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इंदिरा गांधी की सरकार ने साधु की भी कर दी थी नसबंदी, पढ़िए एक पीड़ित की आपबीती

अजय के शर्मा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 25, 2026 19:00 pm IST
    • Published On जून 25, 2026 11:51 am IST
    • Last Updated On जून 25, 2026 19:00 pm IST
इंदिरा गांधी की सरकार ने साधु की भी कर दी थी नसबंदी, पढ़िए एक पीड़ित की आपबीती

कुछ समय पहले पंजाब के मोहाली में मेरी मुलाक़ात गोरखपुर के रहने तपेश्वर यादव से हुई थी. अब 71 साल के हो चुके तपेश्वर ख़ुद को संत कहते हैं.  कबीर साहब को मानने वाले तपेश्वर का पंथी नाम चेतन दास है. उनसे बातचीत के दौरान अचानक मेरी नज़र उनके पेट पर चली गई. चेतन दास के सफ़ेद रंग के चोले के ठीक नीचे एक बड़े कट का निशान था. मैंने यूं ही उनसे पूछ लिया कि आखिर यह चोट कैसे लगी. उनका जवाब था कि यह 1970 के दशक में चले सरकारी नसबंदी अभियान के दौरान हुए ऑपरेशन का निशान है.

डॉक्टरों ने पेट में ही छोड़ दी थी कैंची

दरअसल 1975 में इंदिरा गांधी की सरकार ने नसबंदी का एक व्यापक अभियान चलाया था. इसमें बहुत सारे लोगों को जगह-जगह पर पकड़कर उनकी नसबंदी कर दी गई थी. चेतन दास ने बताया कि उस दिन वो बनारस से कुशीनगर की ओर पैदल जा रहे थे. तभी एक जीप में आए कुछ लोगों ने उन्हें जबरन पकड़कर बैठा लिया. फिर अस्पताल पहुंचाकर उनकी नसबंदी कर दी गई. चेतन दास को इस बारे में पहले से कुछ पता नहीं था. उनका ऑपरेशन बिगड़ गया. दोबारा ऑपरेशन करना पड़ा. डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि पहली बार उनकी नसबंदी ठीक से नहीं हो पाई थी, इसलिए दूसरा ऑपरेशन करना ज़रूरी है. दरअसल पहली बार के ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों के हाथ से कैंची उनके शरीर के भीतर ही छूट गई थी. उसे निकालने के लिए डॉक्टरों ने दोबारा ऑपरेशन किया. इसी वजह से उनके पेट पर आज ये बड़े-बड़े चीरे के निशान मौजूद हैं.

Tapeshwar Yadav,Chtan Das

चेतन दास के पेट में पड़ा ऑपरेशन का निशाना.
Photo Credit: Ajay Sharma

चेतन दास के परिवार में चार भाई-बहन हैं. उनके पिताजी का 1992 में निधन हो चुका है. चेतन दास की माताजी अभी जीवित हैं. चेतन दास ख़ुद कभी-कभी गोरखपुर चले जाते हैं और बाक़ी वक़्त भ्रमण करते रहते हैं. मोहाली में वह एक श्मशान के पास रहते हैं. वहां एक कबीर चौरा बना हुआ है. उन्हें कबीर के बीजक और अनुराग सागर की ख़ासी जानकारी है. चेतन दास ने बताया कि वह नसबंदी ऑपरेशन से पहले ही वैरागी हो चुके थे. उन्होंने बताया कि उस समय चले नसबंदी अभियान में किसी भी पुरुष को नहीं छोड़ा जा रहा था, चाहे वह गृहस्थ हो या संन्यासी.

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