पिछले 50 सालों में दिल्ली का चेहरा-मोहरा काफी बदल गया है. नई सड़कें, बड़े-बड़े रिहायशी इलाके, एनसीआर का विस्तार और दिल्ली मेट्रो ने शहर को नया रूप दिया है. लेकिन कुछ जगहें आज भी पुराने दिनों जैसी बनी हुई हैं. वे लगभग वैसी ही दिखती हैं, जैसी 1975 के इमरजेंसी से पहले वाले उथल-पुथल भरे दिनों में थीं. इन्हीं में से एक है ऐतिहासिक रामलीला मैदान. आज भी यहां 25 जून 1975 की गूंज सुनाई देती है. उस दिन चिलचिलाती गर्मी में विपक्षी दलों की भारी-भरकम रैली हुई थी. रामलीला मैदान के अंदर और बाहर तिल रखने की जगह नहीं थी. जब जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने पूछा,''क्या आप भारत में लोकतंत्र बचाने के लिए जेल जाने को तैयार हैं?'' तो लाखों हाथ एक साथ उठे थे.
कमला मार्केट के उदासीन आश्रम से दर्जनों साधु भी नेताओं को सुनने आए थे. क्या आपको याद है कोई और राजनीतिक सभा जिसमें साधु भी इस कदर मौजूद हों?
-
हाथ से निकल रही है AI की ताकत! Google DeepMind के पूर्व रिसर्चर ने भारत में दी सबसे बड़ी चेतावनी -
Shashi Tharoor EXCLUSIVE: NDTV World Summit 2026 में बदलते वर्ल्ड ऑर्डर पर शशि थरूर क्या बोले? -
'चीन से व्यापार भी, सतर्कता भी' : NDTV World Summit में शशि थरूर ने बताया क्यों जरूरी है मल्टी-अलाइनमेंट -
AI एक्ट्रेस टिली नॉरवुड को पसंद हैं शाहरुख खान, बोलीं- ‘ओम शांति ओम’ के रीमेक में करना चाहती हूं काम -
रिजीम चेंज नहीं... शशि थरूर ने दी नई परिभाषा, चुनाव आयोग और सरकार को भी दी नसीहत -
NDTV World Summit 2026 : शशि थरूर ने बताया- कांग्रेस को लेफ्ट की जरूरत क्यों -
NDTV World Summit में शशि थरूर ने समझाया कूटनीति का असली मतलब -
चीन पर इतनी निर्भरता भारत के लिए ठीक नहीं- NDTV World Summit में बोले शशि थरूर -
NDTV World Summit 2026 | AI से एडवांस्ड टेक्नोलॉजी तक, भारत की रिसर्च को कैसे मिलेगी नई उड़ान? -
दिल्ली एयरपोर्ट से होती है दुनिया में सबसे ज्यादा Uber बुकिंग, NDTV ग्लोबल समिट में डोमिनिक टेलर ने खोले राज
दिल्ली का रामलीला मैदान
रामलीला मैदान से आसफ अली रोड की तरफ देखें तो बहुत कुछ वैसा ही नजर आता है. पुरानी इमारतें, पुराना माहौल. लेकिन जवाहरलाल नेहरू मार्ग की ओर मुड़िए तो ऊंची-ऊंची इमारतें दिखाई देती हैं. इनमें राजधानी की सबसे ऊंची 101 मीटर वाला सिविक सेंटर भी शामिल है. 1975 में वहां नगर निगम का एक मंजिला दफ्तर और कुछ मकान थे. उनकी छतों पर लोग भीषण गर्मी में नेताओं के भाषण सुनने के लिए बैठे हुए थे.
ये विशाल रैली सिर्फ एक हफ्ते की तैयारी के बाद आयोजित की गई थी. जेपी, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, राज नारायण, प्रकाश सिंह बादल, चंद्रशेखर जैसे शीर्ष नेताओं ने गांधी शांति प्रतिष्ठान (जीपीएफ) में बैठकर तय किया कि 'मिसेज गांधी की फासीवादी राजनीति' से लोकतंत्र बचाने के लिए जनसभा जरूरी है.
आचार्य कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित जैसे वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी इन बैठकों में शामिल हुए. उस समय जीपीएफ विपक्ष का अनौपचारिक हेडक्वार्टर बन गया था, क्योंकि जेपी वहीं ठहरे हुए थे.
किन लोगों ने आयोजित की थी रामलीला मैदान में रैली
जैसे ही रैली की तिथि और जगह तय हुई, दिल्ली और आसपास के राज्यों से लोगों को जुटाने का काम स्थानीय नेताओं के हाथ आया. मदन लाल खुराना और वीके मल्होत्रा (जनसंघ), शांति देसाई और सिकंदर बख्त (कांग्रेस-ओ), संवल दास गुप्ता (भारतीय लोक दल) और युवा अरुण जेटली (एबीवीपी) सब रफी मार्ग पर वीपी हाउस के लॉन पर हर दूसरे दिन मीटिंग करते और रणनीति बनाते.
25 जून 1975 को सुबह से ही लोग रामलीला मैदान में पहुंचने लगे थे. लोग झंडे-बैनर लेकर, विपक्षी नेताओं की तस्वीरें हाथ में लिए हुए और नारे लगाते हुए रामलीला मैदान पहुंचे. ज्यादातर लोग बिहार से आए थे कुर्ता-पायजामा पहने, छोटे-छोटे बैग लिए हुए. उस समय पानी की बोतल साथ ले जाने का चलन नहीं था. कई लोग थर्मस लेकर आए थे. गांधी टोपी पहने हुए थे. मैदान के आसपास कई प्याऊ थे, जो ठंडा पानी देते थे.
रैली शुरू होने से पहले ही मैदान भर गया था. लाउडस्पीकर पर जेपी के पुराने भाषण चल रहे थे. आखिरकार शाम करीब चार बजे रैली शुरू हुई. संचालन मदन लाल खुराना कर रहे थे. उन्होंने जोरदार नारे लगवाए,'आवाज दो, हम एक हैं!' और 'जो हमसे टकराएगा,चूर-चूर हो जाएगा!' पूरी भीड़ ने पूरी ताकत से जवाब दिया.
रैली में मांगा गया था इंदिरा गांधी से इस्तीफा
सबसे पहले प्रकाश सिंह बादल ने पंजाबी में बोलकर इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की. फिर लालकृष्ण आडवाणी, आचार्य कृपलानी, राज नारायण, विजयलक्ष्मी पंडित, चरण सिंह और चंद्रशेखर ने सरकार की जमकर आलोचना की. कुछ स्थानीय नेता भी बोले.
इसके बाद खुराना ने सबसे प्रिय नेता जेपी को आमंत्रित किया. जब वे बोलने लगे तो अंधेरा होने लगा था. उन्होंने रामधारी सिंह 'दिनकर' की आग उगलती पंक्तियां दोहराईं- 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है'. वे शुरू से ही फॉर्म में थे. सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ाईं.
करीब 85 मिनट के भाषण में उन्होंने जोर देकर कहा कि इंदिरा गांधी को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए. जब उन्होंने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से सरकार के गलत आदेशों का पालन न करने की अपील की, तो वहां सन्नाटा पसर गया. जेपी के भाषण के बाद लोग अपने घरों की ओर लौटने लगे. तब किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कुछ ही घंटों बाद ही देश में इमरजेंसी लग जाएगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)