बजट 2026 को हम केवल इस नजर से देखें कि कितना टैक्स लगाया गया और कितना खर्च किया गया, तो स्वाभाविक है कि निराशा हो सकती है. बजट के बाद शेयर बाजार में आई गिरावट भी यही संकेत देती है कि इस बजट में ऐसा कोई तात्कालिक और चौंकाने वाला एलान नहीं है, जिससे तुरंत आर्थिक 'बूम' दिखाई दे. इसलिए इस बजट को देखने का सही तरीका थोड़ा अलग होना चाहिए. इस बजट का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि सरकार अब भारतीय अर्थव्यवस्था को 'वेलफेयर-ड्रिवन ग्रोथ', यानी राहत, सब्सिडी और सहायता पर आधारित वृद्धि से आगे ले जाकर एक 'रणनीतिक अर्थव्यवस्था (स्ट्रेटेजिक इकॉनमी)' की दिशा में मोड़ रही है. दूसरे शब्दों में, सरकार का फोकस अब केवल उपभोग बढ़ाने पर नहीं, बल्कि देश की दीर्घकालिक आर्थिक ताकत बनाने पर है. इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण से भी यह स्पष्ट हो चुका था कि भविष्य की आर्थिक प्रतिस्पर्धा अब सिर्फ खर्च बढ़ाने से नहीं जीती जाएगी, बल्कि वह देश की उत्पादन क्षमता, तकनीक पर मजबूत पकड़, सुरक्षित और भरोसेमंद सप्लाई-चेन, कुशल मानव पूंजी और भारत के सांस्कृतिक तथा वैश्विक प्रभाव से तय होगी. यही सोच इस बार बजट 2026 की असली आत्मा है.
सरल शब्दों में,'स्ट्रेटेजिक इकॉनमी' का मतलब है कि कोई देश क्या बनाता है, उसके पास कौन-सी तकनीक और बौद्धिक संपदा है, सामान कितनी तेज और कम लागत में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचता है, उसके लोग कितने कुशल हैं और उसकी संस्कृति और कंटेंट का दुनिया पर कितना प्रभाव है. अब ग्लोबल इकॉनमी में इन पैमानों से असली ताकत तय होती है. इसी नजरिए से बजट 2026 भारत की रणनीतिक शक्ति को तीन स्तरों पर तैयार करेगा. पहला, 'हार्ड पावर', जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है; दूसरा,'सॉफ्ट पावर', जिसमें कंटेंट, पर्यटन और भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने पर जोर है; और तीसरा, 'सोशल पावर', जिसके तहत महिला उद्यमिता, कौशल निर्माण और लोगों के लिए नए अवसर पैदा करने पर ध्यान दिया जा रहा है.

बजट 2026 भारत को बनाएगा हार्ड पावर इकॉनमी
बजट 2026 की हार्ड पावर का सीधा-सा अर्थ है कि भारत क्या बनाता है, कैसे बनाता है और अपने उत्पाद दुनिया तक कैसे पहुंचाता है. इस परिप्रेक्ष्य में बजट का फोकस साफ तौर पर 'फ्रंटियर सेक्टर' यानी भविष्य के उद्योगों पर दिखाई देता है. उदाहरण के लिए, 'सेमीकंडक्टर मिशन 2.0' के तहत अब लक्ष्य केवल चिप बनाना नहीं है, बल्कि इक्विपमेंट, मटीरियल, डिजाइन, टेक्नोलॉजी और पूरी सप्लाई-चेन को देश के भीतर विकसित करना है, ताकि भारत इस क्षेत्र में वैश्विक निर्माता बने.
इसी तरह 'बायोफार्मा शक्ति अभियान' के रूप में एक नई राष्ट्रीय पहल की घोषणा भी रणनीतिक प्रयास है. इसके लिए बजट में कुल 10 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इस धनराशि को पांच सालों में चरणबद्ध रूप से खर्च किया जाएगा. इस पहल के तहत कैंसर, डायबिटीज और ऑटो-इम्यून बीमारियों जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़ी दवाओं का उत्पादन भारत में ही किया जाएगा. इसके अलावा सरकार तीन नए बायोफार्मा-केंद्रित संस्थान स्थापित करेगी, ताकि देश में बायोफार्मा रिसर्च को मजबूत किया जा सके.इसके साथ ही देश में पहले से मौजूद सात बायोफार्मा-केंद्रित (NIPER) संस्थानों को आधुनिक बनाया जाएगा. इससे वे जीन थेरेपी, सेल थेरेपी, एडवांस वैक्सीन और बायोलॉजिकल ड्रग्स जैसे उन्नत क्षेत्रों में शोध कर सकें. इस अभियान के अंतर्गत सरकार देश में ही एक मजबूत क्लिनिकल ट्रायल नेटवर्क और बेहतर रेगुलेटरी कैपेसिटी विकसित चाहती है ताकि देश को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाइयाँ उपलब्ध हों और भारत एक ग्लोबल बायोफार्मा हब के रूप में उभर सके.
बजट में एक महत्वपूर्ण फोकस 'रेयर अर्थ मिनरल्स' पर रहा है, क्योंकि आज इस क्षेत्र में चीन की मजबूत पकड़ (मोनोपॉली) ने पूरी दुनिया को यह साफ बता दिया है कि रेयर अर्थ का रणनीतिक इस्तेमाल ही भविष्य की ताकत तय करेगा. ये खनिज इलेक्ट्रिक व्हीकल, विंड टर्बाइन, हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस टेक्नोलॉजी की रीढ़ हैं. बजट 2026 में वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि रेयर अर्थ मटीरियल्स के लिए देश में 'डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर' बनाए जाएंगे. इन कॉरिडोर का उद्देश्य भारत में ही रेयर अर्थ मिनरल्स की माइनिंग (खनन), उनकी प्रोसेसिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है. प्रस्तावित रूप से ये कॉरिडोर ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में विकसित किए जाएंगे, क्योंकि इन राज्यों में पहले से ही मोनाजाइट जैसे रेयर अर्थ मिनरल्स प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं. इस तरह के केंद्रित और रणनीतिक प्रयासों से आने वाले समय में 'लोकल रिसोर्सेज' का बेहतर उपयोग होगा. इससे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे, रीजनल इकॉनमी मजबूत होगी. रेयर अर्थ के मामले में भारत की विदेशी निर्भरता भी कम होगी.

'बायोफार्मा शक्ति अभियान' के लिए बजट में कुल 10 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.
ऐसे ही एक और स्ट्रेटेजिक सेक्टर 'टेक्सटाइल' के लिए भी बजट में बड़ी घोषणाएं हुई हैं. अब तक देश में टेक्सटाइल को मुख्य रूप से श्रम-प्रधान और रोजगार देने वाले सेक्टर के रूप में देखा जाता था, लेकिन बजट 2026 की घोषणाएं यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि सरकार अब इस क्षेत्र को वैश्विक व्यापार में भारत की निर्णायक भूमिका बनाने के साधन के रूप में देख रही है. इसलिए इसे सिर्फ डोमेस्टिक बूस्ट नहीं, बल्कि भारत की एक्सपोर्ट प्लस मैन्युफैक्चरिंग वॉर-स्ट्रैटेजी माना जा सकता है. इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा पर पड़ने वाला है, विशेष रूप से बांग्लादेश पर, जिसकी अब तक की ताकत सस्ता श्रम, बड़े पैमाने पर रेडीमेड गारमेंट्स का उत्पादन, यूरोप और अमेरिका में मजबूत सप्लाई-चेन और भारत जैसे देशों से कच्चा कपड़ा लेकर उसे तैयार वस्त्रों में बदलकर निर्यात करने की क्षमता रही है.
बजट 2026 में प्रस्तावित 'मेगा टेक्सटाइल पार्क्स' इस रणनीति की रीढ़ है, जिन्हें चैलेंज मोड में लागू करने की बात कही गई है. इसका आशय यह है कि एक ही स्थान पर स्पिनिंग, वीविंग, प्रोसेसिंग, डाइंग और गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग की पूरी श्रृंखला विकसित की जाएगी. बिजली, पानी, सड़क और लॉजिस्टिक्स जैसी सभी सुविधाएं एक ही क्लस्टर में उपलब्ध होंगी. इसमें बड़ी कंपनियों के साथ-साथ एमएसएमई को भी जोड़ा जाएगा, ताकि वास्तविक अर्थों में स्केल मैन्युफैक्चरिंग संभव हो सके. इस पूरी रणनीति का एक अहम बदलाव 'टेक्निकल टेक्सटाइल और वैल्यू-ऐडिशन' पर केंद्रित है. सरकार अब टेक्सटाइल को केवल साड़ी, शर्ट और टी-शर्ट जैसे पारंपरिक उत्पादों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि मेडिकल टेक्सटाइल (सर्जिकल कपड़े और मास्क), ऑटोमोबाइल टेक्सटाइल (सीट-बेल्ट और एयरबैग फैब्रिक), डिफेंस टेक्सटाइल (बुलेटप्रूफ फैब्रिक) और इंडस्ट्रियल फैब्रिक जैसे उच्च तकनीक वाले उत्पादों को बढ़ावा देना चाहती है. आज बजट की ये घोषणाएं बताती हैं कि अब भारत केवल सस्ता कच्चा माल बेचने वाला देश नहीं बल्कि दुनिया को महंगा, हाई-क्वालिटी और हाई-टेक कपड़ा बेचने वाला एक मजबूत वैश्विक टेक्सटाइल केंद्र बनना चाहता है.
पूंजीगत खर्च और कॉरिडोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर
बजट में सरकार ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि विकास का असली इंजन पूंजीगत खर्च (कैपिटल एक्सपेंडिचर) ही रहेगा. वर्ष 2026 के लिए कैपेक्स का लक्ष्य 12.2 लाख करोड़ रुपये रखा गया है. यह पिछले साल की तुलना में करीब 10 फीसदी अधिक है. पूंजीगत खर्च का सीधा अर्थ है सड़क, रेल, बंदरगाह, बिजली, जलमार्ग और शहरी ढांचे में निवेश यानी ऐसी बुनियादी संरचनाएं जो केवल आज नहीं, बल्कि आने वाले दशकों तक अर्थव्यवस्था को गति देती हैं. बजट में घोषित रिकॉर्ड कैपेक्स इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसके बहुआयामी लाभ हैं. जब सरकार बड़े पैमाने पर पूंजीगत खर्च करती है, तो निर्माण क्षेत्र में रोजगार पैदा होता है, उद्योग की लॉजिस्टिक्स लागत घटती है और निजी निवेशकों का भरोसा बढ़ता है. इसीलिए पूंजीगत खर्च को केवल खर्च नहीं, बल्कि भविष्य की आय और विकास में किया गया रणनीतिक निवेश है. इसी रिकॉर्ड कैपेक्स रणनीति का एक अहम हिस्सा हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर हैं, जिन्हें बजट में सरकार ने 'ग्रोथ कनेक्टर्स' कहा है. इनका उद्देश्य केवल तेज ट्रेन चलाना नहीं है, बल्कि शहरों को आर्थिक रूप से जोड़ना, श्रमिकों की आवाजाही आसान करना और निवेश को एक शहर से दूसरे शहर तक फैलाना है. वहीं माल ढुलाई की समस्या को हल करने के लिए बजट में 'डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी)' पर भी ध्यान दिया गया है. एक नए फ्रेट कॉरिडोर 'दनकुनी से सूरत' की घोषणा का उद्देश्य पूर्वी भारत के औद्योगिक क्षेत्रों को पश्चिमी भारत के बंदरगाहों और उद्योगों से सीधे जोड़ना है. बजट में जलमार्ग और कोस्टल कार्गो को भी सस्ते और टिकाऊ परिवहन विकल्प के रूप में आगे बढ़ाया गया है. सरकार ने 20 नए राष्ट्रीय जलमार्ग विकसित करने और 2047 तक जल परिवहन की हिस्सेदारी 12 फीसद तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है. असल में सड़क परिवहन सबसे महंगा, रेल उससे सस्ता और जलमार्ग सबसे सस्ता परिवहन का माध्यम है. यदि भारी सामान जैसे कोयला, अनाज, सीमेंट और स्टील नदियों और समुद्र के रास्ते ले जाया जाए, तो उद्योग की लागत में बड़ी कमी आ सकती है.

बजट में सरकार ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि विकास का असली इंजन पूंजीगत खर्च ही रहेगा.
भारत की 'सॉफ्ट पावर' बढ़ाने का रोडमैप
इस बजट से भारत की 'सॉफ्ट पावर' को नई ताकत मिलती दिख रही है. सरकार अब कंटेंट, क्रिएटिविटी और संस्कृति को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधन मान रही है.'कंटेंट क्रिएटर लैब' जैसी घोषणाएं, जिनमें 1,500 सेकेंडरी स्कूलों और 500 कॉलेजों में विशेष लैब और 15 हजार स्कूलों में कंटेंट क्रिएशन की दिशा शामिल है, यह संकेत देती है कि भारत युवाओं को गेमिंग, एनीमेशन और डिजिटल कॉमिक्स जैसे वैश्विक उद्योगों के लिए तैयार करना चाहता है. इसका सरल अर्थ है कि यह केवल यूट्यूब तक सीमित नहीं, बल्कि स्किल, टूल्स, नौकरियों और डिजिटल निर्यात की एक लंबी तैयारी है. इसी तरह पर्यटन को 'एक्सपीरियंस इकॉनमी' का इंजन बनाकर 15 पुरातात्विक स्थलों को जीवंत सांस्कृतिक गंतव्य में बदलने, 10,000 टूरिस्ट गाइडों को प्रशिक्षित करने और टियर-2/टियर-3 शहरों व मंदिर नगरों की क्षमता बढ़ाने की पहल भी स्वागत योग्य है. यह बताता है कि सरकार पर्यटन को सिर्फ घूमने-फिरने का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय रोजगार और क्षेत्रीय विकास का आधार बनाना चाहती है.
भारत की सोशल पावर
बजट में भारत की सोशल पावर यानी सामाजिक शक्ति को एक नई और ठोस दिशा मिलती दिख रही है. इस बजट में विकास का अर्थ केवल सरकारी सहायता या सब्सिडी बांटना नहीं रखा गया है, बल्कि लोगों को उद्यमी, उत्पादक और आत्मनिर्भर भागीदार बनाना मुख्य लक्ष्य है.'She MARTS' जैसी पहल इसका प्रतीक है, जहां 'स्वयं सहायता समूहों' से जुड़ी महिलाएं अब सिर्फ योजनाओं की लाभार्थी नहीं रहेंगी, बल्कि दुकान चलाने वाली, अपने उत्पाद बेचने वाली, ब्रांड बनाने वाली और कारोबार की मालिक बनेंगी. इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए एमएसएमई के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का ग्रोथ फंड, सात लाख करोड़ से अधिक की तरलता, कॉरपोरेट मित्र जैसी व्यवस्था और 200 पुराने औद्योगिक क्लस्टरों के पुनरुद्धार का प्रस्ताव है. यह दिखाता है कि सरकार अब छोटे उद्योगों को सिर्फ संकट से बचाना नहीं चाहती, बल्कि अब लक्ष्य उन्हें बड़ा बनाकर रोजगार का मजबूत स्रोत बनाना है. इसका सीधा अर्थ यह है कि रोजगार और अवसर अब केवल दिल्ली, मुंबई या बंगलुरु जैसे बड़े शहरों तक सीमित न रहकर टियर-2, टियर-3 शहरों और कस्बों तक फैलेंगे, जिससे क्षेत्रीय असमानता कम होगी.
किसानों के मामले में भी इस बजट की सोच बदली हुई दिखती है. अब नीति का जोर केवल सब्सिडी देने पर नहीं, बल्कि उत्पादकता बढ़ाने, वैल्यू-एडिशन करने और ब्रांडिंग पर है. जलाशयों और अमृत सरोवरों को लेकर हुई आज घोषणा से मत्स्य पालन को बढ़ावा मिलेगा जिससे किसानों को अतिरिक्त आय होगी. इसी तरह से 'नारियल प्रोत्साहन योजना' देश के तटीय राज्यों में नारियल किसानों के लिए उत्पादन और उत्पादकता बढ़ने में मदद देगी. काजू और कोको को वैश्विक ब्रांड बनाने का लक्ष्य भी किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ेगा. बजट 2026 से यह साफ होता है कि सरकार कि मंशा किसान को अब केवल फसल बेचने वाला नहीं बल्कि पूरी वैल्यू चेन का हिस्सा बनाने पर है ताकि उत्पादन से लेकर प्रोसेसिंग और बाजार तक उसकी भूमिका मजबूत हो.
इसी तरह शिक्षा को सीधे रोजगार और उद्यम से जोड़ने की कोशिश भी सोशल पावर का अहम हिस्सा है.पूर्वी भारत में राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान की स्थापना, इंडस्ट्री कॉरिडोर के पास यूनिवर्सिटी टाउनशिप, बालिकाओं के लिए हॉस्टल आदि संकेत देती है कि सरकार का लक्ष्य समावेशी शिक्षा देना है. सरल शब्दों में कहा जाए तो बजट 2026 समाज के बड़े हिस्से जैसे महिलाएं, किसान, छोटे उद्यमी और युवाओं को केवल उपभोक्ता बने रहने से आगे बढ़ाकर आर्थिक भागीदार बनाने की कोशिश करता है.जब महिला उद्यमी बनती है, किसान ब्रांड से जुड़ता है, छोटा उद्योग बड़ा होता है और छात्र नौकरी के साथ उद्यम की सोचता है, तब समाज खुद विकास की ताकत बन जाता है. यही भारत की 'सोशल पावर' की असली परिभाषा है जो इस बजट 2026 में दिखाई पड़ रही है.
(डिस्क्लेमर - विक्रांत निर्मला सिंह, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला में शोधार्थी हैं और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के पूर्व छात्र हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )