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पंजाब के चुनावों से क्यों दूर हो रहे NRI? टूटते भरोसे, जमीन विवाद और कानून-व्यवस्था पर उठे सवाल

2017 में किया समर्थन, 2027 में बढ़ रही दूरी... पंजाब के NRI वोटरों की नाराजगी की कहानी

पंजाब के चुनावों से क्यों दूर हो रहे NRI? टूटते भरोसे, जमीन विवाद और कानून-व्यवस्था पर उठे सवाल
पंजाब से क्यों नाराज हैं NRI?
  • 2012 और 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों में विदेशों में बसे पंजाबियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया
  • एनआरआई पंजाबियों को चुनावों में वादे तो किए गए, लेकिन उनकी जमीन और संपत्तियों की सुरक्षा नहीं हो पाई है
  • पंजाब में बिगड़ती कानून-व्यवस्था, गैंगस्टर और भ्रष्ट पुलिस की मिलीभगत से एनआरआई की जमीनों पर कब्जे बढ़े हैं

2012 और 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों में विदेशों में बसे पंजाबियों (NRI) ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. उन्होंने 'चलो पंजाब' अभियान चलाया और चार्टर्ड फ्लाइट तक बुक कराईं. उन्हें भरोसा था कि उनकी भागीदारी से बदलाव आएगा और पंजाब फिर सही रास्ते पर लौटेगा.

पंजाबी भावुक मिजाज के माने जाते हैं. 2012 और 2017 के चुनावों में उनके बीच नई उम्मीद जगी थी. 2012 में मनप्रीत सिंह बादल ने 'पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब' बनाई थी और 2017 में आम आदमी पार्टी ने राज्य की राजनीति में एंट्री की थी. दोनों पार्टियों को ऐसे विकल्प के तौर पर देखा गया जो खेती और सामाजिक समस्याओं से जूझ रहे पंजाब को नई दिशा दे सकती थीं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

'स्वर्ग जैसे वादे किए, मिला नरक'

जालंधर के दयालपुरी इलाके से जुड़े एनआरआई हरजिंदर सिंह राजा ने NDTV से कहा, 'हमें चुनावों में स्वर्ग जैसे वादे किए गए थे, लेकिन मिला नरक. वे भी कोई बदलाव नहीं ला सके. सब एक जैसे हैं.' हरजिंदर सिंह राजा का यह बयान विदेशों में बसे पंजाबियों की निराशा को साफ दिखाता है.

कैलिफोर्निया में रहने वाले एक अन्य एनआरआई पंजाबी गुरदास सिंह तुर का कहना है कि सरकारों के वादे पूरे न होने की वजह से एनआरआई अब चुनावों में रुचि नहीं ले रहे हैं. उन्होंने कहा, 'सरकारों का कामकाज पहले जैसा ही रहा. एनआरआई का इस्तेमाल तो किया जाता है, लेकिन उनकी संपत्तियों और अपनी जमीन से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. यही वजह रही कि 2022 विधानसभा चुनाव में भी पहले जैसा उत्साह नहीं दिखा.'

दिलचस्प बात यह है कि पिछले 10 सालों में पंजाब में कुछ एनआरआई वापस लौटकर बसने भी आए, लेकिन खेती और सामाजिक समस्याएं जारी रहने के कारण यह रुझान ज्यादा आगे नहीं बढ़ सका. हरजिंदर सिंह राजा भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं. उन्होंने गांव में बदलाव लाने के लिए पंचायत चुनाव भी लड़ा था.

अमेरिकी नागरिक रहे कुलदीप सिंह ढालीवाल ने 2022 में अजनाला विधानसभा सीट से आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता था. उन्हें एनआरआई मामलों का मंत्री बनाया गया, लेकिन 3 जुलाई 2022 को उन्हें कैबिनेट से हटा दिया गया.

हरजिंदर सिंह राजा ने कहा, 'एनआरआई बदलाव की उम्मीद में वोट देते हैं ताकि उनकी बात सुनी जाए. 2017 और 2022 के चुनावों में एनआरआई ने सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को हर तरह का समर्थन दिया, लेकिन कुछ नहीं बदला. एनआरआई से किए गए वादे पूरे नहीं हुए. उनकी संपत्तियां अब भी छीनी जा रही हैं, भ्रष्टाचार गहरे तक फैला हुआ है और गैंगस्टरों की जबरन वसूली के कारण कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हुई है. अब एनआरआई अपनी जमीन और घर बेच रहे हैं.'

आरोप हैं कि 25,000 एनआरआई सदस्यों वाली संस्था एनआरआई सभा के कामकाज में भी सरकारी हस्तक्षेप हुआ. लालफीताशाही और दखल की वजह से एनआरआई इस संस्था से दूर होते गए. 2013 में एनआरआई सभा के चुनाव में 17,000 एनआरआई ने हिस्सा लिया था, लेकिन 2020 में यह संख्या घटकर सिर्फ 170 रह गई. इससे साफ है कि विदेशों में बसे पंजाबी अपनी ही संस्था में रुचि खो रहे हैं.

चुनावों से दूरी सिर्फ एनआरआई सभा तक सीमित नहीं है. पंजाबी प्रवासी अब विधानसभा चुनावों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से भी दूर होते जा रहे हैं.

अपनी जमीन-जायदाद को लेकर क्यों चिंतित हैं एनआरआई?

एनआरआई पंजाबियों के चुनावी प्रक्रिया से दूर होने की सबसे बड़ी वजह राज्य में बिगड़ती कानून-व्यवस्था बताई जा रही है. उनका कहना है कि गैंगस्टर, भ्रष्ट पुलिसकर्मी और कुछ रिश्तेदार मिलकर एनआरआई की जमीनों पर कब्जे, फर्जी बिक्री और जबरन वसूली जैसे मामलों को बढ़ावा देते हैं.

पुलिस-गैंगस्टर गठजोड़ का मामला सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं है. हाल ही में अमेरिकी जांच एजेंसी FBI की चार्जशीट में लॉस एंजेलिस के एक पंजाबी परिवार से जुड़े करोड़ों रुपये की उगाही के मामले में पुलिस-गैंगस्टर गठजोड़ का जिक्र किया गया. इसके बाद पंजाब पुलिस ने आरोपी पुलिस इंस्पेक्टर गुरिंदरजीत सिंह नागरा को गिरफ्तार किया.

फ्रांस में रहने वाली लुधियाना की एनआरआई महिला जोगिंदर कौर संधू पिछले दो दशकों से अपनी जमीन वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं. उनका आरोप है कि पंजाब पुलिस की मिलीभगत से भूमि माफिया ने उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया.

जून 2023 में 76 वर्षीय कनाडाई एनआरआई अमरजीत कौर ने आरोप लगाया था कि जगराओं से आम आदमी पार्टी की विधायक सर्वजीत कौर मानुके ने हीरा बाग स्थित उनके मकान पर अवैध कब्जा कर रखा है। मीडिया में मामला आने के बाद मकान खाली कराया गया.

पंजाब सरकार ने एनआरआई के लिए एक वेबसाइट भी बनाई है, लेकिन एनआरआई इसे सुरक्षित नहीं मानते. उनका कहना है कि चुनावों में बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन हकीकत इसके उलट रही.

एनआरआई सभा पंजाब के पूर्व अध्यक्ष जसवीर सिंह गिल ने NDTV से कहा, 'एनआरआई के हितों की रक्षा के लिए ईस्ट पंजाब अर्बन रेंट रेस्ट्रिक्शन एक्ट, 1949 की धारा 13-बी में संशोधन किया गया है. इसमें कब्जे हटाने और मालिक को तुरंत संपत्ति का अधिकार देने का प्रावधान है. लेकिन इससे एनआरआई की संपत्तियां सुरक्षित नहीं हो पाई हैं. विशेष एनआरआई राजस्व अदालतें भी हैं, लेकिन वहां एनआरआई संपत्तियों के अलावा अन्य मामलों का भी भारी बोझ है.'

मतदाता सूची को लेकर भी बढ़ी चिंता

2022 की तरह 2027 के विधानसभा चुनावों में भी बड़ी संख्या में एनआरआई वोटर पंजाब नहीं आ सकते. इसकी एक वजह ऊपर बताए गए कारण हैं, वहीं दूसरी वजह स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को माना जा रहा है. चुनाव आयोग ने एनआरआई के लिए ऑनलाइन या दूतावास के जरिए फॉर्म 6-ए जमा करने की सुविधा दी है, लेकिन सत्यापन ऑफलाइन होगा.

चंडीगढ़ में SIR के दौरान 12.81 प्रतिशत नाम हटाए जाने का उदाहरण दिया जा रहा है. चंडीगढ़ में कुल 5,16,427 पंजीकृत मतदाताओं में से 66,147 नाम प्रारूप मतदाता सूची से हटा दिए गए. यह कुल मतदाताओं का 12.81 प्रतिशत है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 8.47 प्रतिशत मतदाता स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए थे, 2.43 प्रतिशत अनुपस्थित पाए गए और 0.68 प्रतिशत की मृत्यु हो चुकी थी.

टोरंटो (कनाडा) में रहने वाले एनआरआई हरमन सिंह ने कहा, 'एनआरआई को चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध फॉर्म 6-ए भरना होता है. अगर कोई एनआरआई यह फॉर्म ऑनलाइन भी जमा करता है, तब भी उसका सत्यापन ऑफलाइन होगा. ऐसे में संभावना है कि हजारों एनआरआई SIR प्रक्रिया के दौरान अपना वोट खो सकते हैं, क्योंकि कई लोग फॉर्म नहीं भरेंगे और कई लोगों का सत्यापन नहीं हो पाएगा, क्योंकि वे भारत में नहीं रहते.'

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