क्या धर्म की पिच पर खेला जा रहा है उत्तर प्रदेश चुनाव...?

यूपी की चुनावी भाषणो में मंदिर और माफिया के बहाने धर्म का ज़िक्र आने लगा है. ऐसा नहीं है कि विकास के दावे नहीं हो रहे हैं. पुलों और एक्सप्रेस वे का शिलान्यास नहीं हो रहा है लेकिन हर भाषण में अब धर्म आने लगा है.

नमस्कार मैं रवीश कुमार, यूपी की चुनावी भाषणो में मंदिर और माफिया के बहाने धर्म का ज़िक्र आने लगा है. ऐसा नहीं है कि विकास के दावे नहीं हो रहे हैं. पुलों और एक्सप्रेस वे का शिलान्यास नहीं हो रहा है लेकिन हर भाषण में अब धर्म आने लगा है. कभी सीधे सीधे नाम लेकर तो कभी इशारे-इशारे से किसी के कथित वर्चस्व को कुचल देने की हुंकार भरी जा रही है. हर भाषण किसी न किसी बहाने दंगों की याद दिलाते हुए माफिया पर पहुंच रहा है औऱ इन सबसे एक दल और एक समुदाय को जोड़ा जा रहा है. अभी ये हाल है तो आने वाले दिनों में रोज़गार और विकास के मुद्दों का क्या होगा, अंदाज़ा मिल रहा है.कानून व्यवस्था के नाम पर हमेशा किसी एक वर्ग के अपराधियों और माफियों को सीधे ठोक देने या बुलडोज़र से गिरा देने की बात कही जा रही है. कभी नाम लेकर कभी इशारे में. आपको लग सकता है कि यह होना ही चाहिए लेकिन मामला इतना सरल नहीं है.

राहुल गांधी को ‘एक्सीडेंटल हिन्दू' कहा जाने लगा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अखबार में छपा अपना बयान ट्वीट कर रहे हैं, जिसकी हेडलाइन है कि गांधी परिवार को हिन्दू कहलाने का हक नहीं है. लगता है धर्मांतरण की तरह धर्म निष्कासन कानून भी आने वाला है ताकि किसी को धर्म से भी निकाला जा सके. मुख्यमंत्री ही ट्वीट कर रहे हैं कि गांधी परिवार को हिन्दू कहलाने का हक नहीं है, क्या उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू बता सकते हैं कि ये हेट स्पीच है या नहीं, आज के अखबारों में उप राष्ट्रपति का बयान छपा है कि नफरती भाषणों से दूर रहना चाहिए. अखिलेश दंगा कराते थे हम दंगल कराते हैं, ये अनुराग ठाकुर का बयान है जो हेडलाइन का रूप धर कर अमर उजाला में छपा है. यूपी में बहुमत से लबालब और विकास के तमाम दावों से लैस बीजेपी को इन भाषणों की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? क्या यूपी की जनता का राजनीतिक विवेक हेडलाइन में धर्म धर्म देखकर नहीं जागता है? क्या यूपी को हर बात में धर्म धर्म चाहिए?

बीजेपी की सभाओं को लेकर हिन्दी अखबारों के कवरेज को देखिए. सबके भाषण एक जैसे होने लगे हैं. ऐसा लगता है कि लिखने वाला एक ही है. सारे भाषणों का मालिक यानी सबका मालिक एक है.मिसाल के तौर पर इस हेडलाइन में योगी का बयान है कि हम सबका विकास कराते हैं, वे राम भक्तों पर गोली चलाते हैं. ठीक यही बात अमित शाह के हवाले से उसी अमर उजाला में छपी है. वे कारसेवकों पर गोलियां चलवाते थे, हम मंदिर बनवा रहे हैं- अमित शाह. बीजेपी के विज्ञापनों में दंगों को लेकर एकतरफा तस्वीर पेश की जा रही है. फर्क साफ है नाम के इन विज्ञापनों में एक समुदाय को आग लगाते दिखाया जा रहा है. इस बार दाढ़ी और टोपी नहीं है लेकिन गले में लपेटा जाने वाला गमछा यानी काफिया है. इस तरह के फर्क को धुंधला कर जनता के दिमाग में ठेला जा रहा है कि फर्क साफ है.

इन तस्वीरों में दंगा करने वाला दूसरा पक्ष गायब है. फर्क मिटा कर फर्क साफ बताया जा रहा है. दूसरी तरफ यूपी के अखबारों में विपक्ष का कवरेज गायब है. चुनावी पन्ने को बीजेपी के तमाम नेताओं, मंत्रियों और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री के बयानों से भर दिया गया है. काफी जगह दी जा रही है. इन सबके बीच अनमने तरीके से विपक्ष का कवरेज थोड़ा बहुत है. यही एक फर्क है जो अखबारों और चैनलों में साफ है. कवेरज़ में विपक्ष साफ है. Do you get my point. योगी आदित्यनाथ एक रैली में कह रहे हैं, “रामभक्तों पर गोलियां चलाने वाले लोग आज कहते हैं कि अगर हम भी सत्ता में होते तो हम भी राम मंदिर बना देते. ये आपकी ताकत है. आपके वोट बैंक की ताकत इनको नाक रगड़ने के लिए मजबूर कर रही है.आप जिस दिन चाहेंगे, उस दिन ये नाक रगड़कर आपके पास आएंगे.”

अमित शाह का बयान है, “कारसेवकों पर गोलियां चलाने वालें जितना भी जोर लगा लें अयोध्या में श्रीराम लला के मंदिर का निर्माण नहीं रोक सकते.” जेपी नड्डा का एक बयान है, ''गन्ना हमारा है और (मोहम्मद अली) जिन्ना उनका है. भाजपा गन्ने के मुद्दे पर चुनाव लड़कर जीतेगी और जिन्ना मानसिकता का भी पर्दाफाश करेगी'' शाह का एक और बयान, 'NIZAM' का मतलब शासन होता है. लेकिन अखिलेश यादव के लिए 'N' मतलब नसीमुद्दीन, 'I' मतलब इमरान मसूद, 'ZA' मतलब आजम खान और 'M' मतलब मुख्तार अंसारी है. मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आपको अखिलेश का निजाम चाहिए या योगी-मोदी का विकास निजाम?”

इन भाषणों को ध्यान से यूट्यूब में जाकर फिर से सुनिएगा. ऐसा लग रहा है कि एक समुदाय को कंट्रोल करने के लिए वोट मांगा जा रहा हो. अमित शाह जिस निज़ाम का मतलब समझा रहे हैं, उसमें केवल मुसलमानों के नाम हैं. उनके नाम हैं, जिन्हें अपराध के किसी न किसी मामले में जेल भेजा गया है. इन नामों के क्रम से निज़ाम कानून व्यवस्था और शासन का पर्याय तो बन जाता है लेकिन वह एक समुदाय पर ठप्पा भी लगा देता है. 

एक सवाल आप खुद से पूछिए. क्या अमित शाह या योगी नेता कानपुर के पास हुए इस एनकाउंटर का नाम नहीं ले रहे हैं? जुलाई 2020 में ही तो एनकाउंटर हुआ था. विकास दुबे माफिया नहीं था तो क्या था, उसने गिरफ्तार करने आई पुलिस पार्टी पर ही हमला बोल दिया था. विकास दुबे ने आठ पुलिस वालों की हत्या कर दी थी जिसमें एक डीएसपी रैंक के अधिकारी भी थे. क्या  आपने किसी भाषण में सुना है या कोई हेडलाइन पढ़ी है, जिसमें अमित शाह या योगी या प्रधानमंत्री दावा कर रहे हों कि हमारी सरकार विकास दुबे को भी नहीं छोड़ा. आखिर विकास दुबे को मारने का श्रेय क्यों नहीं लिया जा रहा है, क्या किसी खास वोट बैंक की चिन्ता की जा रही है.

ऐसा तो नहीं कि माफिया यही दो चार हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि बाकी लोगों के नाम जानबूझ कर नहीं लिए जा रहे हैं. केवल खास लोगों के नाम लिए जा रहे हैं ताकि माफिया का म से एक और मतलब निकल सके. जिस सहजता से आज़म खान, नसीमुद्दीन,अतीक, मुख्तार का नाम लिया जा रहा है उसी सहजता से कुलदीप सिंह सेंगर, विकास दुबे का नाम क्यों नहीं लिया जाता है? विकास दुबे को लेकर चुप्पी नज़र आती है. जैसे इस खबर में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान हेडलाइन के तौर पर छपा है कि मुख्तार अतीक को जेल में डाला इसलिए योगी अखिलेश के लिए उपयोगी हैं. क्या विकास दुबे का नाम लिया जाएगा, क्या ऐसी हेडलाइन विकास दुबे को लेकर छपेगी? 

राजनीति में धर्म का इस्तमाल होने से धर्म की की नैतिकता नहीं आ जाती है. धर्म के नाम पर सच नहीं बोला जाता है बल्कि सांप्रदायिकता का यह पैटर्न ही है. इसमें एक खास समुदाय के अपराधियों का नाम इस तरह से लिया जाता है, जैसे वह समुदाय अपराधियों से भरा हो औऱ अपराध का समर्थन करता हो. फिर बीजेपी लखीमपुर खीरी के आरोपी आशीष मिश्रा का नाम क्यों नहीं ले रही है, क्या आशीष का पकड़ा जाना उसकी कानून व्यवस्था की कामयाबी नहीं है? 

अमित शाह के सहयोगी गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा पर किसानों की हत्या की साज़िश का आरोप पत्र दायर हुआ है. मंत्री के बेटे ही नहीं बल्कि उनकी पत्नी के भाई वीरेंद्र शुक्ला पर सबूतों को छुपाने के आरोप लगे हैं. उन्हें भी किसानों की हत्या के आरोप में 14 वां आरोपी बनाया गया है.किसानों को मारने वाली गाड़ियों के काफिले में एक गाड़ी वीरेंद्र शुक्ला की भी थी. क्या कोई बताएगा कि ये कौन सा निज़ाम है कि विकास दुबे का का नाम नहीं लिया जाता है और बेटे का नाम हत्या के आरोप में आने के बाद भी इस्तीफा देना नैतिक रूप से ज़रूरी नहीं समझा जाता है

अब आप समझ गए होंगे कि निज़ाम का नाम लेते हुए क्यों केवल मुस्लिम अपराधियों या उन मुस्लिम नेताओं के नाम लिए जाते हैं जो भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद हैं और क्यों आशीष मिश्रा और विकास दुबे का नाम छोड़ दिया जाता है. जैसे कानपुर के इत्र व्यापारी पीयूष जैन के यहां छापा पड़ा तो करोड़ों रुपये के नोटों का अ्ंबार निकला. जनता हतप्रभ रह गई कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद भी इतना काला धन कैसे जमा हो सकता है तब इन्हें लेकर निज़ाम की तरह तुकबंदी नहीं बनाई गई.

शुरू में बीजेपी के नेताओं ने पीयूष जैन को लेकर खूब मुद्दा बनाया लेकिन अब सब पीयूष जैन पर चुप हो गए हैं. पीयूष जैन को भी सपा से जोड़ा गया लेकिन सभी मुस्लिम अपराधियों का नाम लेकर निज़ाम बनाया गया उस तरह का कुछ नहीं किया गया. बहरहाल अब तो इस छापे की चर्चा गायब हो गई है. इसकी जगह पर किसी और जैन के यहां छापा मारा गया और उसे भी सपा का करीबी बताया गया. इस क्रम में आयकर विभाग अपनी साख कैसे दांव पर लगा रहा है इसे लेकर किसी को चिन्ता नही है. फिर आप एक सवाल तो कर ही सकते हैं कि इतना नोट जिसके पास जमा हो, काला धन हो क्या वो बीजेपी के लिए म से माफिया नहीं है. क्या पीयूष जैन के छापे को लेकर विज्ञापन छपेगा?

धर्म की राजनीति को पता है उसे बहुत सारे झूठ की ज़रूरत होती है. खुद को ज़िंदा रखने के लिए वह हर बुराई को दूसरे धर्म से जोड़ेगी जबकि उसी तरह की बुराइयों से अपने धर्म के नाम पर आंखें मूंद लेगी. इस तरह से तो मंदिर, माफिया के बहाने चुनावी भाषणों को गरम किया जा रहा है. ज़रूरी नहीं कि विपक्ष बीजेपी के सेट किए गए टोन में ही जवाब दे. विपक्ष को पूरा हक है कि वह धर्म को छोड़ रोज़गार और स्वास्थ्य जैसे मसलों को उठाए लेकिन चुनाव और मीडिया में खबरों को शोर इस तरह से धर्म से भर जाए तब भी क्या विपक्ष को इन मुद्दों से किनारा कर लेना चाहिए? ऐसा क्यों होता है कि चुनाव से पहले या चुनाव के बाद भी विपक्ष इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच नहीं जाता है, चुनाव के दौरान तो किनारा ही काटने लगता है. विपक्ष को क्यों  लगता है कि धर्म की राजनीति का जवाब देने से उसका वोट कम हो जाएगा?

राहुल गांधी ने ज़रूर हिन्दू बनाम हिन्दुत्ववादी की बात कहने की कोशिश की लेकिन उनकी गाड़ी यहीं पर रुक गई. क्या विपक्ष धर्म का नाम आते ही डर जाता है. उसके पास जनता से बात करने की भाषा नहीं है.क्या रोज़गार की बात करने से ध्रुवीकरण ख़त्म हो जाता है? यह बात राजनीति की किस प्रयोग शाला से निकली है और साबित हुई है? क्यों विपक्ष सांप्रदायिकता या राजनीति में धर्म के इस्तमाल के खतरों को लेकर जनता के बीच सीधे सीधे बात रखता है?
बीजेपी लगातार धर्म को लेकर अपने भाषणों से चुनावी माहौल का टोन सेट कर रही है और विपक्ष के नेता प्रेस विज्ञप्ति का सार्वजनिक पाठ कर रहे हैं. 

यूपी में हुए एनकाउंटर को लेकर कई तरह के सवाल उठे हैं फिर भी सीधे गोली मार देने, ठोंक देने की शैली में भाषण दिए जा रहे हैं. इतनी मुखरता से दिए जा रहे इन भाषणों में इंतज़ार है कि कब आशीष मिश्रा और विकास दुबे का नाम आएगा या नाम आने से वोट बिगड़ जाएगा?यह दोनों खबरें अमर उजाला की हैं. हेडलाइन है कि माफिया की जगह जेल या दूसरा लोक. सीएम. दूसरी हेडलाइन है अपराधी के खिलाफ व्यापारी की बोली भले न निकले पुलिस की गोली निकलेगी. इस तरह की भाषा सामान्य होती जा रही है और लोगों को लगता होगा कि कानून व्यवस्था के लिए यह सही भी है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज सहारनपुर के देवबंद में थे.यहां उन्होंने यूनिवर्सिटी और अन्य मुद्दों के अलावा आतंकवाद और कैराना में हुए कथित पलायन का मुद्दा उठाया था. ठेला और ठोंक देने की भाषा शैली वाकई लाजवाब थी, बिल्कुल भारतीय संस्कृति में चार चांद लगा रही थी. वो कह रहे हैं कि पहले की सरकारों में आतंकवादियों को संरक्षण देने का काम होता था.अब हम आतंकवादियों को ठोकने के लिए ऐटीएस के कमांडो तैनात कर रहे हैं. जो लोग कैराना में पलायन कराने का काम कराते थे वो अब सब्ज़ी बेचने के लिए ठेला लगा रहे हैं.

मुख्यमंत्री को साफ करना चाहिए कि कैराना में जो पलायन कराते थे वो अब सब्जी का ठेला लगा रहे हैं, से उनका क्या मतलब है. मुख्यमंत्री की नज़र में पहले वाला काम बुरा था या सब्ज़ी बेचने वाला काम ज़्यादा बुरा है. क्या ठेला लगाकर सब्ज़ी बेचने वालों का अपना कोई स्वाभिमान नहीं है. क्या ठेला लगाकर सब्ज़ी बेचना सज़ा है? संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को अपने उदाहरण ठीक से चुनने चाहिए. लेकिन बात ठेले तक ही सीमित नही हैं, ठोक देने की भाषा का आप क्या करेंगे. 2016 में कैराना में कथित पलायन का मामला उठा था. यह वो दौर था जब गोदी मीडिया अपनी फैक्ट्री में झूठ पैदा करने लगा था.  

कैराना को लेकर इतनी तरह की रिपोर्टिंग हुई कि मीडिया में ही मीडिया की रिपोर्टिंग होने लगी. बीबीसी हिन्दी पर रिपोर्ट होने लगी कि हिन्दी अंग्रेज़ी के अखबारों में कैसे अलग रिपोर्टिंग की है. उस वक्त बीजेपी के स्व सांसद हुकूम सिंह ने एक लिस्ट जारी कर दावा किया था कि कैराना से करीब 400 व्यापारियों ने पलायन किया है. स्क्रोल डॉट इन की रिपोर्ट थी कि प्रशासन ने शामली ज़िला प्रशासन के हवाले से लिखा है कि भाजपा की दी गयी सूची में 'चार लोग ऐसे हैं जो बीस साल पहले मर चुके हैं. अलग अलग चैनलों और वेबसाइट ने पड़ताल की तो कई दावे गलत निकले. कुछ उदाहरण ऐसे भी मिले जिनके नाम पलायन की सूची में थे मगर कैराना में ही रह रहे थे.

कई रिपोर्ट में यह बात देखने को मिली कि बेहतर अवसर की तलाश में कैराना से हिन्दू और मुस्लिम दोनों परिवार बाहर गए थे. 11 फरवरी 2017 क्विंट में अभय कुमार सिंह की रिपोर्ट है. इसमें लिखा है कि मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी के सांसद हुकूम सिंह का यह भी बयान आया था कि उन्होंने कभी हिन्दुओं के पलायन की बात नहीं कही थी. बढ़ते अपराध की वजह से सिर्फ पलायन की बात की थी, जिसमें सभी वर्गों के लोग शामिल थे. हुकूम सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं. हम उनका एक पुराना बयान दिखा रहे हैं जो उन्होंने एन डी टी वी से कहा था. 

राजनेताओं को पता है कि 2016 में क्या हुआ था किसे ठीक ठीक याद होगा. मीडिया भी इन मुद्दों की पड़ताल नहीं करेगा. आप मतदाता के तौर पर कितने मुद्दों की पड़ताल करेंगे, संभव नहीं है. आखिर जब कैराना कैराना हो रहा है तब कैसे जाना जाए कि उस वक्त कैराना को लेकर क्या हुआ? कई लोग तो कैराना से निकल कर गाज़ियाबाद आए थे तो यह कौन सा पलायन हुआ अगर कैराना में किसी बदमाश का आतंक था तो वह बदमाश गाज़ियाबाद भी तो आ सकता था. पर कैराना एक मुद्दा है. इसे लेकर तरह तरह के भाषण होने लगे हैं.

24 नवंबर 2021 की लाइव हिन्दुस्तान की यह खबर देख सकते हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ ने घोषणा की है कि कैराना छोड़ कर गए व्यापारियों की वापसी कराई जाएगी और उन्हें आर्थिक मदद दी जाएगी. योगी ने कैराना लौटने वाले परिवारों से मुलाकात भी की थी. इस खबर में यह भी लिखा है कि कैराना से गए ऐसाे लोगों का सर्वे कराया जाएगा. 2016 में बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाया था और सर्वे का ख्याल आया 2021 में तब जब चुनाव आ गया? शायद इसीलिए राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन के दौरान कहा था कि कैराना सरकारी प्लान है. पलायन नहीं. इसके बहकावे में मत आता. राकेश टिकैत कहते हैं कि कैराना सरकारी प्लान है. पलायन नहीं है.

मुज़फ्फरनगर दंगों को लेकर किसान महापंचायत में माफी गई थी. लेकिन बीजेपी मुज़फ्फरनगर दंगों को मुद्दा बना रही है. 19 दिसंबर 2021 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ट्वीट है.आज हमारी सरकार के पौने पांच वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस दौरान प्रदेश में एक भी दंगा नहीं हुआ है. पिछली सरकारों में माफियाओं व अपराधियों द्वारा व्यापारी व हिन्दू भगाए जाते थे. अब कोई व्यापारी या हिन्दू, प्रदेश से पलायन नहीं करता है, पलायन होता है तो पेशेवर अपराधियों व माफियाओं का. मुख्यमंत्री कहते हैं कि एक भी दंगा नहीं हुआ लेकिन इसी आठ दिसंबर को संसद में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय का जवाब है कि यूपी में 2018-20 के बीच दंगों में करीब 150 लोग घायल हुए हैं.इस सवाल पर ग़ौर कीजिएगा.

क्यों यूपी में चुनावी राजनीति धर्म के सहारे बात करती है. क्या राजनीति ने अपनी ज़ुबान खो दी है. राजनीति के लिए कृष्ण भगवान को सपने में लाया जा रहा है. जनता को जो सपने दिखाए गए वो तो पूरे नहीं हो रहे हैं लेकिन नेता बता रहे हैं कि भगवान उनके सपने में आ रहे हैं.सपने में रोज़गार भी आ जाता और लोगों को नियुक्ति पत्र मिल जाता. अब युवाओं को रोज़गार मागने के लिए सपने ही जाना होगा क्योंकि भगवान भी अब सपने में आने लगे हैं. वैसे राजनीति में धर्म की महिमा इतनी बढ़ गई है मध्य प्रदेश में विधायकों के लिए कोर्स तैयार किया गया है. अफसोस कि किसी विधायक ने इस कोर्स के लिए अपना नामांकन नहीं कराया. 

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विधायक का काम है नीतियां बनाना, उसे लागू करना अगर विधायक संसदीय प्रणाली को छोड़ धार्मिक कोर्स करने लगेंगे तो इससे जनता का कितना भला होगा यह जनता जानती है. हम और आप अलग अलग राजनीति इसलिए चुनते हैं ताकि जीवन को बेहतर करने के अवसरों का विस्तार कर सकें. राजनीति लोक की बात करती है.अगर वह धर्म की बात ही करती रहेगी तो जल्दी ही परलोक की बात करने लगेगी.