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क्या भारत में आर्थिक मंदी आने वाली है, सरकार के सामने चुनौतियां कितनी बड़ी हैं

डॉ समीर शेखर नरगिस मोहापात्रा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 08, 2026 13:50 pm IST
    • Published On जून 08, 2026 13:48 pm IST
    • Last Updated On जून 08, 2026 13:50 pm IST
क्या भारत में आर्थिक मंदी आने वाली है, सरकार के सामने चुनौतियां कितनी बड़ी हैं

भारत की अर्थव्यवस्था 2025–26 में एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां एक ओर सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में गिनती हैं, वहीं दूसरी ओर विदेशी व्यापार असंतुलन, रुपये का अवमूल्यन, पेट्रोलियम निर्भरता, रोजगार की गुणवत्ता, बढ़ती आय असमानता और निवेश संबंधी चुनौतियां सवाल भी खड़े कर रही हैं. आंकड़े बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी बढ़ रही है, लेकिन इस बढ़ोतरी की गुणवत्ता और स्थायित्व पर बहस जारी है. भारत ने विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा किया था, किंतु विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अनुमानों और विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव के कारण उसकी वैश्विक रैंकिंग को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आए हैं. इससे पता चलता है कि केवल जीडीपी का आकार ही आर्थिक शक्ति का अंतिम पैमाना नहीं है, प्रति व्यक्ति आय, रोजगार, उत्पादकता और बाह्य क्षेत्र की मजबूती भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

विदेशी मुद्रा भण्डार की मजबूती में छिपी चिंताएं

भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार 2025–26 के दौरान करीब 691–701 अरब डॉलर के स्तर पर रहा. यह भण्डार करीब 11 महीनों के आयात को कवर करने में सक्षम है. अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार यह सुरक्षित स्थिति है. हालांकि, सतही मजबूती के पीछे कुछ चिंताजनक संकेत भी नजर आते हैं. भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल–दिसंबर 2025 के दौरान पूंजी प्रवाह चालू खाते के घाटे को पूरा करने में पर्याप्त नहीं रहा, जिसके कारण भुगतान संतुलन के आधार पर विदेशी मुद्रा भण्डार में करीब 30.8 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई. रुपये पर भी दबाव बना रहा. वैश्विक अनिश्चितताओं, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के बहिर्गमन और तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण रुपये में अवमूल्यन की प्रवृत्ति देखी गई. यह स्थिति दर्शाती है कि भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार अभी मजबूत अवश्य है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा पूंजी प्रवाह और आरबीआई के हस्तक्षेप पर निर्भर है. यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं या वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ती है, तो रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.

क्या राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है

भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2025–26 में राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.4 फीसदी तक सीमित रखने में सफलता हासिल की, जबकि वित्त वर्ष 2024–25 में यह 4.8 फीसदी था. 2026–27 के बजट में इसे 4.3 फीसदी तक लाने का लक्ष्य है. पहली दृष्टि में यह वित्तीय अनुशासन (Fiscal Consolidation) की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि लगती है, लेकिन इसके पीछे के आर्थिक तथ्यों का गहन विश्लेषण आवश्यक है. वित्त मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2025–26 में केंद्र सरकार का कुल व्यय करीब 50.65 लाख करोड़ रुपये रहा, इसमें से 11.2 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) के रूप में अवसंरचना, रेलवे, सड़क, रक्षा और लॉजिस्टिक्स विकास पर खर्च किया गया. दूसरी तरफ सरकार की कुल प्राप्तियां (उधार को छोड़कर) करीब 34.96 लाख करोड़ रुपये रहीं. इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार को अपने खर्चों की पूर्ति के लिए करीब 15.69 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ा.यह राजकोषीय घाटे के रूप में परिलक्षित हुआ. राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने में सबसे बड़ी भूमिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर संग्रह की रही. वित्त वर्ष 2025–26 में सकल कर राजस्व (Gross Tax Revenue) करीब 42.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. यह पिछले साल की तुलना में करीब 11–12 फीसदी अधिक था. विशेष रूप से कॉर्पोरेट कर, आयकर और जीएसटी संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि हुई. जीएसटी संग्रह कई महीनों में दो लाख करोड़ रुपये प्रति माह के स्तर को पार कर गया. इससे सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिला. यहां देखने वाली बात यह है कि कर संग्रह में वृद्धि का बड़ा हिस्सा चुनिंदा क्षेत्रों और उच्च आय वर्ग से हासिल हुआ, जबकि ग्रामीण मांग और लघु उद्योग क्षेत्र अभी भी अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पाए हैं. इससे राजस्व वृद्धि की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं. भारत के राजकोषीय ढांचे की सबसे बड़ी चुनौती सार्वजनिक ऋण और उस पर होने वाला ब्याज भुगतान है. 2025–26 में केंद्र सरकार ने करीब 13 लाख करोड़ रुपये केवल ब्याज भुगतान पर खर्च किए, जो कुल राजस्व प्राप्तियों का करीब 40 फीसदी और कुल व्यय का करीब 25 फीसदी है. अर्थात सरकार द्वारा करों से अर्जित हर 100 रुपये का करीब 40 रुपये ब्याज चुकाने पर गया. यह स्थिति बताती है कि राजकोषीय घाटे में कमी के बावजूद ऋण-निर्भरता अभी भी उच्च स्तर पर बनी हुई है.

खाड़ी में जारी युद्ध की वजह से सरकार के ईंधन की जरूरतें पूरी करने के लिए अधिक खर्च करना पड़ रहा है.

खाड़ी में जारी युद्ध की वजह से सरकार के ईंधन की जरूरतें पूरी करने के लिए अधिक खर्च करना पड़ रहा है.
Photo Credit: PTI

वित्त वर्ष 2025–26 का राजकोषीय प्रदर्शन बताता है कि भारत सरकार घाटे को नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन यह सफलता अभी पूर्णतः संरचनात्मक नहीं कही जा सकती. घाटा कम होने का प्रमुख कारण उच्च कर संग्रह और नियंत्रित व्यय रहा है, जबकि सार्वजनिक ऋण और ब्याज भुगतान की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है. इसलिए वास्तविक राजकोषीय स्थिरता तभी प्राप्त होगी जब सरकार कर आधार का विस्तार करे, उत्पादक निवेशों को बढ़ाए, रोजगार सृजन को गति दे और सामाजिक और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करे. तभी राजकोषीय अनुशासन आर्थिक विकास का स्थायी आधार बन सकेगा. भारत का सबसे कमजोर पक्ष उसका व्यापार संतुलन है. 2025–26 में भारत का व्यापार घाटा करीब 333 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पिछले साल यह करीब 282 अरब डॉलर था. वस्तु निर्यात की वृद्धि सीमित रही जबकि आयात तेजी से बढ़ा. विशेष रूप से कच्चे तेल, सोना, पूंजीगत मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के आयात में वृद्धि हुई. सकारात्मक पक्ष यह है कि सेवा निर्यात, विशेषकर IT और व्यवसायिक सेवाओं ने व्यापार घाटे को कुछ हद तक संतुलित किया. प्रेषण (Remittances) भी महत्वपूर्ण सहारा बने रहे. इसके बाद भी वस्तु व्यापार में लगातार बढ़ता घाटा देश की बाहरी आर्थिक कमजोरी का संकेत देती है.

मजबूत जीडीपी के सामने चुनौती क्या है 

भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2025–26 में 6.6 से 7.4 फीसदी की GDP वृद्धि दर दर्ज कर विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी.भारत की GDP वृद्धि दर को लेकर सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रही हैं. वित्त वर्ष 2025–26 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर 6.6 से 7.4 फीसदी के बीच रही, जो अमेरिका (करीब 1.8–2.0 फीसदी), यूरो क्षेत्र (करीब 1 फीसदी) और जापान (करीब 0.8 फीसदी) की तुलना में कहीं अधिक है. भारत की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़कर करीब 4.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. इससे वह विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गई है. इस वृद्धि का प्रमुख आधार घरेलू उपभोग, सेवा क्षेत्र और सरकार का करीब 11.2 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय रहा है. विनिर्माण क्षेत्र, जिसे 'मेक इन इंडिया' और PLI योजनाओं के माध्यम से विकास का प्रमुख आधार बनाया गया था,अभी भी GDP में अपनी हिस्सेदारी को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने में सफल नहीं हो पाया है.

सबसे बड़ी चिंता यह है कि उच्च आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन अपेक्षित गति से नहीं बढ़ रहा है. संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े हैं, लेकिन बड़ी आबादी अभी भी असंगठित और कम आय वाले कार्यों पर निर्भर है. इसी प्रकार ग्रामीण आय और कृषि क्षेत्र की वृद्धि अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई है.इस वजह से ग्रामीण मांग में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है. आंकड़ों पर ध्यान दें तो बेरोजगारी दर अभी भी 5–6 फीसदी के बीच बनी हुई है, जबकि युवाओं में बेरोजगारी इससे कहीं अधिक है. कृषि क्षेत्र, जहां करीब 42 फीसदी कार्यबल कार्यरत है, जीडीपी में केवल 15–16 फीसदी का योगदान देता है. इससे आय असमानता की समस्या स्पष्ट होती है. विनिर्माण क्षेत्र का योगदान भी पिछले कई सालों से 16–17 फीसदी जीडीपी के आसपास ही सीमित है, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य इसे 25 फीसदी तक ले जाने का है.

रुपये का अवमूल्यन से बढ़ती आर्थिक अस्थिरता 

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का लगातार अवमूल्यन अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती है. वर्ष 2026 में रुपये का मूल्य 96 रुपये प्रति डॉलर के स्तर के आसपास पहुंच गया. इससे आयात-आधारित अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है. भारत अपने कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85 फीसदी आयात करता है, इसलिए रुपये के कमजोर होने से पेट्रोलियम आयात का वास्तविक खर्च बढ़ गया. परिणामस्वरूप तेल कंपनियों की लागत बढ़ी, परिवहन महंगा हुआ और मुद्रास्फीति पर दबाव पड़ा. रुपये की कमजोरी का प्रभाव केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा बल्कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, मशीनरी, उर्वरकों और अन्य आयातित वस्तुओं की लागत में वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ी. बढ़ते आयात बिल के कारण चालू खाते का घाटा और व्यापार घाटा दोनों विस्तृत हुए. हालांकि कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए कुछ हद तक लाभकारी माना जाता है, किन्तु भारत के निर्यात में आयातित कच्चे माल की हिस्सेदारी अधिक होने के कारण यह लाभ सीमित रहा. इसलिए रुपये का अवमूल्यन केवल मुद्रा बाजार की समस्या नहीं, बल्कि ऊर्जा निर्भरता, व्यापार असंतुलन और बाह्य क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरियों का संकेतक भी बनकर सामने आया है. इसने भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक स्थिरता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए.

देश में उच्च आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन उस तरह से नहीं हो पा रहा है, जैसा कि होना चाहिए.

देश में उच्च आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन उस तरह से नहीं हो पा रहा है, जैसा कि होना चाहिए.

भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आमतौर पर आर्थिक विकास और निवेशकों के विश्वास का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है. वित्त वर्ष 2025–26 में भारत में सकल FDI प्रवाह करीब 94–95 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, जो सरकार की निवेश-अनुकूल नीतियों, डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार और विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं की सफलता को दर्शाता है. इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, अक्षय ऊर्जा, वित्तीय सेवाओं और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में विदेशी निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई. लेकिन इन सकारात्मक आंकड़ों के पीछे एक चिंताजनक वास्तविकता भी छिपी हुई है. इसी अवधि में शुद्ध FDI (Net FDI) घटकर करीब 7.7 अरब डॉलर रह गया, जो पिछले कई वर्षों के निम्नतम स्तरों में से एक है. इसका प्रमुख कारण विदेशी कंपनियों द्वारा अर्जित लाभ का बड़े पैमाने पर अपने मूल देशों में हस्तांतरण (Repatriation) और भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में बढ़ता निवेश रहा. इससे स्पष्ट होता है कि भारत में आने वाली विदेशी पूंजी का बड़ा हिस्सा स्थायी रूप से घरेलू अर्थव्यवस्था में नहीं रुक रहा है. यह स्थिति बताती है कि केवल सकल FDI के रिकॉर्ड स्तर को आर्थिक सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता. वास्तविक चुनौती विदेशी निवेश को दीर्घकालिक उत्पादन, रोजगार सृजन, तकनीकी हस्तांतरण और निर्यात वृद्धि से जोड़ने की है. यदि शुद्ध निवेश लगातार निम्न स्तर पर बना रहता है, तो विदेशी निवेश का वास्तविक आर्थिक लाभ अपेक्षाकृत सीमित रह सकता है. अतः भारत को निवेश आकर्षित करने के साथ-साथ उसे दीर्घकालिक आर्थिक परिसंपत्तियों में परिवर्तित करने की रणनीति पर अधिक ध्यान देना होगा.

क्या भारत की विदेश नीति विफल हो रही है 

यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि वर्तमान आर्थिक चुनौतियां केवल विदेश नीति की कमजोरी का परिणाम हैं. वैश्विक तेल कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिका की व्यापार नीतियां, रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया की अस्थिरता जैसे अनेक बाहरी कारक भी भारत को प्रभावित कर रहे हैं. हां, यह अवश्य कहा जा सकता है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात बाजारों के विविधीकरण, प्रौद्योगिकी साझेदारी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक प्रभावी रणनीति विकसित करने की आवश्यकता है. सरकार ने अवसंरचना, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विनिर्माण विस्तार पर बल दिया है, लेकिन रोजगार, निर्यात प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में अपेक्षित परिणाम अभी पूर्ण रूप से दिखाई नहीं देते. इसलिए उपलब्धियों और सीमाओं दोनों का संतुलित मूल्यांकन आवश्यक है. अतः वर्तमान स्थिति को 'आर्थिक मंदी' नहीं बल्कि 'उच्च वृद्धि के साथ बढ़ती संरचनात्मक चुनौतियों का दौर' कहना अधिक उपयुक्त होगा. भारत की अर्थव्यवस्था अभी संकटग्रस्त नहीं है, लेकिन उसकी दीर्घकालिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह ऊर्जा निर्भरता कम करने, निर्यात क्षमता बढ़ाने, रोजगार सृजन को गति देने और निवेश को अधिक उत्पादक बनाने में कितनी सफल होती है. 

(डिस्क्लेमर: डॉक्टर समीर शेखर ओडिशा के भुबनेश्वर स्थित कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विपणन पढ़ाते हैं.नरगिस मोहापात्रा ओडिशा के भुबनेश्वर स्थित कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी के स्कूल ऑफ इकोनामिक्स एंड कॉमर्स में शोध छात्रा हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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