दिल्ली में जनगणना के पहले चरण के प्रारंभिक परिणाम आ गए हैं. इसके मुताबिक दिल्ली की आबादी 2.3 करोड़ से अधिक हो चुकी है. पिछले 15 सालों में इस आबादी में 37.5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह वही दिल्ली है जिसकी 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय आबादी करीब 10 लाख थी. यानी करीब 90 सालों में दिल्ली की आबादी पौने दो करोड़ तक बढ़ गई है. जनगणना 2027 के अंतिम परिणामों की प्रतीक्षा है, लेकिन पहला चरण स्पष्ट संकेत देता है कि दिल्ली अभी भी लोगों में आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.
दिल्ली के राजधानी बनने का प्रभाव
वर्ष 1911 में ब्रिटिश सरकार राजधानी को कोलकाता से दिल्ली लेकर आई. इसके बाद शहर का विकास तेजी से हुआ. उस समय दिल्ली की आबादी करीब 2.38 लाख थी. यहां यह बताना जरूरी है कि 1914 में यूपी के मेरठ और तब के पंजाब सूबे के बल्लभगढ़ के करीब पौने दो सौ गांवों का दिल्ली में विलय हुआ था. उसके बाद यहां नई राजधानी बनी. इसमें भव्य सरकारी भवन, सचिवालय और अन्य संस्थान शामिल थे. इससे नौकरियों, व्यापार और प्रशासनिक गतिविधियों में वृद्धि हुई. साल 1941 तक दिल्ली की आबादी बढ़कर 9.17 लाख हो गई. नई कॉलोनियों का विकास और बुनियादी ढांचे का विस्तार इस वृद्धि में सहायक रहा.
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आजादी के बाद दिल्ली का महत्व और बढ़ गया. संसद, विभिन्न मंत्रालय, दूतावास, हाई कोर्ट और तमाम सरकारी और गैर-सरकारी विभागों के दफ्तर यहां बने. नौकरशाही के विस्तार के साथ सरकारी कर्मचारियों, कारोबारियों और संबंधित व्यवसायों से जुड़े व्यक्तियों का यहां आना बढ़ा. इसके साथ ही देश भर के लोगों को दिल्ली आकर्षित करती रही है. वर्तमान में भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) होने के कारण केंद्र सरकार की योजनाओं, वित्तीय संसाधनों और अवसरों का केंद्र बिंदु होने से दिल्ली की जनसंख्या बढ़ रही है.
बंटवारे के बाद कितने शरणार्थी दिल्ली आए थे
जनसंख्या वृद्धि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मोड़ 1947 का भारत-पाकिस्तान विभाजन था. पाकिस्तान से लाखों हिंदू और सिख शरणार्थी दिल्ली पहुंचे. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में करीब 4.7 लाख शरणार्थी आए थे और करीब 3.2 लाख मुस्लिम पाकिस्तान गए थे. साल 1941 में दिल्ली की आबादी करीब नौ लाख थी. विभाजन के बाद 1951 में हुई जनगणना में दिल्ली की आबादी 17.4 लाख दर्ज की गई थी यानी कि 90 फीसदी की बढ़ोतरी. यह दिल्ली के जनगणना इतिहास में सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी.
दिल्ली आने वाले शरणार्थी मुख्य तौर पर पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब और सिंध से आए थे. उन्होंने शहर के विभिन्न हिस्सों में बसने की प्रक्रिया शुरू की. पटेल नगर, राजौरी गार्डन, किर्ती नगर, लाजपत नगर, डिफेंस कॉलोनी आदि कॉलोनियां इन्हीं शरणार्थियों ने बसाई हैं. शरणार्थियों ने मात्र संख्या ही नहीं बढ़ाई, बल्कि वो अपने साथ नई ऊर्जा, व्यावसायिक कौशल और परिश्रम की भावना भी लेकर आए थे. इन शरणार्थियों में कई व्यापारी, दुकानदार और कारीगर थे, जिन्होंने दिल्ली की अर्थव्यवस्था को रफ्तार दी.
हालांकि, आवास की कमी, स्लम बस्तियों का उदय और बिजली-पानी जैसी सुविधाओं पर दबाव जैसी चुनौतियां भी पैदा हुईं. सरकार ने शरणार्थी कॉलोनियों का विकास किया. इससे शहर का भौतिक विस्तार तेजी से हुआ.
दिल्ली की आबादी बढ़ाने में एशियाड का योगदान कितना है
यहां विभाजन के बाद भी देश भर से लोगों के आने का सिलसिला जारी रहा. राजधानी होने के कारण दिल्ली रोजगार का प्रमुख केंद्र बन गई. 1960-80 के दशक में औद्योगिक क्षेत्रों के विकास से मजदूरों, तकनीशियनों और अन्य कर्मियों का आगमन बढ़ा. 1961-71 के दौरान माइग्रेशन ने जनसंख्या वृद्धि में 62 फीसदी का योगदान दिया, जबकि 1971-81 में 60 फीसदी और 1981-91 में 50 फीसदी.
1982 में दिल्ली में आयोजित नौवें एशियाई खेलों (एशियाड) ने न केवल भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को निखारा, बल्कि राजधानी की जनसांख्यिकी को भी स्थायी रूप से प्रभावित किया. इस आयोजन के लिए विशाल बुनियादी ढांचे का निर्माण किया गया. स्टेडियम, सड़कें, फ्लाईओवर, होटल बने. इस निर्माण कार्य ने हजारों-लाखों मजदूरों को आकर्षित किया. इनमें से अधिकांश बिहार और उत्तर प्रदेश से आए थे. वे सस्ते श्रम के रूप में आए, अस्थायी झुग्गी-झोपड़ियों में रहते थे और न्यूनतम सुविधाओं के साथ दिन-रात मेहनत करते थे. बिहार और यूपी के ग्रामीण इलाकों से आने वाले इन युवा पुरुषों के लिए दिल्ली आर्थिक अवसरों का केंद्र बन गई. कृषि पर निर्भर इन राज्यों में रोजगार की कमी ने उन्हें मजबूर किया कि वे परिवार की आजीविका के लिए शहर का रुख करें.
एशियाड ने दिल्ली को आधुनिक बनाने में मदद की, लेकिन इससे प्रवासी मजदूरों की समस्या भी उभरी. इन श्रमिकों को औपचारिक आवास नहीं मिला, स्वास्थ्य और सुरक्षा की अनदेखी हुई. कई निर्माण दुर्घटनाएं भी हुईं. एशियाड के बाद अधिकतर मजदूर यहां स्थायी हो गए. इससे दिल्ली की जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हुई.
इस बीच दिल्ली में देश भर से लोग सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों की उपलब्धता के चलते भी आते रहे. दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान आदि संस्थानों ने देशभर से छात्रों को आकर्षित किया. 1990 के दशक के उदारीकरण के पश्चात् सूचना प्रौद्योगिकी, बीपीओ, खुदरा और टूरिज्म क्षेत्रों का विस्तार हुआ.
नीतियां, आर्थिक विकास और दिल्ली की चुनौतियां
दिल्ली का भौतिक विस्तार यमुना के पार, दक्षिण और पश्चिम दिशाओं में हुआ. मेट्रो रेल, रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) और हवाई अड्डों (IGI और जेवर) ने संपर्क बढ़ाया. स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार से मृत्यु दर घटी. इससे प्राकृतिक वृद्धि भी हुई. दिल्ली की उच्च प्रति व्यक्ति आय और आर्थिक गतिविधियां प्रवास को प्रोत्साहित करती रहीं. राजनीतिक महत्व भी ध्यान आकर्षित करता है. साल 2011 में एनसीटी दिल्ली की आबादी 1.67 करोड़ थी, जो अब 2.3 करोड़ से अधिक हो गई है. मेट्रो क्षेत्र की आबादी 3.5 करोड़ के आसपास पहुंच गई है.
आबादी में इस वृद्धि के साथ यातायात जाम, प्रदूषण, जल संकट, आवास की कमी और स्लम बस्तियों जैसी समस्याएं बढ़ी हैं. पुरानी दिल्ली की उच्च जनघनत्व वाली आबादी और नई बस्तियों का अनियोजित विकास इन चुनौतियों को जटिल बनाता है. दिल्ली समावेशी भी हुई है. दिल्ली की यह कहानी मात्र आंकड़ों की नहीं, बल्कि लाखों सपनों, संघर्षों और नई शुरुआतों की है. विभाजन की पीड़ा से उभरे शरणार्थियों ने शहर को नया रूप दिया, जबकि राजधानी का दर्जा और अवसरों ने शेष भारत को आकर्षित किया. आज 2.3 करोड़ से अधिक दिल्लीवासी इस महानगर को आगे बढ़ा रहे हैं. पर अब इस दिल्ली में समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)