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OPINION

विरोध की आग में क्यों सुलग रहा है यूरोप, क्या ब्राजील में लूला की वापसी दिखाएगी दुनिया को रास्ता

यूरोप के कई देशों के युवा इन दिनो अपनी सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर है, ब्राजील में लूला डि सिल्वा ने बड़ी जीत दर्ज की है तो इजरायल में किसी पार्टी या गठबंधन को बहुमत नहीं मिली है.इन घटनाओं का नवउदारवाद से क्या नाता है बता रहे हैं डॉ. नीरज कुमार.

डॉ नीरज कुमार
  • कॉलमिस्ट
विरोध की आग में क्यों सुलग रहा है यूरोप, क्या ब्राजील में लूला की वापसी दिखाएगी दुनिया को रास्ता

21वीं सदी का यह तीसरा दशक वैश्विक स्तर पर एक अभूतपूर्व राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल का गवाह बन रहा है. इसने नवउदारवादी वैश्विक व्यवस्था (Neoliberal Global Order) के बुनियादी अंतर्विरोधों को पूरी तरह उजागर कर दिया है. ब्रितानी प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के 'TINA' (There Is No Alternative) और फ्रांसिस फुकुयामा के 'इतिहास के अंत' (End of History) के दावों के विपरीत, आज दुनिया भर की सड़कें और संसदें इस बात की गवाही दे रही हैं कि पूंजीवादी और बाजार-संचालित नीतियां आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में अक्षम साबित हुई हैं.

चाहे वह फ्रांस के स्कूलों और सड़कों पर भड़का छात्रों और आम जनता का गुस्सा हो, स्पेन में आवास संकट को लेकर सड़कों पर उतरा जन-आक्रोश हो, अल्बानिया में भड़की 'फ्लेमिंगो क्रांति' (Flamingo Revolution) हो, इजरायल में युद्ध और आर्थिक अनिश्चितता के बीच आया खंडित जनादेश हो या फिर ब्राजील में नवउदारवादी-दक्षिणपंथी ताकतों को पछाड़कर वामपंथ की ऐतिहासिक वापसी हो, ये सभी घटनाएं अलग-अलग होने के बाद भी एक ही वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक बीमारी के लक्षण हैं. यह बीमारी है: लोकतांत्रिक घाटा, बढ़ती असमानता और जनता की क्रय शक्ति पर पूंजी का बेलगाम नियंत्रण. 

नवउदारवाद का दार्शनिक आधार क्या है 

इस वैश्विक संकट को समझने के लिए डेविड हार्वे और नोम चॉम्स्की जैसे विचारकों के सैद्धांतिक दृष्टिकोण को समझना अपरिहार्य है, जिन्होंने नवउदारवाद के चरित्र का गहन विश्लेषण किया है. प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक डेविड हार्वे ने प्रतिपादित किया है कि नवउदारवाद का मूल उद्देश्य धन का सृजन करना नहीं, बल्कि पूंजीपति वर्ग की वर्गीय शक्ति की पुनर्स्थापना था. हार्वे के 'वंचित करके संचय' (Accumulation by Dispossession) के सिद्धांत के अनुसार, जब भी पूंजीवाद के सामने मुनाफे का संकट आता है, वह जनता की सार्वजनिक संपत्तियों का अपहरण शुरू कर देता है. इसके तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और आवास जैसी बुनियादी मानव आवश्यकताओं का निजीकरण (Privatization) करके उन्हें कमोडिटी (बिक्री की वस्तु) में बदल दिया जाता है. आज फ्रांस, स्पेन और अल्बानिया में जो जन-प्रतिरोध हो रहा है, वह वास्तव में इसी 'वंचना' के खिलाफ जनता की आत्मरक्षा की लड़ाई है. वहीं दूसरी ओर नोम चॉम्स्की ने रेखांकित किया है कि नवउदारवाद के कारण वैश्विक स्तर पर एक गहरा 'लोकतांत्रिक घाटा' (Democratic Deficit) पैदा हुआ है. चॉम्स्की के मुताबिक, आर्थिक नीतियों के महत्वपूर्ण निर्णयों को लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित संसदों से छीनकर गैर-निर्वाचित टेक्नोक्रेट्स, वित्तीय निकायों (जैसे IMF, ECB) और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स के हवाले कर दिया गया है. जनता चाहे किसी भी विचारधारा की सरकार चुने, पर्दे के पीछे नीतियां बाजार की ताकतों द्वारा ही तय होती हैं. जब यह लोकतांत्रिक छलावा अपनी सीमा पार कर जाता है, तो इजरायल जैसी राजनीतिक अस्थिरता और ब्राजील जैसी वैचारिक ध्रुवीकरण की स्थितियां उत्पन्न होती हैं.

फ्रांस में सड़क पर क्यों उतरे युवा

फ्रांस में 2026 की यह तिमाही अभूतपूर्व उथल-पुथल की गवाह बन रही है. सितंबर 2026 के मध्य से शुरू हुए फ्रांसीसी छात्र आंदोलनों ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया है. गंभीर राजकोषीय संकट और सुनियोजित बजट कटौती के कारण फ्रांस के शिक्षा बजट में भारी कमी की गई. इसके परिणामस्वरूप स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी, कक्षाओं में अत्यधिक भीड़ और जर्जर इमारतों जैसी बुनियादी समस्याएं खड़ी हो गईं. इसके साथ ही, भू-राजनीतिक तनावों (जैसे ईरान-यमन संघर्ष) के चलते ईंधन की बढ़ती कीमतों और कॉस्ट-ऑफ-लिविंग संकट ने आग में घी का काम किया. इसी के कारण देश के लगभग 3,700 उच्च विद्यालयों में से 1,000 से अधिक स्कूल ब्लॉक कर दिए गए. 17 अक्टूबर और 24 अक्टूबर 2026 को हुए राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों में करीब 8 लाख नागरिकों ने हिस्सा लिया. पेरिस सहित कई प्रमुख शहरों में हिंसक झड़पें, आगजनी और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं (करीब 6,800 से अधिक गिरफ्तारियां. इनमें से अधिकांश नाबालिग हैं). यह आंदोलन राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की उन नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ एक व्यापक सामाजिक विद्रोह बन चुका है, जिसने जन-अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा तंत्र को संकुचित कर दिया है. 

क्या बढ़ते किराए से परेशान हैं युवा

स्पेन में नवउदारवादी संकट का मुख्य चेहरा वहां का आवास और रियल एस्टेट बाजार है. अक्टूबर 2026 में, स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज को 29 नवंबर 2026 के लिए समय-पूर्व (Snap) आम चुनावों की घोषणा करने पर मजबूर होना पड़ा है. स्पेन के प्रमुख शहरों में पर्यटन के अनियंत्रित विस्तार, कॉर्पोरेट वित्तीयकरण और प्रवासन के चलते आवास और किराए की कीमतें आम नागरिकों की पहुंच से बिल्कुल बाहर हो चुकी हैं. युवा आबादी अपनी आय का 60-70 फीसद हिस्सा केवल किराए पर खर्च कर रहा है. पूरे स्पेन में लाखों लोग आवास को एक बुनियादी अधिकार (Housing Affordability) घोषित करने और किराए पर सख्त सरकारी नियंत्रण लगाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं. सांचेज सरकार ने जनता के इस तीव्र आर्थिक असंतोष और गुस्से को भुनाने और राजनीतिक गतिरोध को तोड़ने के लिए ही इस मध्यावधि चुनाव का दांव खेला है.

अल्बानिया की 'फ्लेमिंगो क्रांति' क्या है  

बाल्कन क्षेत्र के देश अल्बानिया में पिछले कई महीनों से चल रहे जन-आंदोलन ने अब एक पूर्ण राजनीतिक संकट का रूप ले लिया है. इसे 'फ्लेमिंगो क्रांति' (Flamingo Revolution) का नाम दिया गया है. यह विरोध आंदोलन तब भड़का जब प्रधानमंत्री एदी रामा की सरकार ने एक लक्जरी रिसॉर्ट परियोजना को मंजूरी दी, जिसे अमेरिकी पूंजीपति वर्ग और बाहरी कॉर्पोरेट हितों से जोड़ा गया. धीरे-धीरे इस आंदोलन में छात्र और आम जनता भी शामिल हो गई, जिन्होंने देश में बढ़ती आर्थिक स्थिरता की कमी, चरम स्तर के भ्रष्टाचार, जर्जर स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की अत्यधिक ऊंची फीस (High Tuition Fees) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. इन विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है. इसमें सरकारी मंत्रालयों और सुप्रीम कोर्ट की इमारतों को निशाना बनाया गया. अक्टूबर 2026 के अंत में, यह संकट तब चरम पर पहुंच गया जब विपक्षी सांसदों (सली बेरीशा के नेतृत्व में) ने संसद के भीतर ही फ्लेयर्स और धुआं छोड़ने वाले बम दाग दिए. इससे संसद में विधायी कार्यवाही पूरी तरह ठप हो गई. रामा सरकार ने दमनकारी कदम उठाते हुए हिंसक प्रदर्शनों में मौजूद रहने वाले हर नागरिक पर 5,500 यूरो तक का भारी जुर्माना लगाने का कानून पेश किया है. यह जुर्माना अल्बानिया की औसत मासिक आय का छह गुना है. 

क्या जर्मन सरकार सामाजिक सुरक्षा में कटौती कर रही है 

जर्मनी में नवउदारवादी नीतियों का संकट बढ़ती मुद्रास्फीति, ऊर्जा संकट और सरकार द्वारा प्रस्तावित बजट कटौतियों के रूप में सामने आया है. देश में जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर बजट कटौती के विरोध में किसान, मजदूर संगठन और नागरिक सड़कों पर उतर आए हैं. जर्मनी के इस जन-आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यूरोप का सबसे बड़ा आर्थिक इंजन भी नवउदारवादी दबावों और नीतियों के चलते नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा देने में विफल हो रहा है.

क्या मांग रहे हैं आर्मेनियाई नागरिक 

आर्मेनिया में विरोध-प्रदर्शनों की वजह नवउदारवादी आर्थिक तंगी के साथ-साथ संप्रभुता और सुरक्षा का संकट भी है. सरकार की आर्थिक नीतियों, रोजगार के घटते अवसरों और क्षेत्रीय संघर्षों के बाद पैदा हुए राष्ट्रीय सुरक्षा संकट के कारण बड़े पैमाने पर जन-प्रदर्शन हो रहे हैं. आर्मेनिया की सड़कों पर उतरी जनता सरकार के इस्तीफे और नवउदारवादी वित्तीय नीतियों से हटकर राष्ट्रीय सुरक्षा और आम जनता के कल्याण को प्राथमिकता देने की मांग कर रही है.

इजरायल के खंडित जनादेश के मायने क्या हैं  

मध्य पूर्व में जारी भीषण युद्धों (गाजा, लेबनान, ईरान संघर्ष) के साए में 27 अक्टूबर 2026 को हुए इजरायल की 26वीं नेसेट (Knesset) के चुनाव ने एक पूर्ण रूप से खंडित जनादेश को जन्म दिया है. कुल 120 सीटों वाली नेसेट में किसी भी गठबंधन या दल को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उनका पूरा गठबंधन बहुमत के आंकड़े से दूर है. वहीं विपक्षी 'बदलाव ब्लॉक', जिसका नेतृत्व आईडीएफ के पूर्व प्रमुख गादी आइजेनकोट की 'याशर' पार्टी कर रही है, वह 49-50 सीटों के अनुमानों के साथ मजबूती से खड़ा है. इसके साथ ही, अरब पार्टियों की सीटों में भी उल्लेखनीय बढोतरी हुई है.

इजरायल का खंडित जनादेश चॉम्स्की के उस सिद्धांत की पुष्टि करता है, जहां युद्धोन्माद और नवउदारवादी नीतियों का मेल समाज को अंदर से खोखला कर देता है. युद्ध के विशाल आर्थिक बोझ, बढ़ती महंगाई और अक्टूबर सात के सुरक्षा संकट को लेकर नेतन्याहू सरकार के प्रति गहरा जन-असंतोष था. इजरायल अब चार संभावित परिदृश्यों के मुहाने पर खड़ा है. एक अस्थिर गठबंधन सरकार, एक कमजोर अल्पसंख्यक सरकार, एक बेमेल राष्ट्रीय एकता सरकार या फिर पूर्ण राजनीतिक गतिरोध के बाद दोबारा चुनाव. यह अनिश्चितता दर्शाती है कि युद्ध और ध्रुवीकरण के बावजूद जनता अब राजनीतिक नेतृत्व पर बिना शर्त भरोसा करने को तैयार नहीं है. 

ब्राजील में वामपंथ की वापसी

यूरोप और मध्य पूर्व के इस संकट के विपरीत, लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा देश ब्राजील एक वैकल्पिक राह दिखाता प्रतीत हो रहा है. लुइज़ इनासियो लूला डी सिल्वा (Lula da Silva) के नेतृत्व में वामपंथी वर्कर्स पार्टी की सत्ता में वापसी वैश्विक नवउदारवादी ढांचे के समक्ष एक विकल्प की तरह हुई है. लूला की वापसी ने यह साबित किया कि जब नवउदारवाद जनता को बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है, तो संगठित कामकाजी वर्ग एक मजबूत विकल्प पेश कर सकता है. लूला सरकार ने सत्ता में आते ही सामाजिक कल्याण योजनाओं, भूख उन्मूलन कार्यक्रमों और न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि पर ध्यान केंद्रित किया है. ब्राजील का यह प्रयोग डेविड हार्वे के 'वंचित करके संचय' के विपरीत 'पुनर्वितरण के माध्यम से सशक्तिकरण' का एक मॉडल पेश करता है.

अंत में दुनिया आज एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है. इस संकट का समाधान कॉर्पोरेट्स को और अधिक टैक्स छूट देने या पुलिसिया दमन (जैसे फ्रांस और अल्बानिया में देखा गया) के जरिए प्रदर्शनकारियों को दबाने में नहीं है. इसका एकमात्र स्थायी समाधान आर्थिक नीतियों के केंद्र में 'मुनाफे' को हटाकर 'मानव और पर्यावरण' को स्थापित करने, संप्रभु लोकतांत्रिक अधिकारों को बहाल करने और संपत्ति के न्यायपूर्ण बंटवारे में निहित है. जब तक एक नया, समतावादी और कल्याणकारी वैश्विक विकल्प नहीं अपनाया जाता, तब तक जन-प्रतिरोध की यह मशाल बुझने वाली नहीं है.

(डिस्क्लेमर: डॉ नीरज कुमार बिहार के वैशाली स्थित डॉक्टर सीवी रमन विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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