जसवंत सिंह खालरा की असली कहानी पर बनी हनी त्रेहान की फ़िल्म 'सतलुज' में कई विवाद सामने आए हैं. इनमें से एक है असल किरदारों के लिए काल्पनिक नामों का इस्तेमाल, खासकर डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस बिट्टा (डीजीपी केपीएस गिल) और पुलिस गुग्गा (वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजीत सिंह संधू) के लिए. क्या यह राज्य, खासकर पुलिस जैसे स्थायी तंत्र से बदले की कार्रवाई का डर है या फिर एक ऐसी स्थिति तैयार की गई है, जिससे किसी बात से आसानी से मुकरा जा सके. अगर यह डर की वजह से है, तो यह 'पुलिस-बचाव क्लब' में शामिल होने वाली सबसे नई फ़िल्म बन जाती है. संध्या सूरी की 2024 में आई फ़िल्म 'संतोष' पुलिस के अत्याचारों को दिखाती है. इस फिल्म को विदेशों में खूब सराहा गया था. लेकिन भारत में इसे रिलीज नहीं किया गया. ऐसा इसलिए क्योंकि फिल्म के निर्माताओं ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (सीबीएफसी) के सुझाए बड़े बदलावों को मानने से इनकार कर दिया था. अगर 'सतलुज' के निर्माताओं ने बाद में मुकरने की वजह से ऐसा किया है तो यह 'श्रोडिंगर की बिल्ली' जैसा है, जो एक ही समय में मरी हुई और ज़िंदा दोनों होती है. इसका फ़ायदा सिर्फ़ कभी-कभी ही मिलता है.
असली कहानी पर बनी फिल्में सच्चाई क्यों नहीं दिखातीं
असली घटनाओं या मशहूर कहानियों पर बनी फ़िल्में सच्चाई से क्यों हटती हैं. इसके तीन कारण हैं. इनमें से पहला है 'क्रिएटिव लाइसेंस' (रचनात्मक आज़ादी). क्रिस्टोफ़र नोलन ने 'द ओडिसी' की कास्टिंग में इसका इस्तेमाल किया था, खासकर उस बात को लेकर जिसने विविधता के विरोधियों को सबसे अधिक परेशान किया, हेलेन ऑफ़ ट्रॉय के रोल में केन्याई-मैक्सिकन एक्ट्रेस लुपिता न्योंगो को लेना (लेकिन लोग यह भूल गए कि 1950 में होमर की कविता को नाटक के रूप में दिखाने के लिए ओरसन वेल्स ने हेलेन के रोल के लिए अश्वेत एक्ट्रेस अर्था किट को कास्ट किया था). दूसरा कारण अक्सर हिंदी सिनेमा में अपनाया जाता है,जिससे वे किसी भी ज़िम्मेदारी से बच सकें. ऐसा अलग-अलग तरह के डायरेक्टर करते हैं, जैसे 'धुरंधर' में आदित्य धर (फिल्म की पहली स्लाइड में लिखा है कि यह असली घटनाओं से प्रेरित एक काल्पनिक कहानी है) और प्राइम वीडियो पर आई प्रोसिट रॉय की सीरीज़ 'राख' में भी पीड़ितों और दोषियों के नाम बदल दिए गए थे. लेकिन थोड़ी-बहुत समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि यह सीरीज़ 1978 की संजय और गीता चोपड़ा वाली भयानक घटना पर आधारित थी, जिसे 'रंगा-बिल्ला' नाम के अपराधियों ने अंजाम दिया था. प्रोडक्शन हाउस 'अप्लाज़' आसानी से इससे बच सकता था, अगर वे इस सीरीज़ को असल तथ्यों पर या कम से कम सुदीप चक्रवर्ती की किताब 'फॉलन सिटी: ए डबल मर्डर, पॉलिटिकल इनसैनिटी एंड दिल्लीज़ डिसेंट फ्रॉम ग्रेस' में बताई गई हत्याओं की सबसे भरोसेमंद जानकारी पर आधारित करते.
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यह भी कह सकते हैं कि असलियत यही है. हाँ, बॉलीवुड सस्ता है. यह किताबों और असल ज़िंदगी की कहानियों के अधिकार खरीदने या सही लोगों को श्रेय देने के बजाय, स्टार्स के साथ घूमने-फिरने वाले लोगों पर ज़्यादा पैसा खर्च करना पसंद करता है.
बायोपिक पर जनता का रिएक्शन
तीसरी वजह है 'आसानी से नाराज़ हो जाने वाले लोगों' का डर. ये ऐसे लोग और समूह हैं जो खुद को मशहूर करने का मौका मिलते ही सामने आ जाते हैं. ऐसा ही एक समूह है करणी सेना. उसने संजय लीला भंसाली की 2018 में आई फिल्म'पद्मावत' का विरोध किया था, जबकि डायरेक्टर ने साफ़ कहा था कि यह फ़िल्म मलिक मुहम्मद जायसी की कविता पर आधारित है न कि ज़्यादातर किताबों में बताई गई रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी की कहानी पर. भंसाली के सेट में तोड़-फोड़ की गई, उनकी हीरोइन की नाक काटने की धमकी दी गई और कई राज्य सरकारों द्वारा फ़िल्म पर बैन लगाने की कोशिश की. इससे इस फ़िल्म की रिलीज़ में देरी हुई. वहीं 2008 में आई आशुतोष गोवारिकर की फ़िल्म 'जोधा-अकबर' की रिलीज़ में भी इसी तरह की रुकावटें डालने की कोशिश की गई थी. वजह यह बताई गई कि जोधा ऐतिहासिक रूप से सही किरदार नहीं थीं. लेकिन अच्छी बात यह है कि किसी ने भी भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी फ़िल्मों में से एक, 1960 में आई 'मुग़ल-ए-आज़म' के बारे में ऐसा नहीं कहा.इसमें एक्ट्रेस दुर्गा खोटे ने राजकुमार सलीम (दिलीप कुमार) की ममतामयी मां जोधा बाई का किरदार निभाया था. ऐसे मामलों में होता यह है कि किसी को नाराज़ न करने की कोशिश में हर कोई नाराज़ हो जाता है.
'सतलुज' को हटाने पर Zee5 ने क्या कहा है
'सतलुज', जिसे पहले 'पंजाब 95' कहा जाता था के मामले में, सीबीएफसी ने 127 कट लगाने को कहा था.इसके बाद भी इसे Zee5 पर रिलीज़ किया गया, लेकिन 48 घंटे से भी कम समय के लिए. यह फ़िल्म पंजाब में उग्रवाद के दौरान लोगों की गैर-न्यायिक हत्याओं और सरकारी मंज़ूरी से किए गए हजारों अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार की घटना की खालरा द्वारा की गई जांच पर आधारित है. उस समय के सुरक्षा तंत्र को उसी कठोर नज़रिए से दिखाया गया है, जिसका वह हकदार है. तर्क यह दिया जा रहा है कि वह मुश्किल समय. कड़े फ़ैसले लेना समय की ज़रूरत थी. लेकिन इसकी स्ट्रीमिंग रोकने के लिए Zee5 को कहा गया था. लेकिन इसके बाद Zee5 ने जो सफ़ाई दी है, वह बेमतलब की बातों का अजीबोगरीब मिश्रण था. उसने कहा है,''मौजूदा घटनाक्रम (जिसका वे ज़िक्र नहीं करते) को देखते हुए,'सतलुज' अगले आदेश तक भारत में उपलब्ध नहीं होगी. हम सही प्रक्रिया अपनाते हुए हर उचित रास्ते की तलाश करने के लिए प्रतिबद्ध हैं ताकि जल्द से जल्द इस फ़िल्म को अपने दर्शकों तक वापस लाया जा सके.'' दूसरे शब्दों में कहें तो बस बेकार की बातें.
फ़िल्म निर्माताओं ने इस फ़िल्म को रिलीज़ कराने की कोशिश में तीन साल बिताए. दूसरे फ़िल्म निर्माताओं के लिए यह संदेश निराशाजनक है. असली घटना पर आधारित कोई भी फ़िल्म, जब तक कि वह किसी की तारीफ़ में बनी जीवनी न हो, उसे आम सहमति या किसी कमेटी के ज़रिए ही बनाया जाना चाहिए. लेकिन कला तो बारीकियों के बारे में है. इसमें कई तरह की बातें हो सकती हैं और फिर भी एक खास नज़रिया भी हो सकता है. कानून का शासन और निष्पक्ष रूप से चलने वाले सांस्कृतिक संस्थान ऐसे विचारों को फैलाने के लिए होते हैं, जो आराम से रहने वालों को बेचैन करें और बेचैन लोगों को सुकून दें. इसका दूसरा विकल्प ऐसे लोग हैं, जो एक जैसे बचकाने हैं और एक जैसा सोचते और महसूस करते हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)