अमेरिका में इन दिनों चुपचाप एक क्रांतिकारी विचार पर काम हो रहा है. इस तरफ भारत सरकार को भी ध्यान देने की जरूरत है. दरअसल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की दिग्गज कंपनी ओपेनेएआई (OpenAI) ने अपनी पांच फीसदी हिस्सेदारी सरकार को देने पर बातचीत शुरू की है.
ओपेने एआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) सैम ऑल्टमैन और कुछ दूसरे सीईओ ने एक और बड़ा प्रस्ताव रखा है. वे चाहते हैं कि एक ऐसी सरकारी संस्था बनाई जाए जो अमेरिका की सभी बड़ी एआई कंपनियों, जैसे OpenAI, Anthropic, Google, Meta आदि में पांच-पांच फीसदी हिस्सेदारी रखे. यह कोई मामूली विचार नहीं है. यह विचार खुद बड़ी कंपनियों के बोर्डरूम से निकलकर आ रहा है.
इन कंपनियों का यह प्रस्ताव नया नहीं है. खबरों के मुताबिक सैम ऑल्टमैन ने 2025 की शुरुआत में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात के दौरान पहली बार इस पर चर्चा की थी. उसके बाद से ही वो व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ इस विषय पर बातचीत कर रहे हैं.
अमेरिकी सरकार 'अलास्का परमानेंट फंड' से अपने नागरिकों को राज्य के संसाधनों से होने वाली आय का हिस्सा देती है. आल्टमैन का मानना है कि इसी तरह एक मॉडल बनाया जा सकता है, इससे एआई से होने वाली आय का लाभ सीधे अमेरिकी जनता को मिल सकेगा, न कि केवल कंपनियों के शेयरहोल्डर को.
क्या है'पब्लिक वेल्थ फंड' का विचार
राष्ट्रपति ट्रंप ने अभी भी हाल ही में एयरफोर्स वन में पत्रकारों से कहा था कि अमेरिकी एआई कंपनियों में हिस्सेदारी लेना अमेरिकी जनता के साथ एक साझेदारी जैसा हो सकता है. इस साल अप्रैल में जारी किए गए OpenAI के एक पालिसी पेपर में भी एक 'पब्लिक वेल्थ फंड' बनाने का सुझाव दिया गया था. इसके मुताबिक यह फंड इन कंपनियों में शेयर रखेगा और उसका मुनाफा सभी नागरिकों में बांटेगा. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एक अन्य बड़ी एआई कंपनी 'Anthropic' इस बातचीत में शामिल नहीं है.
यह सब अचानक नहीं हो रहा है. ट्रंप प्रशासन पहले ही इंटेल और आईबीएम के साथ-साथ कुछ क्वांटम कंप्यूटिंग और क्रिटिकल मिनिरल कंपनियों में सीधे सरकारी हिस्सेदारी ले चुका है. डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद बर्नी सैंडर्स ने तो एक कदम आगे बढ़कर प्रस्ताव दिया है कि बड़ी एआई कंपनियों पर 50 फीसदी का 'स्टॉक टैक्स' लगाया जाए. इसके बदले में सरकार को उन कंपनियों में वोटिंग अधिकार और बोर्ड में सीटें मिलें. हालांकि इस विचार की आलोचना करने वालों में डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, दोनों शामिल हैं.
अगर कंपनियों में सरकार भी साझीदार होगी तो कैसे लागू होंगे नियम
इस विचार के आलोचकों का कहना है कि जो सरकार नियम (Regulation) बनाती है , वही अगर कंपनी की हिस्सेदार बन जाएगी, तो वह नियमों को ठीक से लागू नहीं कर पाएगी. उदाहरण के लिए, अगर सुरक्षा नियम लागू करने से कंपनी के शेयर की कीमत गिरती है, तो सरकार ऐसा करने से हिचकिचा सकती है.
कैटो इंस्टीट्यूट की जेनिफर हडल्स्टन ने एक अलग तर की चिंता व्यक्त की है. उनका कहना है कि प्राइवेट कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी से सरकार और मार्केट को अलग रखने के नियम कमजोर होते हैं. इससे सरकार खुद तय करने लगेगी कि कौन सी कंपनी जीतेगी और कौन सी हारेगी.
अमेरिका में जो आजमाया जा रहा है, वह इंडस्ट्रियल पॉलिसी का सचमुच एक नया मॉडल है. इसमें सरकार न तो मालिक-ऑपरेटर के तौर पर काम कर रही है और न ही केवल रेगुलेटर के तौर पर, बल्कि एक लंबे समय के लिए माइनॉरिटी इन्वेस्टर (कम हिस्सेदारी वाले निवेशक) के तौर पर काम कर रही है. यह प्राइवेट कंपनियों को आगे बढ़ने और मुकाबला करने में मदद करता है. इसके साथ ही यह डिप्लोमैटिक सपोर्ट, मार्केट तक पहुंच और खरीद-फरोख्त के जरिए जो फायदा होता है, सरकार उसमें से भी हिस्सा लेती है. यहीं से यह कहानी केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रह जाती है. भारत को इस मॉडल का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए. हो सकता है कि भारत के कुछ खास स्ट्रैटेजिक सेक्टर को इस चीज की जरूरत हो.

ओपेने एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन और कुछ दूसरे सीईओ का मानना है कि सरकार को एक ऐसी संस्था बनाना चाहिए, जो बड़ी कंपनियों में छोटी-छोटी हिस्सेदारी रखे.
भारत के लिए यह क्यों जरूरी है?
ऐतिहासिक रूप से भारत का तरीका रणनीतिक क्षेत्रों में बड़ी सरकारी कंपनियां बनाने का रहा है. पुराने जमाने में जब देश में पूंजी और निजी क्षमता की कमी थी, तब वह तरीका सही था. लेकिन आज की तकनीक की दौड़ में रफ्तार, जोखिम लेने की क्षमता और लगातार नए आविष्कार की जरूरत होती है. यह नियम एआई, डिफेंस टेक, स्पेस टेक, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों पर लागू होता है. सरकारी कंपनियों का ढांचा आमतौर पर इन गुणों को बढ़ावा नहीं देता है. भारतीय कंपनियों का मुकाबला अब केवल निजी विदेशी कंपनियों से नहीं है, बल्कि चीन जैसे देशों के सरकार के समर्थन वाले पूरे इकोसिस्टम से है. चीन में सरकार और निजी कंपनी के बीच का अंतर बहुत कम होता है.
भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिए हर क्षेत्र में खुद कंपनियां बनाकर उन्हें चलाने की जरूरत नहीं है. इसकी जगह सरकार ऐसा माहौल बना सकती है, जिसमें निजी कंपनियां और स्टार्टअप विश्वस्तरीय तकनीक और क्षमता विकसित करें. सरकार उनकी मदद सरकारी खरीद, लंबे समय के निवेश, कूटनीतिक सहयोग, निर्यात को बढ़ावा देने और स्पष्ट व स्थिर नियमों के जरिए कर सकती है.सरकार इसके बदले में कुछ चुनिंदा और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कंपनियों में छोटी हिस्सेदारी ले सकती है. लेकिन इस व्यवस्था को बहुत सावधानी से लागू करना होगा, जिससे बाजार में अनावश्यक दखल न हो और सरकार की निवेशक और नियामक (रेगुलेटर) की भूमिकाएं आपस में न मिल जाएं. यह एक वास्तविक चुनौती है.
भारत में निजी क्षेत्र में सरकारी भागीदारी का सफल मॉडल
दिलचस्प बात यह है कि भारत में ऐसा मॉडल पहले भी सफल रहा है. टाइटन की स्थापना 1984 में टाटा समूह और तमिलनाडु इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (TIDCO) के संयुक्त उपक्रम के रूप में हुई थी. आज, चार दशक बाद भी TIDCO के पास टाइटन की करीब 27.8 फीसद हिस्सेदारी है. इसकी कीमत करीब एक लाख करोड़ रुपये है. इसे भारत में किसी राज्य सरकार का सबसे सफल दीर्घकालिक निवेश माना जा सकता है.
टाइटन की सफलता यह सिखाती है कि यदि सरकार सही क्षेत्र की सही कंपनी में छोटी हिस्सेदारी लेकर कई सालों तक निवेश बनाए रखे, तो जनता को बड़ा आर्थिक लाभ मिल सकता है. वहीं, कंपनी का इनोवेशन, संचालन और प्रतिस्पर्धा पूरी तरह निजी क्षेत्र के हाथ में बनी रहती है.
अब भारत के सामने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कारण है कि वह इस मॉडल पर विचार करे. यदि सरकार केवल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को नियंत्रित करती है, तो वह केवल एक निष्पक्ष नियामक होती है. लेकिन अगर उसकी किसी AI कंपनी में हिस्सेदारी भी हो, तो उस उद्योग की सफलता में उसका सीधा आर्थिक हित जुड़ जाता है. अमेरिका पहले ही दिखा चुका है कि वह अपनी AI कंपनियों को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने के लिए सरकारी ताकत का इस्तेमाल करने को तैयार है.
पिछले महीने, अमेरिकी वाणिज्य विभाग के निर्यात नियंत्रण के कारण AI कंपनी एंथ्रोपिक को अपने दो नए AI मॉडल दुनिया भर के उपयोगकर्ताओं के लिए अस्थायी रूप से बंद करने पड़े. प्रतिबंध हटने के बाद ही सेवाएं दोबारा शुरू हो सकीं. इस घटना से यह साफ हुआ कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर एआई तकनीक की उपलब्धता को विदेश नीति और रणनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल कर सकता है.
यदि अमेरिकी सरकार इन कंपनियों में हिस्सेदारी भी रखती है, तो उसके पास उन्हें और अधिक आक्रामक तरीके से दुनिया भर में आगे बढ़ाने का आर्थिक कारण भी होगा. इसका असर भारत जैसे देशों पर पड़ सकता है, जहां ये कंपनियां डेटा सेंटर, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़े कारोबारी अनुबंधों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं.
अमेरिका की भारत पर निर्भरता
आज AI के क्षेत्र में एक असमान स्थिति दिखाई देती है. अमेरिका, डेटा और बाजार के विस्तार के लिए भारत पर काफी निर्भर है, लेकिन वह भारत को अत्याधुनिक कंप्यूटिंग क्षमता और सेमीकंडक्टर जैसी जरूरी तकनीकों तक पूरी पहुंच नहीं देता है. इससे भारत के लिए अपनी स्वतंत्र AI क्षमता विकसित करना मुश्किल हो जाता है.
ऐसे समय में भारत को दो बातों पर एक साथ ध्यान देना चाहिए.
पहली, सावधानी. आज AI, क्लाउड और कंप्यूटिंग उसी तरह रणनीतिक महत्व के क्षेत्र बन चुके हैं, जैसे पहले तेल पाइपलाइन और दूरसंचार नेटवर्क हुआ करते थे. ऐसे में यदि अमेरिकी सरकार अपनी AI कंपनियों में आर्थिक हिस्सेदारी रखती है, तो वह उन्हें वैश्विक बाजार में अपने हितों के अनुसार आगे बढ़ाने की और अधिक कोशिश कर सकती है.
दूसरा, अवसर. भारत भी इसी तरह का मॉडल अपनाकर अपने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मजबूत घरेलू कंपनियां तैयार कर सकता है. इससे विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी. इसके साथ ही, रक्षा, उपग्रह प्रक्षेपण और स्वच्छ ऊर्जा जैसी परियोजनाओं के लिए विदेशों में बोली लगाने वाली भारतीय कंपनियों को भी सरकार के समर्थन से अधिक भरोसा और विश्वसनीयता मिलेगी.
आज तकनीक केवल कारोबार का विषय नहीं रह गई है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और रणनीति का भी हिस्सा बन चुकी है. इसलिए दुनिया भर की सरकारें अब सिर्फ नियम बनाने वाली संस्थाएं नहीं हैं. वे निवेशक, बड़े ग्राहक, कूटनीतिक सहयोगी और अपने उद्योगों की रणनीतिक भागीदार भी बन रही हैं.
अमेरिका इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है. भारत को अमेरिकी मॉडल की पूरी तरह नकल करने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसके पीछे छिपे मूल विचार को नजरअंदाज करना भी भारत के हित में नहीं होगा.
डिस्क्लेमर: लेखक NDTV डिजिटल के चीफ कंटेंट ऑफिसर हैं, जिन्हें एडिटोरियल लीडरशिप, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और मीडिया बिजनेस स्ट्रैटेजी में दो दशकों से ज्यादा का अनुभव है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.