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Success Story: 'शाबाश बेटा…दिल खुश कर दिया' दादा का सपना पूरा, BPSC में चौथी रैंक लाकर SDM बने परीक्षित मदान

9 साल के लंबे संघर्ष, 6 UPSC प्रयासों और कई असफलताओं के बाद मिली इस सफलता के पीछे उनके दादा का अधूरा सपना, परिवार का अटूट भरोसा और अनुशासित तैयारी की कहानी छिपी है.

Success Story: 'शाबाश बेटा…दिल खुश कर दिया' दादा का सपना पूरा, BPSC में चौथी रैंक लाकर SDM बने परीक्षित मदान
पिता की आंखों में आंसू, बेटे की ऐतिहासिक सफलता: BPSC में चौथी रैंक हासिल कर बने SDM

BPSC Success Story : “शाबाश बेटा…दिल खुश कर दिया...” BPSC का रिजल्ट जारी होने के बाद जब परीक्षित मदान ने अपने पिता को फोन किया, तो कुछ पल के लिए दूसरी तरफ खामोशी छा गई. पिता को यकीन ही नहीं हुआ कि उनका बेटा पूरे बिहार में चौथी रैंक लेकर आया है. उन्होंने बेटे से दोबारा रिजल्ट देखने को कहा. जब परीक्षित ने फिर पुष्टि की कि उन्होंने 589 अंकों के साथ चौथी रैंक हासिल की है, तो वो भावुक हो गए. उनकी आवाज भर्रा गई और उन्होंने कहा, “शाबाश बेटा… दिल खुश कर दिया.”

दिल्ली में रहकर तैयारी कर रहे हरियाणा के गुरुग्राम जिले के बादशाहपुर गांव के रहने वाले परीक्षित मदान के लिए यह सिर्फ एक परीक्षा में सफलता नहीं थी. यह उस संघर्ष का अंत था, जो लगभग 9 साल पहले शुरू हुआ था. इस सफर में कई असफलताएं आईं, लेकिन उन्होंने अपने कदम कभी नहीं रोके.

दादा का अधूरा सपना हुआ पूरा

परीक्षित एक किसान और कारोबारी परिवार से आते हैं. उनके पिता खेती के साथ-साथ जूतों का पारिवारिक व्यवसाय संभालते हैं. परिवार में कभी किसी ने प्रशासनिक सेवा में काम नहीं किया, लेकिन इस सपने की नींव उनके दादा आतम प्रकाश मदान ने रखी थी. NDTV से बात करते हुए परीक्षित बताते हैं कि उनके दादा का कभी सरकारी नौकरी में चयन हुआ था, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से वह गांव छोड़कर नौकरी जॉइन नहीं कर सके. दादा का वही अधूरा सपना पूरे परिवार का सपना बन गया.

पिता और चाचा ने भरोसा किया

वह कहते हैं, “मेरे पिता और चाचा ने मुझ पर पूरा भरोसा किया. उन्होंने मुझे दिल्ली भेजा ताकि मैं बिना किसी चिंता के पूरी लगन से सिविल सेवा की तैयारी कर सकूं.” इस पूरे सफर में उनकी मां उनकी सबसे बड़ी ताकत रहीं. वह बताते हैं कि हर दिन पढ़ाई खत्म होने के बाद मां से फोन पर बात करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था. अगर दिन अच्छा जाता तो खुशी साझा करते और अगर निराशा मिलती तो मां उनका हौसला बढ़ातीं. 

BBA की पढ़ाई

परीक्षित ने द नॉर्थकैप यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (BBA) की पढ़ाई की है. परिवार का व्यवसाय होने के कारण शुरुआत
में उनका झुकाव कॉरपोरेट सेक्टर की ओर था, लेकिन एक इंटर्नशिप ने उनकी सोच बदल दी. वह कहते हैं, “कॉरपोरेट सेक्टर को करीब से देखने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरी क्षमताओं का बेहतर उपयोग सिविल सेवा में हो सकता है, जहां मैं सीधे लोगों के जीवन में बदलाव ला सकूं.” यहीं से उन्होंने साल 2017 में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की. इतिहास उनका पसंदीदा विषय था, इसलिए उन्होंने इसे अपना ऑप्शनल सब्जेक्ट बनाया. बाद में इतिहास में M.A. किया और UGC NET JRF भी क्वालिफाई किया. वह PHD करने का सोच रहे थे, लेकिन तभी BPSC का परिणाम आ गया और उनका जीवन नई दिशा में आगे बढ़ गया.

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6 UPSC प्रयाल में फेल, पहले BPSC प्रयास में सफळ

परीक्षित को सफलता रातों-रात नहीं मिली. उन्होंने 6 बार UPSC की परीक्षा दी और दो बार मेंस परीक्षा तक पहुंचे, लेकिन लास्ट लिस्ट में जगह नहीं बना सके. इसके अलावा उन्होंने हरियाणा और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के इंटरव्यू दिए, पंजाब पीसीएस (PCS) की मेंस परीक्षा लिखी और कई अन्य राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं में भी हिस्सा लिया. हर बार कुछ नया सीखा, अपनी कमियों को समझा और तैयारी को बेहतर बनाया.  यही सालों का अनुभव उनके पहले BPSC में काम आया और उन्होंने चौथी रैंक हासिल कर ली.

प्रीलिम्स से इंटरव्यू तक... हर चरण के लिए अलग रणनीति

परीक्षित मानते हैं कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में एक ही रणनीति हर चरण के लिए काम नहीं करती. प्रीलिम्स के लिए उन्होंने NCERT और अन्य मानक पुस्तकों को कई बार पढ़ा. भूगोल को याद रखने के लिए नक्शों का सहारा लिया, जबकि इतिहास और राजनीति के लिए टाइमलाइन तैयार की. साथ ही BPSC, UPSC और अन्य राज्यों के पिछले सालों के प्रश्नपत्रों का गहन विश्लेषण किया. मेंस परीक्षा में उनका पूरा फोकस उत्तर लेखन पर रहा. वह रोजाना पिछले सालों के प्रश्नों पर उत्तर लिखते थे और उत्तरों को सटीक और एनेलेटिकल बनाने का अभ्यास करते थे.

करंट अफेयर्स के लिए उन्होंने अखबार को सबसे भरोसेमंद स्रोत माना. इंटरव्यू से पहले समय कम होने के कारण उन्होंने केवल एक मॉक इंटरव्यू दिया, लेकिन उनका मानना है कि नए अभ्यर्थियों को अधिक से अधिक मॉक इंटरव्यू देने चाहिए. इंटरव्यू को याद करते हुए परीक्षित ने बताया कि बोर्ड ने इतिहास और समसामयिक घटनाओं को जोड़ते हुए कई विश्लेषणात्मक सवाल पूछे. अमेरिका के इतिहास, समकालीन घटनाओं और कुछ सिचुएशनल सवालों पर उनकी समझ परखी गई. उनके मुताबिक, इंटरव्यू ने विषय के ज्ञान के साथ-साथ मौके पर लॉजिकल ढंग से सोचने की क्षमता को भी परखा.

सबसे कठिन लड़ाई खुद से थी

परीक्षित कहते हैं कि सिविल सेवा परीक्षा की सबसे बड़ी चुनौती किताबें नहीं, बल्कि लगातार उम्मीद बनाए रखना है. “जब इंटरव्यू में असफलता मिलती है, तो बाहर सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर बहुत उथल-पुथल होती है. फिर कुछ ही महीनों बाद अगली प्रीलिम्स की तैयारी शुरू करनी होती है. सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या इस बार की मेहनत भी कहीं अधूरी न रह जाए.”

इस मानसिक दबाव से निकलने के लिए उन्होंने अपने दिन की शुरुआत सुबह 5 बजे लाइब्रेरी पहुंचकर करनी शुरू की. सुबह के पहले तीन घंटे वह बिना मोबाइल, लैपटॉप या किसी भी डिजिटल डिवाइस के पढ़ाई करते थे. उनका मानना है कि यही डीप वर्क उनकी सबसे बड़ी ताकत बना. इसके बाद वह पार्क या जिम में व्यायाम करते थे, जिससे पूरे दिन सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती थी. वह कहते हैं, “शाम तक मोटिवेशन कम
हो जाता था, लेकिन तब तक दिन का सबसे महत्वपूर्ण काम पूरा हो चुका होता था. यही छोटी-छोटी आदतें सालों तक दोहराने से बड़ी सफलता मिली.”

‘सिर्फ मोटिवेशन नहीं, अनुशासन आपको मंजिल तक पहुंचाता है'

परीक्षित का मानना है कि इस परीक्षा में असफलता सफलता से कहीं अधिक सामान्य है. वह कहते हैं, “इसका मतलब यह नहीं कि आपकी क्षमता कम है. कई बार असफलताएं ही आपको बताती हैं कि तैयारी में कहां सुधार की जरूरत है. जब अनुभव, सही रणनीति और थोड़ी-सी किस्मत साथ आती है, तब सफलता मिलती है.”  उनके अनुसार, मोटिवेशन हमेशा स्थायी नहीं रहता, लेकिन अनुशासन हर दिन आपको लक्ष्य की ओर आगे बढ़ाता है.

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SDM के रूप में क्या होगी प्राथमिकता?

बिहार प्रशासनिक सेवा में SDM के रूप में चयनित होने के बाद परीक्षित की प्राथमिकता आम लोगों तक सरकारी सेवाओं की आसान और प्रभावी
पहुंच सुनिश्चित करना है. वह चाहते हैं कि उनकी जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं और जनसेवाओं की गुणवत्ता बेहतर हो तथा लोगों को प्रशासन का सकारात्मक अनुभव मिले.

BPSC अभ्यर्थियों के लिए परीक्षित की 3 सीख

परीक्षित की सलाह है कि एस्पिरेंट सबसे पहले परीक्षा के पैटर्न और पिछले सालों के प्रश्नपत्रों को अच्छी तरह समझें. कोचिंग पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय अपनी ताकत और कमजोरियों का स्वयं विश्लेषण करें. साथ ही, दूसरों से तुलना करने के बजाय आत्मचिंतन और अनुशासन को अपनी
तैयारी का हिस्सा बनाएं.

परीक्षित मदान की कहानी सिर्फ चौथी रैंक हासिल करने की नहीं है. यह एक अधूरे पारिवारिक सपने को पूरा करने, सालों तक असफलताओं
से सीखने और हर सुबह खुद को फिर से तैयार करने की कहानी है.

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