सत्तर के दशक में एक छोटे से शहर तक पहुंचने वाले अख़बारों या आने वाली पत्रिकाओं ने मुझे मेरे पहले जादूगर दिए- हॉकी का जादूगर ध्यानचंद, फुटबॉल का जादूगर पेले. यह सूची धीरे-धीरे बड़ी होती चली गई. जादूगर तो नहीं, लेकिन महानायकों जैसा दर्जा हासिल करने वाले कुछ लोगों ने मेरे बचपन को सजाए रखा. क्रिकेट की दुनिया में ऐसे नायकों की सूची ख़त्म ही नहीं होती थी- डॉन ब्रैडमैन, गैरी सोबर्स, विक्टर ट्रंपर, जैक हॉब्स, डब्ल्यूजी ग्रेस, फ्रैंक वॉरेल, वीनू मांकड, सुनील गावसकर, विश्वनाथ, विवियन रिचर्ड्स, क्लाइव लॉयड और कुछ समय बाद कपिल देव. जो टेनिस तब समझ में नहीं आता था, उसके भी हीरो थे- ब्योन बॉर्ग, मैकनरो, इवान लेंडल और बाद के दिनों में बोरिस बेकर तक. मुक्केबाज़ी में मोहम्मद अली और कुश्ती में दारा सिंह भी इस सूची में आते थे. बैडमिंटन में प्रकाश पादुकोन ने जो चमक बिखेरी, वह कुछ हमारे दिल के दीये में भी चली आई. महिला खिलाड़ियों में क्रिस एवर्ट लॉयड, नवरातिलोवा, मोनिका सेलेस, स्टेफ़ी ग्राफ़ और विलियम्स बहनें जीवन का अचरज और अभिमान बनाती रहीं. एथलीट पावो नुरमी और जेसी ओवंस की कीर्ति भी अपनी लगती रही. जब बचपन छूट गया, तब भी यह सूची बनी रही और इसमें नए नाम जुड़ते रहे. क्रिकेट में अजहरुद्दीन, सचिन, द्रविड़, कांबली से लेकर कोहली और वैभव सूर्यवंशी तक को देखता रहा हूं. टेनिस में पीट सैंप्रास, रोज़र फेडरर, नडाल, जोकोविच और अब सिनर और अल्काराज को देख लेता हूं कभी-कभी. फुटबॉल में माराडोना आया, जिदान आया, रोनाल्डो, रोमैरियो, रोनाल्दिन्हो आए. मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो आए, अब एमबापे आदि का दौर है.
सरहदें लांघ कर दिलों में जगह बनाते खिलाड़ी
ऐसा फैन तो मैं किसी खिलाड़ी का नहीं रहा कि पत्रिकाओं से उसकी तस्वीर काटूं या कहीं से उसका पोस्टर ला कर कमरे की दीवार पर चिपकाऊं. कभी-कभार कुछ पत्रिकाएं अपने बीच के पन्ने में एक पोस्टर दिया करती थीं, जिन्हें निकाल कर हम रख जरूर लिया करते थे, लेकिन उन्हें सजाने का खयाल कभी नहीं आया. लेकिन यह खयाल आता है कि खेलों ने हमें एक तरह की विश्व नागरिकता दी. ये खिलाड़ी भी अपनी सरहदें फलांग कर हमारे दिलों और घरों में आते रहे.पेले, माराडोना, बोर्ग और बेकर को यहां तक पहुंचने के लिए किसी पासपोर्ट, किसी वीज़ा की ज़रूरत नहीं पड़ी. वे मध्यवर्गीय घरों के तंग कमरों की पुरानी बोसीदा दीवारों पर किसी नए रंग की तरह लगाए-सजाए जाते रहे. युद्धों के जलते हुए समय भी दुनिया अगर बची रही तो इसलिए कि उनके ऊपर खेलों की छतरी थी- वह ओज़ोन परत जिसने धरती का तापमान इतना नहीं बढ़ने दिया कि वह जीने लायक न हो सके.
खेलों ने दुनिया को नई निगाह से देखने का नज़रिया भी दिया. फुटबॉल की दुनिया में विश्व शक्ति कहलाने वाले अमेरिका-चीन-रूस जैसे देश फुटबॉल में मामूली मुल्कों में बदल जाते हैं और ब्राजील और अर्जेंटिना से लेकर कैमरून और सेनेगल तक बड़े राष्ट्रों की तरह याद आने लगते हैं. बल्कि एक दौर में यह कहा भी जाता था कि फुटबॉल की दुनिया में जिसका कोई देश नहीं, उसका ब्राजील है.

अब 39 साल के हो चुके लियोनेल मेसी अपना अंतिम विश्व कप खेल रहे हैं.
1986 के वर्ल्ड कप में माराडोना का 'हैंड ऑफ़ गॉड'
अभी अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको में चल रहा फुटबॉल वर्ल्ड कप देखते हुए कई बातें याद आती रहीं. रांची में 1986 में टीवी आया था. 1986 में मैक्सिको में चल रहा फुटबॉल वर्ल्ड कप वह पहला फुटबॉल टूर्नामेंट था जिसे हम टीवी पर देख पा रहे थे. उस वर्ल्ड कप के क्वार्टर फ़ाइनल में ब्राज़ील और फ्रांस के बीच हुआ मैच शायद फुटबॉल के सबसे शानदार मुक़ाबलों में एक था. ब्राज़ील की टीम में सॉक्रेटिस और जीको जैसे बड़े खिलाड़ी थे, फ्रांस की टीम का स्टार प्लातिनी था. मुक़ाबला बराबरी पर था और पेनल्टी शूट आउट में फ्रांस ने ब्राजील को शिकस्त दे दी. यह क़ायदे से हमारी हार थी. हम ब्राज़ील के साथ थे. हम सन्नाटे में थे. उस शूट आउट में प्लातिनी ने गोल मिस किया था और सॉक्रेटीस ने भी, जो असंभव सा लगता था.
हालांकि उसी वर्ल्ड कप के फाइनल ने हमारा मलाल काफ़ी कुछ कम कर दिया ब्राजील नहीं तो अर्जेंटीना हमारा देश हो जाता था और उसने फ्रांस को नहीं, इंग्लैंड को हराया था. इस मुकाबले में भी डिएगा माराडोना का कमाल अपने शिखर पर था. उन्होंने पहला गोल तो वह किया जिसे उन्होंने ख़ुद 'हैंड ऑफ़ गॉड' बताया. दूसरा गोल उनके पांवों के उस नृत्य से बना था जो मैदान में बिजली की टेढ़ी-मेढ़ी लकीर खींचता हुआ एक सिरे से दूसरे सिरे तक पसर गया था और जिसके जादू में विरोधियों के पांव बंध गए थे. अगर बस पहले गोल की बदौलत अर्जेंटीना जीता होता तो वह एक शर्मिंदगी भरा दाग़ होता, लेकिन माराडोना के इस दूसरे गोल ने बताया कि असल में इसी टीम को आसमान पर छा जाना था क्योंकि उसके पास माराडोना नाम का सितारा था.पहले गोल में उन्होंने अंग्रेज़ों को छकाया और दूसरे गोल में मात दी.
माराडोना नहीं मेसी का दौर
तब से अब तक दुनिया बहुत बदल चुकी है. अब माराडोना नहीं मेसी है,बल्कि मेसी भी अपना आख़िरी वर्ल्ड कप खेल रहा है. अपना 39वां जन्मदिन मनाने से एक दिन पहले उसने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ जो खेल दिखाया, वह बताता है कि महानता क्या चीज़ होती है, कैसे बनती है. दिलचस्प यह है कि मैच के शुरू में ही उसने एक पेनल्टी गंवा दी- एक लगभग तय गोल, जिसे उसने गोलपोस्ट के बाहर मार कर एक असंभव अचरज पैदा किया. सब हैरान थे कि मेसी भी ऐसी चूक कर सकता है! मुझे तब प्लातिनी और सॉक्रेटीस याद आए, जिन्होंने एक ही मुक़ाबले में ऐसे शूट आउट खो दिए थे.

लियोनेल मेसी फीफा विश्व कप 2026 में अब तक सबसे अधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बने हुए हैं.
यह तो कोई फुटबॉल विशेषज्ञ ही बताएगा कि इन खिलाड़ियों के अलग-अलग कौशल क्या हैं, लेकिन मेरी समझ में बस यह आता है कि ये सारे खिलाड़ी जीतने के लिए नहीं, खेलने के लिए खेलते रहे. खेल में जीत शामिल रही, लेकिन उतनी भर जितना खाने में नमक होता है. वह न हो तो खाना बेस्वाद हो जाए, वह ज़्यादा पड़ जाए तो अखाद्य हो जाए. मेसी 2006 के वर्ल्ड कप में पहली बार आया था. तब वह 18 साल का खिलाड़ी रहा होगा. तब उसकी चमक अपनी उठान पर थी. वह तूफ़ान की तरह दौड़ता था और बिजली की तरह कौंधता था. इत्तिफ़ाक़ से यह वही वर्ल्ड कप था जिसके फ़ाइनल में जिनेदिन ज़िदान ने मैतराज़ी की छाती पर सिर से मारा था और मैदान से बाहर कर दिया गया था. दुनिया के महानतम खिलाड़ियों में एक ज़िदान के दिमाग़ में अचानक कौन सी आग जल उठी, जिसने उसे एक बेहद अहम मोड़ पर ऐसी नादान हरकत करने को मजबूर किया, इसको लेकर अरसे तक कयास लगाए जाते रहे. लेकिन वह वर्ल्ड कप इटली ने फिर पेनल्टी शूट आउट से जीत लिया था.
क्या अब मैदान में दौड़ नहीं पाते हैं मेसी
मेसी पर लौटें. फुटबॉल प्रेमी याद करते हैं कि वह पहले से मद्धिम है. वह मैदान पर चलता ज़्यादा है, दौड़ता कम है. लेकिन उसका जादू अब भी क़ायम है. सोमवार रात ऑस्ट्रिया के ख़िलाफ़ मैच में भी यही दिखा. वह एक खोए-खोए बादल की तरह लगता था जो अचानक बिजली में बदल जाता था. जैसे फुटबॉल पांव के संपर्क में आई नहीं कि एक जादू घटित हो जाता है और मेसी कुछ बदल जाता है. पेनल्टी मिस करने के बाद के जो दो गोल उसने किए, वे किसी करिश्मे से कम नहीं थे. गेंद उसके पांव पर आई भी नहीं थी कि उसकी लहराती हुई किक ने उसे दिशा दे दी. वह गोलपोस्ट से झूल गई. दूसरे गोल में उसने पहले मूव बनाया, फिर ऑस्ट्रिया की ओर से दो अच्छे बचाव देखे और फिर अचानक वही बिजली कौंधी जो सबके पांव बांथ देती है और गेंद गोलपोस्ट में दिखाई दी.
यह मेसी का जादू है या खेल का जादू है, जो जीतने से ज़्यादा खेलने में है, निशाना साधने से ज़्यादा खिलाड़ियों को बांधने में है. यह एक नृत्य है जिसकी लय के साथ सितारे बनते और टूटते हैं. लेकिन मेरी तरह के एक शौकिया खेलप्रेमी के लिए इन सबका क्या मतलब है? मेरी तरह के लोग अपनी रातें उन खिलाड़ियों और उन खेलों के लिए क्यों ख़राब करते हैं जो पूरी तरह समझ में भी नहीं आते? दरअसल यह मानवीय गरिमा है जो अपने उत्कृष्ट रूप में इन खेलों और इन नायकों में दिखाई पड़ती है. उनमें मानवीय क्षमताओं का, उसकी संभावनाओं का वह चरम रूप दिखता है जो हमें अपनी बहुत सारी विफलताओं, मायूसियों और थकान के बावजूद एक आस्था देता है, एक उल्लास देता है.हम अपनी-अपनी टीम चुन लेते हैं और अपने-अपने नायकों को पहचान लेते हैं. ये वे देश हैं जो हमारे भीतर बनते हैं और जिनकी नागरिकता हम तय करते हैं. यहां किसी पासपोर्ट, किसी वीज़ा, किसी पहचान पत्र की दरकार नहीं होती, कभी किसी मेसी-माराडोना के पांवों पर थिरकती गेंद होती है, कभी किसी विश्वनाथ और सूर्यवंशी के हाथों में कौंधता बल्ला होता है, कभी किसी जेसी ओवंस के कुलांचे भरते पांव होते हैं, कभी किसी ध्यानचंद की स्टिक होती है जो गुलाम भारत में गांधी की लाठी के अलावा दूसरी आज़ाद चीज़ होती है. यह वह दुनिया है जो हम रचते हैं. जिसमें देश और काल दोनों की सीमाएं बेमानी हो जाती हैं. मेसी हमारी इसी दुनिया में एक गोल चूकता और दो गोल कर हमारे उफ़ को हमारी वाह में बदल देता है. हम फिर अपनी नींद में हिलते-डुलते सपने देखते हैं और सोचते हैं कि आने वाले कल को क्या होगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक एनडीटीवी के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)