेशन में जब TMC सांसद कल्याण बनर्जी राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की नकल उतार रहे थे, राहुल गांधी उस पल को कैमरे में कैद करते नजर आए. एक ऐसा वीडियो जो बाद में बीजेपी के लिए संवैधानिक पद के अपमान का आरोप बन गया. इसी साल फरवरी में संसद भवन की सीढ़ियों पर राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को मुस्कुराते हुए 'मेरे गद्दार दोस्त' कहा था- बिट्टू के कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने के रेफरेंस में. हल्के-फुल्के अंदाज में कहा गया यह जुमला भी पार्टी की सीरियसनेस पर सवाल बनकर लंबे समय तक चर्चा में रहा.
15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में तिरंगा फहराने के दौरान भी एक नया विवाद खड़ा हो गया. बीजेपी ने आरोप लगाया कि इस दौरान सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने पूरा वंदे मातरम गाने पर सवाल उठाकर उसे रोकने की कोशिश की. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस आरोप को पूरी तरह खारिज करते हुए सफाई दी कि सोनिया गांधी उस वक्त पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी मंगाने की बात कर रही थीं, क्योंकि खरगे काफी देर से खड़े थे. बीजेपी के एक नेता ने कांग्रेस से माफी मांगने की डिमांड करते हुए इसे राष्ट्रगीत का अपमान बताया, हालांकि पार्टी हेडक्वार्टर में उस दिन वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाए गए थे, जो शायद पहली बार हुआ था. सच जो भी हो, इस विवाद ने एक बार फिर स्वतंत्रता दिवस जैसे नेशनल मौके को भी सियासी टकराव का अखाड़ा बना दिया.
एफसीआरए बिल को जेपीसी भेजने पर सरकार को मजबूर करना हो या चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर बीजेपी को घेरना, मानसून सत्र में कांग्रेस के पास सियासी बढ़त के कई मौके थे. लेकिन हर बार पार्टी के ही किसी नेता का विवादित बयान, नाटकीय प्रदर्शन या आपसी कंट्राडिक्शन सुर्खियां छीन ले गया. यह पैटर्न सिर्फ इस सेशन तक सीमित नहीं है- कल्याण बनर्जी वाले वीडियो से लेकर 'गद्दार दोस्त' वाले जुमले तक, कांग्रेस बार-बार अपनी ही रणनीतिक जीत को सेल्फ-गोल में बदलती दिखी है.