एजुकेशन के मामले में चीन दुनिया के कई देशों से काफी ज्यादा आगे है. चीन ने पिछले पांच सालों में अपनी यूनिवर्सिटीज में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव किया है. उसने 12,200 अंडरग्रेजुएट कोर्स बंद कर दिए हैं और उनकी जगह 10,200 नए कोर्स शुरू किए गए हैं. यह बदलाव चीन के कुल यूनिवर्सिटी कोर्स के 30% से भी ज्यादा हिस्से पर लागू हुआ है. ये सब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के लिए हुआ है. चीन सरकार उन कोर्सेस को खत्म कर रही है, जिनकी फ्यूचर में ज्यादा डिमांड नहीं होगी.
पुराने कोर्स हटाकर जोड़े गए एआई वाले कोर्स
जिन कोर्सेस को बंद किया गया है वो सभी आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज, विदेशी भाषाएं और जनरल मैनेजमेंट से जुड़े थे. इनकी जगह जो नए कोर्स लाए गए हैं, वे मुख्य रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स, एडवांस्ड कंप्यूटिंग और क्वांटम टेक्नोलॉजी से जुड़े हैं. चीन की टॉप यूनिवर्सिटीज अब 'एम्बॉडेड इंटेलिजेंस' (embodied intelligence) में डिग्रियां दे रही हैं, जो यह सिखाता है कि AI भौतिक दुनिया (physical world) के साथ कैसे काम करता है. वहां छह साल तक के छोटे बच्चों को भी पढ़ने और गणित के साथ-साथ 'एल्गोरिदम' (कंप्यूटर कोडिंग की समझ) सिखाया जा रहा है.
भारतीयों को इस खबर पर थोड़ी देर रुककर सोचने की जरूरत
नौकरियों और अर्थव्यवस्था में होने वाला यह बदलाव अब सिर्फ एक अंदाजा नहीं है. AI, मशीन लर्निंग, रोबोटिक्स और क्वांटम कंप्यूटिंग उद्योगों को पूरी तरह बदल रहे हैं, स्किल की उम्र छोटी कर रहे हैं और इंसानी मेहनत की कीमत को नए सिरे से तय कर रहे हैं. भारत के अपने इकोनॉमिक सर्वे 2024-25 ने भी इस खतरे को माना है. AI बड़े पैमाने पर उन कामों को खुद कर लेगा जिससे पैसा कमाया जाता है और इसका सबसे ज्यादा असर मध्यम और कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों पर पड़ेगा. यानी ठीक उसी वर्ग पर, जिसे आगे बढ़ाने के लिए हमारी यूनिवर्सिटी व्यवस्था बनाई गई है.
बेरोजगारी से भी बड़ी चुनौती
भारत के सामने अब सिर्फ बेरोजगारी की चुनौती नहीं है. चुनौती इससे भी ज्यादा खतरनाक है. बड़े पैमाने पर अनुत्पादकता यानी करोड़ों युवा भारतीय जो सीख रहे हैं और तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था जिसके लिए पैसे देने को तैयार है, उन दोनों के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि साल 2030 तक भारत के 63% वर्कफोर्स को AI और ऑटोमेशन के हिसाब से खुद को ढालने के लिए नए सिरे से हुनर सीखने की जरूरत होगी.
इतिहास में हम ऐसा पहले भी देख चुके हैं. भारत ने 1990 के दशक में IT (सूचना प्रौद्योगिकी) की लहर का फायदा इसलिए उठाया क्योंकि जब दुनिया को जरूरत थी, तब हमारे पास अंग्रेजी बोलने वाले इंजीनियरों की एक बड़ी संख्या मौजूद थी. भारत दुनिया की 'फार्मेसी' इसलिए बन सका क्योंकि हमने दशकों तक हेल्थ साइंसेज को चुपचाप बढ़ावा दिया था. भारत ने आर्थिक तरक्की की जो भी लहर पकड़ी, उसके पीछे हमारी शिक्षा व्यवस्था थी, जिसने सालों पहले ही सही समय पर सही हुनर वाले लोग तैयार कर दिए थे. अब AI की लहर भी हमारे सामने खड़ी है.
चीन ने पहले ही रख दी थी नींव
चीन ने यह काम बहुत बड़े पैमाने पर किया है. 1985 में, डेंग शियाओपिंग के 'चार आधुनिकीकरण' के तहत, बीजिंग ने अपनी शिक्षा व्यवस्था को केवल एक मकसद के लिए बदल दिया. औद्योगीकरण के तहत तकनीकी और व्यावसायिक पढ़ाई में छात्रों की संख्या 1978 के 5% से बढ़कर 1985 में 36% हो गई. यूनिवर्सिटी में दाखिले इस तरह तय किए जाते थे, ताकि देश को इंजीनियर, वैज्ञानिक और तकनीशियन मिल सकें. 1990 के दशक में जिस चीन ने दुनिया के बाजारों पर कब्जा किया, वह सिर्फ शेन्जेन के कारखानों में नहीं बना था, बल्कि उसकी नींव एक दशक पहले चीन के क्लासरूम्स में रखी गई थी.
1991 में जब भारत ने अपने आर्थिक सुधार शुरू किए, तब दोनों देशों की जीडीपी (GDP) और प्रति व्यक्ति आय लगभग बराबर थी. आज भारत 4.1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है, जबकि चीन 19 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका है. यानी भारत से लगभग पांच गुना बड़ा. यह अंतर शिक्षा और इंसानी हुनर पर लंबे समय तक लगाए गए दांव का नतीजा है.
यह लेख केवल अपनी कमियां निकालने के लिए नहीं है. हमारे IIT और IIM ने दुनिया के बेहतरीन लोग दिए हैं. भारत का स्पेस प्रोग्राम (इसरो) पूरे देश के लिए गर्व की बात है. हमारी 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' (NEP 2020) भी एक बेहतरीन और गंभीर दस्तावेज है. इसमें अलग-अलग विषयों को मिलाकर पढ़ने, कंप्यूटेशनल थिंकिंग और बचपन से ही टेक्नोलॉजी सिखाने पर जोर दिया गया है, जो हमारी सही सोच को दिखाता है. भारत साल 2027 से कक्षा 3 से ही सभी स्कूलों में AI का सिलेबस शुरू करने की योजना बना रहा है. सरकार ने शिक्षा में AI के लिए एक 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' की घोषणा भी की है.
अब भी बरकरार हैं कई चुनौतियां
लेकिन सिर्फ कागजी ढांचा या नीतियां बना देना असल दुनिया का बदलाव नहीं है. सिर्फ सोच रखने से काम नहीं होता, उसे जमीन पर उतारना पड़ता है. शिक्षा नीति (NEP) के बड़े इरादों की परीक्षा देश के उस जमीनी हालात से है, जहां आज भी बुनियादी साक्षरता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. जिस देश में अभी ठीक से पढ़ना नहीं आता, वहां एल्गोरिदम (कोडिंग) सिखाना एक हिमालय जैसी बहुत बड़ी चुनौती है.
यहां प्राइवेट सेक्टर (निजी क्षेत्र) पर भी सवाल उठाने की जरूरत है. भारत के प्राइवेट स्कूलों और कॉलेजों ने पिछले दो दशकों में नौकरियां दिलाने का वादा करके अपना बहुत तेजी से विस्तार किया है. लेकिन इनमें से कितनों ने AI के दौर के हिसाब से अपने कोर्स को असल में बदला है, न कि सिर्फ उनका नाम बदला है? कितने कॉलेज आज भी इंजीनियरिंग का वही पुराना सिलेबस और पुराना जनरल मैनेजमेंट कोर्स नए पैम्फलेट में लपेटकर बेच रहे हैं? सरकारी नियमों और मान्यता देने वाली संस्थाओं को अब इनसे कड़े सवाल पूछने चाहिए. कॉलेजों को आजादी (ऑटोनॉमी) तभी मिलनी चाहिए जब वे आज के दौर के हिसाब से काम करके दिखाएं.
सभी को मिलकर करना होगा काम
भारत को आज नीति निर्माताओं, उद्योगों, रिसर्च संस्थानों और अकादमिक जगत को एक साथ मिलकर उस रफ्तार से काम करने की जरूरत है, जो इस क्षेत्र ने पहले कभी नहीं देखी. उद्योगों को सिर्फ कॉलेजों से पास आउट होने वाले छात्रों का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें खुद आगे आकर कोर्स डिजाइन करने में मदद करनी चाहिए. इंजीनियरिंग कॉलेजों में जो पढ़ाया जाता है और टेक्नोलॉजी कंपनियों को जिसकी जरूरत होती है, उसके बीच का अंतर दशकों पुरानी समस्या है. लेकिन AI के इस दौर में यह अंतर बहुत खतरनाक साबित हो सकता है.
पाठ्यक्रम, R&D में निवेश और हम क्या और क्यों पढ़ा रहे हैं, इस पर आज लिए गए फैसले ही यह तय करेंगे कि भारत AI की इस नई दुनिया में एक लीडर (इनोवेटर) बनकर उभरेगा, या फिर एक महंगी डिग्री हाथ में लिए सस्ते मजदूर की तरह काम करेगा. चीन ने 1985 में अपनी शिक्षा पर दांव लगाया था और तीस सालों तक उसका फायदा उठाया. वह आज फिर से पूरे हौसले और साफ सोच के साथ अपना अगला दांव खेल रहा है. भारत के लिए सवाल यह नहीं है कि उसने इस बदलाव को देखा है या नहीं. सवाल यह है कि क्या हमारे सिस्टम में इतनी इच्छाशक्ति है कि हम सही रफ्तार और बड़े पैमाने पर इस पर काम कर सकें.