विगत दो दशकों में ब्रिक्स का रूपांतरण वैश्विक राजनीति की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है. वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए 'BRIC' शब्द गढ़ा था. तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह आगे चलकर ग्लोबल साउथ की एक प्रभावशाली बहुपक्षीय आवाज़ का आधार बनेगा. हालांकि, इसकी राजनीतिक जड़ें इससे पुरानी हैं. साल 1998 का रूस-भारत-चीन रणनीतिक त्रिकोण और 2003 का भारत-ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका संवाद मंच इसके महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती थे. 2006 में विदेश मंत्रियों की पहली आधिकारिक बैठक, 2009 में पहला शिखर सम्मेलन, 2011 में दक्षिण अफ्रीका का समावेश और 2024 में हुआ विस्तार, जिसमें ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देशों के समावेश ने ब्रिक्स को आकार और व्यापकता, दोनों के लिहाज से एक नया आयाम दिया. आज ब्रिक्स करीब 49 फीसद वैश्विक आबादी और क्रय शक्ति समानता के आधार पर विश्व के सकल घरेलू उत्पाद के करीब 40 फीसद का प्रतिनिधित्व करता है. वैश्विक व्यापार में भी इसकी हिस्सेदारी करीब 23 फीसद है.
पश्चिम का चश्मा और ब्रिक्स की विविधता
पश्चिमी विद्वानों और मीडिया के एक हिस्से द्वारा ब्रिक्स को अक्सर 'बंटा हुआ मंच' या कम प्रभाव वाले समूह के रूप में देखा जाता रहा है. इस आलोचना की एक सीमा यह है कि ब्रिक्स का मूल्यांकन अक्सर उन मानकों से किया जाता है, जो राजनीतिक और आर्थिक एकरूपता को बहुपक्षीय सहयोग की पूर्व शर्त मानते हैं. यूरोपीय संघ या जी-7 की तुलना में ब्रिक्स की प्रकृति अलग है.
ब्रिक्स में भारत और ब्राजील जैसे लोकतंत्र, चीन और रूस जैसी अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं और मध्य-पूर्व की राजशाहियां शामिल हैं. आर्थिक क्षमता में भी पर्याप्त अंतर है. इसके सदस्य देशों के बीच साझा सांस्कृतिक, भाषाई या ऐतिहासिक विरासत नहीं है. लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इतनी व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक विषमताओं के बावजूद कौन-से साझा हित उन्हें एक साथ रखते हैं. इन साझा हितों ने ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ के एजेंडे को आगे बढ़ाने में किस हद तक सक्षम बनाया है. ब्रिक्स की विशिष्टता राजनीतिक एकरूपता में नहीं, बल्कि विविधता के भीतर सहयोग, सह-अस्तित्व और बहुलतावाद में है.

ब्रिक्स में भारत और ब्राजील जैसे लोकतंत्र, चीन और रूस जैसी अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं और मध्य-पूर्व की राजशाहियां शामिल हैं.
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पश्चिम-विरोधी नहीं, सुधारवादी है ब्रिक्स
ब्रिक्स को लेकर एक आम धारणा यह है कि यह पश्चिम-विरोधी गुट है. वास्तव में, इसकी राजनीति को अधिक सटीक रूप से गैर-पश्चिमी और सुधारवादी कहा जा सकता है, जो अधिक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की वकालत करता है. ब्रिक्स मौजूदा वैश्विक संस्थाओं को समाप्त करने के बजाय उनमें अधिक प्रतिनिधित्व और सुधार की मांग करता है. इसकी राजनीति पश्चिम के साथ पूर्ण टकराव और पूर्ण सहयोग के बीच जटिल संतुलन में स्थित है.
ब्रिक्स का प्रमुख आग्रह वैश्विक संस्थाओं के लोकतांत्रीकरण, वैश्विक राजनीति के बहुध्रुवीकरण और ग्लोबल साउथ के लिए अधिक प्रभावी प्रतिनिधित्व से जुड़ा है. यह संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और सभ्यतागत सहयोग पर भी जोर देता है.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं आज अनेक संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही हैं. विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में इनके प्रतिनिधित्व और निर्णय-प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से असंतोष रहा है. ऐसे परिदृश्य में ब्रिक्स ग्लोबल साउथ को अपनी प्राथमिकताएं व्यक्त करने और साझा विकल्प तलाशने का अतिरिक्त मंच देता है.
ब्रिक्स का आर्थिक और संस्थागत आधार
ब्रिक्स की प्रासंगिकता केवल उसके शिखर सम्मेलनों और घोषणाओं में नहीं, बल्कि पिछले दो दशकों में विकसित हुए उसके संस्थागत तंत्र में भी दिखाई देती है. न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है. साल 2015 में स्थापित इस बैंक ने करीब 39 अरब डॉलर की लागत वाली 120 परियोजनाओं को वित्तपोषित किया है. उसने अपनी सदस्यता का विस्तार करते हुए बांग्लादेश, मिस्र, अल्जीरिया और उज्बेकिस्तान जैसे गैर-ब्रिक्स देशों को भी शामिल किया है.हाल के सालों में बैंक के वित्तपोषण में स्थानीय मुद्राओं की भूमिका बढ़ी है. साल 2024 में NDB बैंक की स्वीकृतियों का 43.5 फीसद सदस्य देशों की मुद्राओं में था. यह विकासशील देशों के लिए वित्तपोषण के ऐसे विकल्पों को बढ़ाता है, जो स्थानीय वित्तीय जरूरतों के अधिक अनुरूप हो सकते हैं. यद्यपि इसका वित्तीय आकार विश्व बैंक से छोटा है, फिर भी यह ग्लोबल साउथ के लिए वित्तपोषण का एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराता है.

ब्रिक्स की आर्थिक प्रासंगिकता अंतर-ब्रिक्स व्यापार में हुई वृद्धि से भी स्पष्ट होती है. संबंधित देशों के बीच व्यापार 2003 के बाद 13 गुने से अधिक बढ़ा और 2024 में 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा. चीन इस व्यापार का केंद्रीय संचालक बना हुआ है. फिर भी यह वृद्धि बताती है कि ब्रिक्स के भीतर आर्थिक सहयोग की संभावनाएं अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुई हैं. कुछ सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान की दिशा में भी प्रगति हुई है. इससे डॉलर पर निर्भरता के संभावित जोखिम कुछ हद तक कम हो सकते हैं. इसी संदर्भ में 'डी-डॉलराइजेशन' की बहस ने जोर पकड़ा है. हालांकि, निकट भविष्य में साझा ब्रिक्स मुद्रा की संभावना कम है और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की केंद्रीय भूमिका बनी रहने की संभावना है.
ग्लोबल साउथ के लिए भारत की भूमिका
ब्रिक्स के पूरे ताने-बाने में भारत की भूमिका विशेष महत्व रखती है. एक बड़े लोकतंत्र और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत ब्रिक्स की आंतरिक विविधता को राजनीतिक संतुलन प्रदान करता है. भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे लोकतंत्रों की मौजूदगी इस धारणा को चुनौती देती है कि ब्रिक्स केवल एक सत्तावादी मंच है.
भारत के लिए ब्रिक्स केवल एक बहुपक्षीय मंच नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रखने का अवसर भी है. नई दिल्ली पश्चिम और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक सेतु की भूमिका निभाने की कोशिश करती रही है. विकासात्मक, तकनीकी और आर्थिक सहयोग पर जोर इसी दृष्टिकोण का हिस्सा है.
उल्लेखनीय है कि ग्लोबल साउथ के लिए पश्चिमी प्रभुत्व का विकल्प खड़ा करना तभी अधिक विश्वसनीय होगा, जब प्रतिनिधित्व और नागरिक गरिमा के प्रश्नों को भी गंभीरता से लिया जाए. किसी वैश्विक परियोजना की शक्ति केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह बाहर की सत्ता-संरचनाओं को कितनी चुनौती देती है; यह भी महत्वपूर्ण है कि वह अपने संस्थागत विरोधाभासों को कितनी ईमानदारी से पहचानती और संबोधित करती है.
कैसी है ब्रिक्स के भविष्य की राह
आज दुनिया ऐसे मोड़ पर है, जहां अमेरिका और उसके सहयोगियों की वैश्विक शांति के गारंटर या विश्वसनीय मध्यस्थ की पारंपरिक भूमिका पर पहले की तरह सर्वसम्मति नहीं रह गई है. इस बदलते परिदृश्य में ब्रिक्स जैसे मंचों के लिए अधिक सक्रिय भूमिका की गुंजाइश पैदा होती है.
परंपरागत रूप से ब्रिक्स ने अपने अस्तित्व और आंतरिक एकता को बनाए रखने के लिए द्विपक्षीय संघर्षों में सीधे हस्तक्षेप से परहेज किया है. इस सावधानी ने उसे गंभीर मतभेदों के बावजूद एक साथ बने रहने में मदद की है. लेकिन यही सावधानी उसकी राजनीतिक प्रभावशीलता और वैश्विक विश्वसनीयता की सीमा भी बन सकती है.

यूक्रेन और ईरान जैसे संकटों के संदर्भ में ब्रिक्स के सामने कठिन प्रश्न है: क्या वह केवल संवाद और घोषणाओं का मंच बना रहेगा, या संकटों को कम करने और विश्वास-निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाएगा? चीन, भारत, ब्राजील और अन्य सदस्य यदि सामूहिक रूप से संवाद और विश्वास-निर्माण की पहल करें, तो ब्रिक्स एक उपयोगी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है. यह आसान नहीं होगा, क्योंकि स्वयं ब्रिक्स के भीतर इन संकटों को लेकर दृष्टिकोण अलग-अलग हैं. लेकिन शायद इसी विविधता के कारण संवाद के व्यापक मंच के रूप में उसका महत्व बढ़ सकता है. उसे अपनी सावधानी की रणनीति और अधिक सक्रिय वैश्विक भूमिका के बीच संतुलन तलाशना होगा.
(डिस्क्लेमर: डॉक्टर राजन कुमार दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फार रसियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज में पढ़ाते हैं.आलोक आजाद जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं, उससे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)