उत्तर प्रदेश के तमाम मदरसों में कामिल और फाजिल की डिग्री पर रोक लग सकती है. इसे लेकर यूपी कैबिनेट में एक प्रस्ताव रखा जाएगा, जिसके पास होते ही मदरसों में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन के कोर्स नहीं कराए जा सकते हैं. यानी यूपी के मदरसों में बच्चे सिर्फ 12वीं तक ही पढ़ सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि ऐसे कोर्स बिना यूजीसी गाइडलाइंस के चल रहे हैं, जिसके बाद यूपी सरकार ये फैसला लेने जा रही है. ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि मदरसों में पढ़ाई का पूरा पैटर्न क्या होता है और प्राइमरी से लेकर ग्रेजुएशन तक क्या टर्म इस्तेमाल किए जाते हैं.
मदरसों में पढ़ाई का सिस्टम ठीक वैसा ही है, जैसा दूसरे स्कूलों में होता है. हालांकि यहां एक ही मदरसे में पहली क्लास से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक कराई जाती है. हर स्तर की पढ़ाई को अलग इस्लामिक नाम से जाना जाता है.
प्राइमरी यानी तहतानिया
जब भी मुस्लिम छात्र सबसे पहले मदरसों में दाखिला लेते हैं तो इसे तहतानिया कहा जाता है. मदरसों में पहली क्लास से लेकर पांचवीं तक की पढ़ाई इसी के तहत होती है. इसका सिलेबस भी अलग होता है, जिसमें बुनियादी चीजों के अलावा धार्मिक ज्ञान भी दिया जाता है.
फौकानिया यानी जूनियर स्कूल
जूनियर स्कूलों में 6 से 8 तक की पढ़ाई होती है, इसी तरह मदरसों में इसे फौकानिया कहा जाता है. इसमें विषयों पर ज्यादा फोकस होता है और छात्रों को सामाजिक चीजों को लेकर बताया जाता है.
10वीं मतलब मुंशी या मौलवी
मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे जब 10वीं में जाते हैं तो इसे मुंशी या मौलवी के नाम से जाना जाता है. मुंशी की पढ़ाई के दौरान फारसी भाषा का ज्ञान दिया जाता है, वहीं मौलवी में अरबी भाषा सिखाई जाती है. इसके अलावा हिंदी, गणित और विज्ञान भी पढ़ाया जाता है.
12वीं को कहा जाता है आलिम
मदरसों में 12वीं की पढ़ाई को आलिम कहा जाता है. इसके तहत छात्रों को विषयों का गहरा ज्ञान और अलग-अलग स्ट्रीम चुनने की छूट दी जाती है. आलिम के बाद छात्र चाहें तो किसी दूसरे कॉलेज में एडमिशन ले सकते हैं.
कामिल-फाजिल से पूरी होती है पढ़ाई
ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की तर्ज पर मदरसों में कामिल और फाजिल की पढ़ाई होती है. ग्रेजुएशन को कामिल कहा जाता है, वहीं फाजिल करने वाले छात्रों को पोस्ट ग्रेजुएट माना जाता है.
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