राजनेताओं की आत्मकथाएं अक्सर दो बार लिखी जाती हैं. पहली बार अपनी यादों के आधार पर और दूसरी बार खुद को बचाने के लिए. अच्छी आत्मकथाएं दूसरी कोशिश के लालच से बचती हैं. इसी वजह से सोनिया गांधी की आने वाली आत्मकथा 'Belonging: A Journey of Love' से काफी उम्मीदें हैं. किताब के प्रकाशक के मुताबिक किताब 10 नवंबर को आएगी. 544 पन्नों की इस किताब में सोनिया गांधी के युद्ध के बाद के इटली में बीते बचपन से लेकर कैम्ब्रिज में राजीव गांधी से मुलाकात, भारत के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार में उनका जीवन, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या, राजनीति में उनका अनिच्छा से आना और कांग्रेस की कमान संभालने तक की कहानी होगी.
सोनिया गांधी का कहना है कि वह उस परिवार के लोगों की सोच, उनके फैसलों और उनकी मानवीय कमजोरियों को समझने की कोशिश करेंगी, जिसके बारे में पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चुका है.भारत के बहुत कम नेताओं ने सोनिया गांधी जितनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया है, लेकिन उन्होंने अपने बारे में बहुत कम बताया है. वह कांग्रेस अध्यक्ष, विपक्ष की नेता, यूपीए अध्यक्ष और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष रहीं. करीब दस साल तक गठबंधन सरकार की राजनीति उनके इर्द-गिर्द घूमती रही. इसके बावजूद हम यह बहुत कम जानते हैं कि सोनिया खुद अपनी ताकत और भूमिका को किस तरह देखती थीं.
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सोनिया गांधी कैसे आईं राजनीति में
दूसरों की बातों में सोनिया गांधी की पूरी कहानी अक्सर एक ही शब्द में समेट दी जाती है, वंशवाद. लेकिन सिर्फ वंशवाद से उनकी कहानी पूरी तरह समझ में नहीं आती. सोनिया कांग्रेस के माहौल में पैदा नहीं हुई थीं. उन्होंने कांग्रेस की राजनीति नहीं सीखी थी और पार्टी में उन्हें शुरुआत से ही पूरी स्वीकार्यता भी नहीं मिली थी. वह राजीव गांधी के जरिए राजनीति की दुनिया में आईं. राजीव की मौत के बाद उन्हें खुद कांग्रेस की राजनीति में अपनी जगह बनानी पड़ी.
उन्हें लड़ना पड़ा, जीतना पड़ा, लोगों को मनाना पड़ा, समझौते करने पड़े, बगावतों का सामना करना पड़ा और एक ऐसी पार्टी की मुखिया की तरह काम करना पड़ा, जिसके कई नेता उनसे उम्र, अनुभव और राजनीतिक पकड़ में काफी आगे थे.
'Belonging' के पास यह बताने का मौका है कि सोनिया गांधी ने यह सब आखिर कैसे किया.

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लोगों को सोनिया गांधी की आत्मकथा से कई सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद है.
क्या राजनीति से पहले परिवार आता है
किताब के शुरुआती अध्याय शायद सबसे ज्यादा खुलासा करने वाले होंगे. इसकी वजह यह है कि सोनिया गांधी राजनीति में पैदा नहीं हुई थीं. बल्कि राजनीति उनके पीछे-पीछे उनके जीवन में आई. उनकी जिंदगी का सफर अपने आप में बेहद असाधारण है, इटली के तुरिन के पास स्थित ऑर्बासानो, जहां उनका बचपन बीता, वहां से कैम्ब्रिज तक. फिर राजीव गांधी से शादी करके नेहरू-गांधी परिवार का हिस्सा बनने से लेकर 1 सफदरजंग रोड, 10 जनपथ और आखिर में भारत की सत्ता के केंद्र तक. लेकिन इससे भी ज्यादा दिलचस्प उनका मानसिक सफर है.
सवाल यह है कि जिस महिला ने हमेशा अपनी निजी जिंदगी की सख्ती से रक्षा की, वह कब कांग्रेस की जिम्मेदारी को लगभग पारिवारिक जिम्मेदारी मानने लगीं? सोनिया मेनियो के रूप में वह भारत आईं और 1968 में राजीव गांधी से शादी की. वह ऐसे घर में पहुंचीं, जहां निजी और राजनीतिक जीवन को अलग करना लगभग असंभव था.
किताब के प्रकाशक के मुताबिक, 1980 में संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत और उसके बाद राजीव गांधी का राजनीति की ओर बढ़ना कहानी का अहम हिस्सा होगा. सोनिया गांधी खुद लिख चुकी हैं कि उन्होंने राजीव को राजनीति में जाने से रोकने की बहुत कोशिश की थी. उन्होंने कहा था कि उन्होंने अपने परिवार और अपनी आजादी के लिए 'शेरनी की तरह लड़ाई लड़ी.' लेकिन 'Belonging' इस कहानी को और आगे ले जा सकती है.
सोनिया और संजय गांधी के संबंध वास्तव में कैसे थे? इंदिरा गांधी पर संजय के बहुत ज्यादा प्रभाव को सोनिया किस तरह देखती थीं? क्या वह सिर्फ राजीव के राजनीति में जाने से डरती थीं या उन्हें उस राजनीतिक माहौल से भी आपत्ति थी, जिसमें राजीव प्रवेश कर रहे थे?
बच्चन परिवार से दोस्ती और उसके टूटने की कहानी
इसके बाद आता है बच्चन परिवार का मामला. अमिताभ बच्चन सिर्फ राजीव गांधी के कोई सामान्य फिल्मी दोस्त नहीं थे. दोनों परिवार कभी बेहद करीब थे. 1984 में अमिताभ बच्चन ने राजीव गांधी के दोस्त के रूप में राजनीति में कदम रखा और इलाहाबाद से शानदार जीत हासिल की. लेकिन समय के साथ दोनों परिवारों की दोस्ती खत्म हो गई. आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या वजह राजनीति थी? पैसा था? निजी मतभेद थे? या इन सभी चीजों का मिला-जुला असर था?
'Belonging' जैसी आत्मकथा उन लोगों की कहानी को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती, जो कभी गांधी परिवार के इतने करीब थे कि लगभग परिवार का हिस्सा लगते थे, लेकिन बाद में अचानक उससे दूर हो गए.
सोनिया गांधी के राजनीतिक सफर को समझने के लिए 1998-99 का दौर भी बहुत महत्वपूर्ण है. कांग्रेस के शीर्ष पर उनका पहुंचना आसान नहीं था. उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा. सोनिया गांधी ने सीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाकर खुद अध्यक्ष बनने की परिस्थितियों को किस तरह देखा? फिर 1999 में उन्हें एक और बड़ी चुनौती मिली. कांग्रेस के भीतर ही शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया और सवाल किया कि क्या वह देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद के लिए उपयुक्त हैं.
सोनिया ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद कांग्रेस संगठन उनके समर्थन में खड़ा हो गया. तीनों नेताओं को पार्टी से निकाल दिया गया. बाद में इन नेताओं ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) बनाई. यह सोनिया गांधी के नेतृत्व की बड़ी परीक्षा थी. उन्होंने उस समय इसे किस तरह महसूस किया? क्या उन्हें अपमान लगा? क्या उन्हें धोखा महसूस हुआ? क्या उन्होंने इसे सिर्फ राजनीतिक चुनौती माना? या उन्हें पहली बार लगा कि कांग्रेस के भीतर अब उनका अपना राजनीतिक आधार बन चुका है?

साल 1991 में पति राजीव गांधी की हत्या के काफी समय बाद सोनिया ने राजनीति में कदम रखा.
Photo Credit: PTI
सोनिया गांधी का एक ताकतवर महिला के रूप में उदय
दुनिया की कई प्रभावशाली महिला नेताओं की आत्मकथाएं, जैसे गोल्डा मेयर, मार्गरेट थैचर, बेनजीर भुट्टो और हाल में जैसिंडा अर्डर्न तभी ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बनीं, जब उन्होंने अपने सार्वजनिक फैसलों के पीछे की निजी सोच और मजबूरियों को सामने रखा. सोनिया गांधी के जीवन में भी ऐसी बहुत-सी कहानियां हैं. सवाल यह है कि क्या वह सिर्फ अपनी दिलचस्प निजी कहानी बताएंगी या अपनी राजनीति से जुड़े राज भी खोलेंगी?
सोनिया गांधी और पीवी नरसिम्हा राव का रिश्ता शायद इस आत्मकथा में फिर से देखने लायक सबसे दिलचस्प राजनीतिक संबंध होगा. राव गांधी परिवार के लिए कोई बाहरी व्यक्ति नहीं थे. उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों के साथ काम किया था. राजीव गांधी की हत्या के बाद वह कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बने. फिर भी सोनिया और राव के बीच पहले जो भरोसा था, वह धीरे-धीरे खत्म हो गया. बाद में दोनों के बीच दूरी कांग्रेस के अंदरूनी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई.
आखिर ऐसा क्यों हुआ? एक बड़ा कारण राजीव गांधी की हत्या की जांच को लेकर सोनिया गांधी की नाराजगी बताया जाता है.
कांग्रेस के कुछ नेताओं के मुताबिक, सोनिया को लगता था कि जांच बहुत धीमी चल रही है और राजीव गांधी की हत्या की पूरी साजिश सामने नहीं आई है. उन्होंने 1995 में सार्वजनिक रूप से भी अपनी नाराजगी जाहिर की थी.
आत्मकथा में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि सोनिया वास्तव में क्या मानती थीं. राजीव गांधी की हत्या के लिए लिबरेशन ऑफ तमिल टाइगर इलम (एलटीटीई) की भूमिका जांच और मुकदमे के बाद स्थापित हुई थी. लेकिन सोनिया की नाराजगी सिर्फ हत्यारों तक सीमित नहीं थी. सवाल है कि उन्हें और क्या-क्या बातें अब भी अनसुलझी लगती थीं?
नटवर सिंह और गांधी परिवार के रिश्ते में आई दरार
इसके बाद नटवर सिंह का मामला आता है. नटवर सिंह सिर्फ विदेश नीति के सलाहकार नहीं थे. वह राजनयिक, लेखक, नेहरू-गांधी परिवार के वफादार और किताबों में गहरी रुचि रखने वाले व्यक्ति थे. वह सोनिया गांधी के राजनीतिक और बौद्धिक दायरे के करीबी थे और अनौपचारिक रूप से उनके साहित्यिक सलाहकार की तरह भी काम करते थे. लेकिन संयुक्त राष्ट्र के ऑयल-फॉर-फूड विवाद के बीच सरकार से उनके बाहर होने के बाद दोनों के रिश्ते खराब हो गए. इसके बाद नटवर सिंह की किताब 'One Life Is Not Enough' में सोनिया गांधी के बारे में कई आलोचनात्मक बातें लिखी गईं. उन्होंने 2004 में सोनिया के प्रधानमंत्री नहीं बनने के कई कारण बताए, उनकी बातों पर भी सवाल उठाए गए. सोनिया ने अब तक नटवर सिंह के दावों का बड़े स्तर पर जवाब नहीं दिया है. अब अपनी बात रखने का मौका उनके पास है.
मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए क्यों चुना?
सोनिया गांधी की राजनीतिक रणनीति में 2004 के साल पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी. सबसे बड़ा सवाल यही है कि उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री क्यों चुना? जब सोनिया ने खुद प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया, तो प्रधानमंत्री चुनने का फैसला उनके हाथ में था. प्रणब मुखर्जी उनसे ज्यादा वरिष्ठ थे और राजनीति में उनका अनुभव भी बहुत ज्यादा था. खुद मनमोहन सिंह ने माना था कि प्रणब को प्रधानमंत्री नहीं बनाए जाने से उन्हें निराशा हुई होगी. अर्जुन सिंह भी कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी के बेहद प्रभावशाली नेता थे. फिर मनमोहन सिंह को ही क्यों चुना गया? क्या सोनिया को उन पर भरोसा था? क्या इसलिए कि उनका अपना कोई मजबूत राजनीतिक गुट नहीं था? क्या उनकी ईमानदारी और आर्थिक विशेषज्ञता से भारत और दुनिया को भरोसा मिलता था? या इसलिए कि वह ऐसे नेता थे जो सरकार चला सकते थे, लेकिन कांग्रेस के भीतर सोनिया के सामने कोई दूसरा बड़ा राजनीतिक शक्ति केंद्र नहीं बनाते?
यहां एक दिलचस्प सवाल और है. माधवराव सिंधिया की 2001 में विमान दुर्घटना में सिर्फ 56 साल की उम्र में मौत हो गई थी. उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य माना जाता था और कांग्रेस संसदीय दल में वह सोनिया गांधी के बेहद महत्वपूर्ण सहयोगी थे.अगर माधवराव सिंधिया जीवित होते तो क्या 2004 में भी सोनिया गांधी मनमोहन सिंह को ही प्रधानमंत्री बनातीं? इसका जवाब यह समझने में मदद करेगा कि सोनिया गांधी नेतृत्व को किस नजर से देखती थीं.
यूपीए सरकार कौन चला रहा था, सोनिया या मनमोहन
यूपीए में असली ताकत किसके पास थी? सोनिया गांधी को यूपीए सरकार के बारे में भी विस्तार से बताना चाहिए. आलोचक उन्हें 'सुपर पीएम' कहते थे. वहीं उनके समर्थकों का कहना था कि सत्ता का बंटवारा बिल्कुल उचित था, मनमोहन सिंह सरकार चलाते थे और सोनिया गठबंधन, पार्टी और राजनीतिक समर्थन को संभालती थीं. क्या सोनिया गांधी की शासन चलाने की सोच ऐसी थी जिसमें आर्थिक नीतियां व्यावहारिक थीं, लेकिन सामाजिक नीतियां वामपंथी सोच के करीब थीं? यूपीए सरकार की कल्याणकारी योजनाओं में सोनिया की व्यक्तिगत भूमिका कितनी थी? मनमोहन सिंह और सोनिया के बीच किन मुद्दों पर मतभेद होते थे?
2012 में राष्ट्रपति पद को लेकर हुए बदलाव से भी इस रिश्ते को समझने में मदद मिल सकती है. उस समय चर्चा थी कि क्या मनमोहन सिंह राष्ट्रपति भवन जा सकते हैं और प्रणब मुखर्जी उनकी जगह प्रधानमंत्री बन सकते हैं. सोनिया ने उस समय वास्तव में किन विकल्पों पर विचार किया था? ये सिर्फ राजनीतिक गलियारों की छोटी-मोटी बातें नहीं हैं. इनका संबंध इस बात से है कि उस समय भारत की सरकार वास्तव में कैसे चल रही थी.
राहुल को प्रियंका से आगे क्यों रखा गया?
इसके बाद उत्तराधिकार का सवाल आता है, राहुल गांधी को प्रियंका गांधी से आगे क्यों रखा गया? क्या सोनिया गांधी प्रियंका को राजनीति से बचाना चाहती थीं? क्या राहुल को हमेशा राजीव गांधी का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना गया? अगर राहुल को आगे चलकर कांग्रेस का नेतृत्व करना था, तो उन्हें सरकार चलाने का पर्याप्त अनुभव क्यों नहीं दिया गया? यूपीए-2 के दौरान उन्होंने कोई छोटा मंत्रालय तक क्यों नहीं संभाला? इससे उन्हें प्रशासन चलाने का अनुभव मिल सकता था, जो प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने वाले किसी भी नेता के लिए महत्वपूर्ण होता है.

लोगों की दिलचस्पी यह जानने में होगी राजनीति में प्रियंका गांधी राहुल गांधी से पीछे कैसे रह गईं.
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साल 2009 के बाद सोनिया गांधी कांग्रेस संगठन में जरूरी बदलाव क्यों नहीं कर पाईं, जबकि वह गठबंधन सरकार को संभालती रहीं?
नरेंद्र मोदी के बारे में सोनिया गांधी की सोच क्या थी?
2012 से 2014 के बीच जब देश का माहौल कांग्रेस के खिलाफ बदल रहा था, क्या सोनिया गांधी ने राजनीतिक परिस्थितियों को सही तरह से समझा? क्या कांग्रेस यह समझने में नाकाम रही कि उसके विरोधी धर्मनिरपेक्षता की भाषा को तेजी से अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के रूप में पेश कर रहे थे? यह सवाल हमें नरेंद्र मोदी तक ले जाता है. यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी वास्तव में मोदी के बारे में क्या सोचती थीं? क्या वह उन्हें केवल गुजरात का राजनीतिक विरोधी मानती थीं? क्या उन्हें मोदी एक वैचारिक खतरा लगते थे? या वह उन्हें भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती मानती थीं? अहमद पटेल उन्हें क्या सलाह देते थे? क्या कांग्रेस ने मोदी की बढ़ती ताकत को समझने में बहुत देर कर दी? और अटल बिहारी वाजपेयी को सोनिया गांधी किस नजर से देखती थीं? सक्रिय राजनीति में आने के बाद वाजपेयी उनके सामने आने वाले पहले बड़े विरोधी नेताओं में से एक थे. वाजपेयी ने सार्वजनिक जीवन में दशकों बिताए थे, जबकि सोनिया उस समय कांग्रेस की राजनीति को अंदर से समझना सीख रही थीं. इसलिए सोनिया की आत्मकथा यह भी बता सकती है कि एक राजनीतिक नौसिखिया ने ऐसे अनुभवी विरोधियों से मुकाबला करना कैसे सीखा.
भारत से कैसे बढ़ता गया सोनिया गांधी का रिश्ता
किताब के नाम 'Belonging' यानी 'अपनापन' से कुछ और बड़े सवाल उठते हैं. क्या सोनिया गांधी का भारत से गहरा जुड़ाव वास्तव में राजीव गांधी से उनके प्रेम का ही विस्तार था? क्या एक व्यक्ति के प्रति प्रेम धीरे-धीरे उसके परिवार के प्रति वफादारी में बदल गया? फिर क्या यह वफादारी राजीव की पार्टी यानी कांग्रेस के प्रति जिम्मेदारी बनी?
और आखिर में क्या यह भारत को अपना देश मानने की भावना में बदल गई? शायद सोनिया गांधी वास्तव में ऐसी ही आत्मकथा लिखना चाहती हैं, एक ऐसी महिला की कहानी, जिसकी जिंदगी किसी अविश्वसनीय कहानी जैसी रही. यह पुराने राजनीतिक हिसाब-किताब चुकाने वाली किताब न होकर एक ऐसी महिला की भावुक कहानी हो सकती है, जो राजनीति में आना नहीं चाहती थी लेकिन आखिरकार भारत की राजनीति के केंद्र में पहुंच गई.
ऐसी किताब में काफी ताकत हो सकती है. लेकिन 'Belonging' के अंदर एक दूसरी किताब भी छिपी हुई है. यह उस महिला की कहानी हो सकती है जो बाहर से आई थी और जिसने धीरे-धीरे राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करना सीखा.कैसे उन्होंने अपने विदेशी मूल को लेकर उठे सवालों का सामना किया? कैसे उन्होंने ताकतवर नेताओं को संभाला? कैसे उन्होंने प्रधानमंत्री चुने?कैसे उन्होंने गठबंधन सरकारों को साथ रखा? कैसे उन्होंने राजनीतिक उत्तराधिकारी तैयार किए?उन्होंने कौन-कौन सी राजनीतिक गलतियां कीं? और आखिरकार उन्होंने 2014 में उस राजनीतिक व्यवस्था को अपने सामने टूटते हुए कैसे देखा, जिसे बनाने में उनकी भी बड़ी भूमिका थी?
इतिहास को सोनिया गांधी की दोनों कहानियां चाहिए होंगी, एक उनकी निजी जिंदगी की और दूसरी उनकी राजनीतिक ताकत और फैसलों की. कुछ ही महीनों में यह साफ हो जाएगा कि सोनिया गांधी अपनी आत्मकथा में इन दोनों में से कितनी कहानी दुनिया के सामने रखती हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )