बंगाल में राष्ट्रवाद की धड़कती ज्वाला को थामने के लिए ब्रिटिश सरकार ने शरारतपूर्ण तरीके से बंगाल को धार्मिक आबादी के आधार पर विभाजित करने का निर्णय लिया. जिसका दूरगामी परिणाम देश के लिए बहुत ही घातक साबित हुआ. 1905 के बंगाल विभाजन का देश पर सबसे दुर्भाग्यपूर्ण प्रभाव यह पड़ा कि कट्टरपंथी मुसलमानों को पहली बार यह अनुभव हुआ कि बहुसंख्यक होने के आधार पर देश के कुछ क्षेत्रों पर उनका प्रभुत्व हो सकता है और उन क्षेत्रों पर मुसलमानों का अपना शासन हो सकता है. इसी अहसास ने आगे चलकर दो अलग राष्ट्र के सिद्धांत एवं विभाजन का कारण बना.
इस घटना के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में पहली बार मुस्लिम एवं हिंदू राजनीतिक रूप में विरोधी एवं एक दूसरे के आमने-सामने आ गए. एक तरफ जहां हिंदू संपूर्ण भारत की बात करते थे तो वहीं दूसरी तरफ मुसलमानों की सोच मुस्लिम बहुत क्षेत्रों पर केंद्रित होने लगी. अंग्रेज सरकार द्वारा 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल का विभाजन करने के निर्णय ने पूरे देश में ब्रिटिश विरोध की ऐसी लहर पैदा की जैसा देश ने पहले कभी नहीं देखा था. देश का पूरा जन समुदाय विरोध में खड़ा हो गया. कांग्रेस ने भी विभाजन का पुरजोर विरोध किया. बंगाल विभाजन के विरुद्ध देश भर में उग्र प्रतिरोधों का ही परिणाम था कि 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली में ब्रिटेन के महाराज जॉर्ज पंचम के दरबार में बंगाल विभाजन वापस लेने का निर्णय लिया गया और देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली कर दिया गया.
बंगाल विभाजन के तुरंत बाद ब्रिटिश प्रशासन मुसलमानों को पूरी तरह से बंगाल विभाजन के समर्थन में रखना चाह रहा था. वायसराय लॉर्ड मिंटो एवं सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट जॉन मार्ले के शह पर मुस्लिम लीग की स्थापना की प्रक्रिया प्रारंभ हुई. प्रियंवद द्वारा लिखित पुस्तक भारत विभाजन की अंतः कथा के अनुसार मुस्लिम लीग की स्थापना में सर सैयद अहमद द्वारा स्थापित अलीगढ़ कॉलेज के अंग्रेज प्रिंसिपल आर्कबोल्ड की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्होंने मुस्लिम नेताओं एवं वायसराय के बीच सेतु का कार्य किया. 15-16 सितंबर 1906 को लखनऊ में प्रमुख मुस्लिम नेताओं की बैठक हुई जिसमें वायसराय मिंटो को लिखे जाने वाले पत्र के मसौदे पर विचार हुआ. इस पत्र के मसौदे को वायसराय के सचिव डनलप स्मिथ से चर्चा करके आर्कबोल्ड ने तैयार किया था. लखनऊ बैठक के बाद आगा खां के नेतृत्व में 35 सदस्यीय अभिजात्य मुसलमानों के प्रतिनिधि मण्डल ने 1 अक्टूबर 1906 को शिमला में वायसराय लॉर्ड मिंटो से मुलाकात की तथा ज्ञापन सौंपा. लखनऊ बैठक एवं वायसराय से मुलाकात के बाद अगले कदम के रूप में ढाका के नवाब सलीमुल्ला खां ने देश भर के महत्वपूर्ण मुस्लिम नेताओं एवं संगठनों को लम्बा पत्र लिखकर ढाका में एकत्रित किया. देश भर जुटे मुस्लिम प्रतिनिधियों की बैठक में 30 दिसंबर 1906 को ढाका में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना एवं उद्घाटन अधिवेशन हुआ.
अपनी स्थापना से ही मुस्लिम लीग ने विभाजनकारी नीति अपनाना प्रारंभ कर दिया. सर्वप्रथम उसने बंगाल विभाजन का समर्थन किया उसके बाद 1909 में अलग निर्वाचक मंडल की मांग की. मुस्लिम लीग के उभार के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा भी मुस्लिम तुष्टिकरण का कार्य प्रारंभ हो गया. जिसका उदाहरण है, 1916 में मुस्लिम लीग एवं कांग्रेस के बीच हुआ लखनऊ समझौता जिसके तहत पृथक निर्वाचन मंडल की मुस्लिम लीग की मांग कांग्रेस ने स्वीकार कर ली. दूसरा उदाहरण है तुर्की के खलीफा को हटाए जाने को लेकर चल रहे खिलाफत आंदोलन को कांग्रेस का समर्थन. कांग्रेस को लगा कि मुस्लिम तुष्टीकरण के माध्यम से वह मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने एवं मुस्लिम लीग के साथ जाने से रोकने में सफल होगी. लेकिन कांग्रेस की यह सोच गलत एवं देश के लिए घातक साबित हुई.
कांग्रेस से मोह भंग होने के बाद मोहम्मद अली जिन्ना लंदन चले गए थे. जुलाई 1933 में लियाकत अली खान अपनी नव विवाहिता पत्नी के साथ वहां वह मोहम्मद अली जिन्ना से मिले. उनके और उनकी बेगम के निवेदन पर जिन्ना 1934 में भारत आए और मुस्लिम लीग की कमान अपने हाथों में ले लिया. जिन्ना द्वारा मुस्लिम लीग की कमान अपने हाथों में लेने के 6 साल के अंदर 23 मार्च 1940 को लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित किया और दो राष्ट्र के सिद्धांत को राजनीतिक रूप से स्थापित कर दिया. इसी अधिवेशन को संबोधित करते हुए जिन्ना ने कहा,'सदा से यह गलत धारणा रही है कि मुसलमान एक अल्पसंख्यक समुदाय है. मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं है. वह किसी भी परिभाषा के अनुसार एक राष्ट्र हैं. यह बिल्कुल दुःस्वप्न है कि हिंदू और मुसलमान एक ही राष्ट्र के वासी हो सकेंगे. हिंदू और मुसलमान दो भिन्न धार्मिक दर्शन है. भिन्न सामाजिक रीति रिवाज हैं. वास्तव में यह दो अलग सभ्यताएं हैं जो विरोधी विचारधारा व भावनाओं पर आधारित है. हिंदू और मुसलमान इतिहास के अलग स्रोतों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं. उनके महाकाव्य अलग हैं. उनके नायक अलग है. मुसलमान भारत का कोई ऐसा संविधान स्वीकार नहीं करेगा जिसका परिणाम हिंदू बहुमत की सरकार हो.'
अंग्रेजी सरकार के शह पर मुस्लिम लीग एवं जिन्ना पाकिस्तान की मांग को तेज करते गए लेकिन दुर्भाग्य से उसका उसी ताकत से प्रतिकार करने के स्थान पर कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण में ही लगी रही. मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर एक तरह से अंग्रेजी सरकार एवं मुस्लिम लीग की बात मानते हुए कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन को स्वीकार करते हुए अंतरिम सरकार एवं संविधान सभा में शामिल होने को तैयार हो गई. कांग्रेस का अध्यक्ष ही अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री बनने वाला था. जुलाई 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ तथा गांधी जी की पसंद से जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया. अध्यक्ष बनने के बाद नेहरू ने कांग्रेस कार्य समिति के सामने भाषण दिया. उन्होंने कहा,' जहां तक मैं देख सकता हूं यह प्रश्न कांग्रेस द्वारा कैबिनेट मिशन की किसी भी छोटी या बड़ी योजना को स्वीकार करने का नहीं है. यह सिर्फ संविधान सभा में शामिल होने की उसकी सहमति का था इससे अधिक कुछ नहीं. हम उस सभा में तब तक रहेंगे जब तक हम समझते हैं कि यह भारत के हित में है और हम इसे तब बाहर हो जाएंगे जब समझेंगे कि यह उनके उद्देश्यों के लिए घातक है. हम किसी भी चीज से बंधे नहीं है शिवाय इसके कि हमने संविधान सभा में जाना तय कर लिया है.' लेकिन दुर्भाग्य से पंडित नेहरू अपने इस कथन पर टिके नहीं रह सके. मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान की मांग पर अड़े मोहम्मद अली जिन्ना ने, पंडित नेहरू के भाषण को बहाना बनाकर, 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्ताव पारित कर कैबिनेट मिशन को नामंजूर कर सीधी कार्यवाई यानी डायरेक्ट एक्शन की घोषणा की ताकि वह अपनी मांग मनवाने के लिए कांग्रेस एवं ब्रिटिश सरकार को मजबूर कर सके.
पाकिस्तान की मांग के लिए देश को मजबूर करने के लिए जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को सीधी कार्रवाई - डायरेक्ट एक्शन - प्रारंभ किया. पूरे देश में भयंकर रक्तपात हुआ. बंगाल के प्रधानमंत्री हुसैन सुहरावर्दी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने कलकत्ता में हिंदुओं का भयंकर नरसंहार किया. कलकत्ता के बाद नोआखली में हिंदुओं का नरसंहार हुआ. पूरे देश में मुस्लिम लीग ने हिंसा का उत्पात मचा दिया. जिन्ना की सीधी कार्रवाई का कांग्रेस के पास कोई प्रत्युतर नहीं था. जिन्ना एवं मुस्लिम लीग को उसी की भाषा में जवाब देने के बजाय कांग्रेस ने जिन्ना के ब्लैकमेल के आगे घुटने टेक दिए. कांग्रेस ने भारत की अखंडता की रक्षा करने के बजाय माउंटबेटन योजना के तहत मातृभूमि का विभाजन स्वीकार कर लिया. धर्म के नाम पर भारत का विभाजन कर 14 अगस्त 1947 को मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान दे दिया गया.
स्वतंत्रता का जो क्षण पूरे राष्ट्र के लिए उत्सव का होना चाहिए था वह मानव इतिहास के सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में बदल गया. करोड़ों लोग विस्थापित हो गए. जो घर, खेत-खलिहान, व्यापार, सिंध, बलोचिस्तान, पश्चिम पंजाब, पूर्वी बंगाल भारत में थे वह रात और रात पाकिस्तान का हिस्सा हो गया. लाखों हंसते-खेलते परिवार सड़कों पर आ गए. इस दौरान भयंकर कत्लेआम हुआ. मां बहनों की इज्जत लूटी गई. लाखों लोग मारे गए. यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन था. विभाजन की यह ऐसी पीड़ा है जिसे न तो भुलाया जा सकता है न भुलाया जाना चाहिए. इसे आने वाली पीढ़ियों को बार-बार दोहराते रहने की आवश्यकता है ताकि इसे भविष्य में दोहराया ना जा सके. दुर्भाग्य से देश के जिन दो राजनीतिक दलों भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग पर देश का भाग्य निर्धारण करने का दायित्व आन पड़ा और जो देश विभाजन के लिए उत्तरदायी हैं, उन दोनों ही का गठन अंग्रेजी साम्राज्य की सहमति से और उसके द्वारा, उसकी रक्षा के लिए हुआ था. इन दोनों ही संगठनों का जन्म किसी राष्ट्रवाद या राष्ट्रीय संघर्ष के लिए न होकर के अंग्रेजी हितों की रक्षा के लिए हुआ था. इनके जन्म के पीछे कोई गौरवशाली गाथा, व्यक्ति या विचार नहीं था. नहीं तो देश का विभाजन नहीं होता. भारत के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन के लिए तीन उत्तरदायी है – अंग्रेज सरकार, कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सह सरकार्यवाह यादव राव जोशी के अनुसार, ‘14 अगस्त 1947 इसलिए कलंक का दिन नहीं है कि उस दिन हमारा कुछ भूभाग चला गया. भूभाग तो पहले भी गए पर उन्हें हमने पुनः पराक्रम से वापस प्राप्त कर लिया. यह भूभाग हमारा है यह हम भूल नहीं है. गुलामी में ही सही पर राष्ट्रवादी जनता उसी भूभाग पर रही. शिवाजी को मजबूरी में कई किले छोड़ने पड़े परंतु उनका संकल्प यही रहा कि जब तक उन्हें वापस नहीं ले लूंगा चैन से नहीं बैठूंगा. ऐसा ही अगर 14 अगस्त 1947 को हुआ होता राजनीतिक मजबूरी में भूभाग गवाया होता तो विशेष दुख नहीं था. परंतु उस दिन तो हमारे हृदय में ही यह परिवर्तन आ गया कि जो भूभाग कटा है वह हमारा नहीं है. इसलिए उसे वापस लेने का प्रश्न ही नहीं, वह एक ‘सेटेल्ड फैक्ट' बन गया.' वास्तव में भारत की सभी समस्याओं का जड़ ही है भारत का विभाजन. इन सभी समस्याओं के समाधान एवं संपूर्ण क्षेत्र तथा एशिया में शांति का एक ही उपाय है 'अखंड भारत'.
(बिपिन कुमार तिवारी पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं. वह सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च एण्ड स्टडीज (CPRS) के अध्यक्ष और नीतिपोस्ट के संपादक हैं)
इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.
ये भी पढ़ें : सरकारों को जनतांत्रिक बनाए रखने वाले 'हम भारत के लोग...'