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जीरो टॉलरेंस, सीईओ जैसी शैली... कुछ यूं शासन चलाते हैं CM योगी आदित्यनाथ

प्रो. दीप्ति तनेजा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 05, 2026 11:22 am IST
    • Published On जून 05, 2026 08:37 am IST
    • Last Updated On जून 05, 2026 11:22 am IST
जीरो टॉलरेंस, सीईओ जैसी शैली... कुछ यूं शासन चलाते हैं CM योगी आदित्यनाथ

किसी भी राज्य के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? यह एक गंभीर सवाल है और लोग इसका जवाब अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग ही देंगे. लेकिन, संदर्भ उत्तर प्रदेश का हो तो इसका सही जवाब है-विजन. किसी भी राज्य के विकास के लिए स्पष्ट विजन का होना जरूरी है. ऐसा न हो तो संसाधन बिखरते हैं, ऊर्जा का सही उपयोग नहीं पाता और लक्ष्य अधूरे रह जाते हैं. 2017 में जब एक भगवादारी संन्यासी योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली थी, कॉर्पोरेट जगत से लेकर सभी लोगों के मन में एक ही प्रश्न था कि क्या वह राज्य को विकास की राह पर ले जा पाएंगे? ऐसा राज्य जहां माफिया और अपराधियों की तूती बोलती हो, निवेशक आने से घबराते हों और जिसकी पहचान बीमारू के रूप में होती हो. लोगों के मन में यह प्रश्न उठना सहज ही था, क्योंकि प्रबंधन के स्तर पर राज्य की चूलें हिली हुई थीं. लोगों के प्रश्नों का जवाब उचित प्रबंधन ही दे सकता था और उसके बाद से अब तक का समय यदि इसकी मिसाल बना तो इसके पीछे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का स्पष्ट विजन ही था.

विजन का सही एग्जिक्यूशन

कॉर्पोरेट जगत में एक वाक्य बहुत कॉमन है- ‘मैनेजर काम सही करता है, लीडर सही काम कराता है.' यह योगी आदित्यनाथ की प्रबंधकीय दृष्टि ही थी कि उन्होंने सबसे पहले सही काम तय किए और इसे सही तरीके से करने की जिद पकड़ी. मूल सिद्धांत यह कि कानून का राज ही विकास की राह है. यह उनका एक रणनीतिक घोषणापत्र था, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को एक दिशा दी, एक उद्देश्य दिया. साथ ही एक कसौटी भी रखी जिसमें हर नीति, हर निर्णय और हर अधिकारी को परखा जा सके. विजन में ऐसी स्पष्टता हो तो एग्जिक्यूशन की धार अपने आप तेज हो जाती है. बीते नौ सालों में समावेशी विकास की महागाथा, विश्वस्तरीय आयोजन और 50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव, यह विजन के सही एग्जिक्यूशन से ही आए. इसीलिए योगी आज एक ऐसे मैनेजमेंट गुरु के रूप में देखे जा रहे हैं, जिनके फैसले केस स्टडी के रूप में प्रबंधकीय संस्थानों और छात्रों के लिए रुचि का विषय हैं.

जीरो टॉलरेंस बना ब्रांड पोजीशनिंग टूल

योगी सरकार का लक्ष्य था कि बीमार पड़े राज्य को पुनर्जीवित किया जाए. कॉर्पोरेट जगत में इस प्रक्रिया को 'टर्नअराउंड' कहते हैं. यह प्रक्रिया आसान नहीं थी. पुरानी जड़ें उखाड़ने से लेकर पुराने प्रशासनिक ढांचे तोड़ने थे. उन लोगों को भी बदलना था, जो वर्षों से 'यही होता आया है' की मानसिकता में जी रहे थे. 2017 के पहले की स्थिति ऐसी ही थी, जिसमें पूरा तंत्र जड़ हो चुका था. न कोई जवाबदेही थी और न ही कोई संस्कृति. उत्तर प्रदेश की पहचान 'दंगा प्रदेश' के रूप में थी और यह केवल एक छवि नहीं थी, यह अभिशाप था जो युवाओं को पलायन के लिए बाध्य कर रहा था तो उद्यमियों को आने से रोक रहा था. ऐसे में राज्य की अलग पहचान तभी हो सकती थी जब पूरी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर राज्य को ब्रांड बनाया जाए.

इसके लिए योगी आदित्यनाथ ने 'जीरो टॉलरेंस' नीति को एक 'ब्रांड पोजीशनिंग टूल' के रूप में इस्तेमाल किया. बुलडोजर ने अपराधियों के हौसले तोड़े तो माफिया के खिलाफ अभियान ने सीधा संदेश दिया कि कानून सबके लिए बराबर है. पूरी कठोरता से इस फैसले के क्रियान्वयन ने देश के उद्योग जगत को स्पष्ट 'मार्केटिंग सिग्नल'  दिया कि उत्तर प्रदेश बदल रहा है. परिणाम राजस्व की बड़ी उछाल के रूप में सामने आया और आज उत्तर प्रदेश देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है तो यह यहां के प्रबंधन मॉडल की सफलता का परिणाम है. 

कुशल सीईओ जैसी कार्यशैली

प्रबंधन में विजन और ब्रांडिंग से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है- एग्जिक्यूशन. व्यक्तिगत निगरानी और समय-सीमा के प्रति अटल प्रतिबद्धता. हर परियोजना की डेली मॉनीटरिंग, डैशबोर्ड रिव्यू और स्वयं मुख्यमंत्री की देर रात तक चलने वाली समीक्षा बैठकें, यह किसी स्टार्टअप के कुशल व मेहनती ‘सीईओ' की कार्यशैली नजर आती है. जब सबसे ऊपर बैठा व्यक्ति खुद जवाबदेह हो, तो पूरा सिस्टम उत्तरदायी हो जाता है. 2025 का महाकुंभ इस एग्जिक्यूशन की क्षमता का सबसे बड़ा और सबसे दृश्यमान प्रमाण था. 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का एक स्थान पर आना, मानव इतिहास का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक्स और भीड़ प्रबंधन का प्रयोग था. परिवहन, सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, डिजिटल सेवाएं, हर विभाग को एक साथ-एक लय में चलाना, यह तब ही संभव है जब 'सेंट्रलाइज्ड कमांड एंड कंट्रोल' व्यवहार में जीवित हो. महाकुंभ की सफलता ने प्रबंधन का ऐसा इतिहास लिखा कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ भी दौड़े चले आए.

ब्लू ओशन स्ट्रेटेजी

एक और पहलू है जिसे अनदेखा करना असंभव है- ‘ब्लू ओशन स्ट्रेटेजी.'  इस स्ट्रेटजी में आप प्रतिस्पर्धा से बाहर निकलकर एक नया और अछूता बाजार बनाते हैं, जहां कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं. जब सभी राज्य एक ही तरह की नीतियां अपना रहे थे, उत्तर प्रदेश ने 'वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट' (ओडीओपी) और बाद में 'वन डिस्ट्रिक्ट, वन कुज़ीन' (ओडीओसी) जैसे नवाचार किए. ओडीओपी राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा आधार बन गया. इस नीति ने लाखों कारीगरों को न केवल आजीविका दी, बल्कि उन्हें एक पहचान भी दी और यही किसी भी सफल संगठन की 'एचआर पॉलिसी' का सार होता है.

शोध का विषय बना यूपी मॉडल

किसी भी गंभीर संकट में प्रबंधन की असली परीक्षा होती है. उत्तर प्रदेश ने कोविड लहर में यह परीक्षा दो बार दी. ऑक्सीजन की कमी, स्वास्थ्य ढांचे की सीमाएं और लाखों जिंदगियों की जिम्मेदारी, इन सबके बीच जो प्रशासनिक प्रतिक्रिया सामने आई, वह 'इंटीग्रेटेड कोविड कमांड सेंटर' के रूप में थी. जिला स्तर पर निगरानी, ऑक्सीजन वितरण की रियल-टाइम ट्रैकिंग, दवाओं की उपलब्धता, यह सब उसी 'डैशबोर्ड गवर्नेंस' का विस्तार था जो इस सरकार की पहचान बन चुका है.

उत्तर प्रदेश का बदलाव प्रबंधन की बड़ी कहानी है और इसीलिए आज आईआईएम के शोधार्थी 'यूपी मॉडल' पर शोधपत्र लिख रहे हैं और हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू में उत्तर प्रदेश की चर्चा हो रही है. यह किसी राज्य के लिए सामान्य बात नहीं है. भगवा कपड़ों में एक संन्यासी का सीईओ रूप सभी को प्रभावित कर रहा है. योगी ने सिद्ध किया है कि नेतृत्व की कोई पोशाक नहीं होती और न ही इसके मूल में कोई पृष्ठभूमि होती है. जनता के प्रति प्रतिबद्धता निष्कपट हो, तो मठ से निकला एक संन्यासी भी देश की सर्वाधिक आबादी वाले राज्य का सबसे सफल 'टर्नअराउंड सीईओ' बन सकता है.

(डिस्क्लेमर: लेखक प्रोफेसर दीप्ति तनेजा दिल्ली  यूनिवर्सिटी में कल्चरल काउंसिल में ज्वाइंट डीन और दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर हैं और शिक्षाविद हैं. प्रोफेसर तनेजा ने 22 साल की उम्र में ही टीचिंग के प्रोफेशन में आ गई थीं. वो एमए, अर्थशास्त्र में गोल्ड मेडलिस्ट रही हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में वो सबसे कम उम्र की ज्वाइंट डीन और प्रोफेसर हैं. प्रोफेसर तनेजा को उनके प्रोफेशन में योगदान के लिए सरकार और गैर सरकारी संगठनों से पुरस्कार भी मिला है. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.) 

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