कर और प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर अमेरिका की तेरह कॉलोनियों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया था. उनके प्रतिनिधियों, जिन्हें कांटिनेंटल कांग्रेस कहा गया, ने चार जुलाई 1776 को यह घोषणा कर दी कि वे अब स्वतंत्र हैं. जिस ब्रितानी साम्राज्य का कभी सूरज नहीं डूबता था, उसके खिलाफ यह कोई पहला विद्रोह नहीं था, लेकिन यह सबसे पहला सफल विद्रोह साबित हुआ. आख़िरकार यॉर्कटाउन में कार्नवालिस की फ़ौज ने आत्मसमर्पण किया. यह ख़बर जब नवंबर 1781 में लंदन पहुंची तो ब्रिटिश प्रधानमत्री लार्ड नार्थ की छाती पर जैसे कोई भारी गेंद लगी हो. उनके शब्द थे, 'हे भगवान! सब ख़त्म हो गया'. अमेरिका ब्रितानी चंगुल से आजाद हो चुका था.
किस सौदे से बढ़ा अमेरिका का क्षेत्रफल
आज अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा के 250 साल हुए. अमेरिका अपनी आजादी की 250वीं सालगिरह मना रहा है.अमेरिका की आजादी से पूरी दुनिया को यह संदेश गया कि ब्रितानी हुकूमत को घुटनों पर लाया जा सकता है, उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ भी जंग जीती जा सकती है. उस समय महज 25 लाख की आबादी वाला यह देश, आज दुनिया की 25 फीसद इकॉनमी पर काबिज है. अमेरिका मानो अपनी किस्मत मानो लेकर आया था. ब्रिटेन से लड़ने के लिए फ्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट को धन की ज़रूरत थी. साल 1803 में तीसरे अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने बोनापार्ट से करीब 828,000 वर्ग मील जमीन केवल 1.5 करोड़ डॉलर में खरीद ली. जमीन के इस सौदे ने रातों-रात संयुक्त राज्य अमेरिका के भौगोलिक क्षेत्र को दोगुना कर दिया. मिसिसिपी नदी से लेकर रॉकी माउंटेन्स तक फैले इस विशाल क्षेत्र ने अमेरिका को दुनिया के सबसे समृद्ध कृषि मैदान और जलमार्ग सौंप दिए. लूसियाना खरीद से पहले, अमेरिका एक 'तटीय और रक्षात्मक' मानसिकता में जी रहा था. उसकी पूरी ताकत इस बात पर खर्च होती थी कि यूरोप की औपनिवेशिक ताकतें (ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन) उस पर दोबारा हमला न कर दें. इस सौदे ने अमेरिका की इस सोच को जड़ से बदल दिया. जब अमेरिका ने जान लिया कि वह अपने महाद्वीप में अजेय हो चुका है, तो उसने ठीक 20 साल बाद 'मुनरो सिद्धांत' की घोषणा की. इसमें अमेरिका ने यूरोपीय ताकतों को चेतावनी दी कि वे पश्चिमी गोलार्ध से दूर रहें, यहीं से अमेरिका के भीतर महाद्वीपीय शक्ति के रूप में वैश्विक भूमिका की चाह जगी.
अमेरिका कैसे बनता गया अजेय
दुनिया में क्रांतियां कई हुई हैं, लेकिन सफल क्रांतियां कम हैं. क्रांति के उथल-पुथल के बाद एक टिकाऊ व्यवस्था बनाना, क्रांति करने से कहीं अधिक बड़ी चुनौती होती है. अमेरिका ने इसमें भी नज़ीर बनाई. जो ब्रिटेन स्वयं को आधुनिक लोकतंत्र की जननी कहता था, उसके समक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य का आदर्श दिया. इतिहास के उस मोड़ से अमेरिका आजादी का, लोकतंत्र का, अवसर का, नवाचार का, उदारवाद का, कॉस्मोपॉलिटन कल्चर, वैश्वीकरण का और संघीय संविधानवाद का एक अजेय प्रतीक बनकर उभरा. ऐसा नहीं कि सब भाग्य के भरोसे हुआ. एक नए देश ने जब 'अमेरिकन ड्रीम' गढ़ा तो तीव्र औद्योगीकरण से गुजरा, सामाजिक जीवन में अस्त-व्यस्त से व्यवस्थित तक के गहरे संघर्ष हुए. गृह युद्ध ने करीब छह लाख बीस हज़ार ज़िन्दगियां छीन लीं. इसके बाद अमेरिका ने स्टील, रेल-रोड, उद्योग में अभूतपूर्व प्रगति की, तब तक प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया. अमेरिका की औद्योगिक प्रगति ने उसे विश्वयुद्ध में कमाई करने का मौका दे दिया. अमेरिका ने लीग ऑफ़ नेशंस की स्थापना में सहयोग दिया. लेकिन वह उसमें कभी शामिल नहीं हुआ. अमेरिकी विदेश नीति का पैनापन यूरोप समेत पूरी दुनिया ने महसूस किया. 1929-1939 के ग्रेट डिप्रेशन (आर्थिक मंदी) ने अमेरिका को सिखाया कि अनियंत्रित बाजार देश का बेड़ा गर्क कर सकता है. पर्ल हार्बर के साथ ही अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में भी कूदा. दो जापानी शहरों की तबाही के साथ वह दुनिया की बड़ी सैन्य और औद्योगिक शक्ति के रूप में उभरा.
सबसे अधिक नोबेल पुरस्कार किस देश को मिले हैं
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद वैश्विक संस्थाओं के निर्माण में अमेरिका की महती भूमिका रही, जिसका इस देश ने अपने हितों के लिए भरपूर इस्तेमाल में भी लिया. ब्रेटनवुड संस्थाओं ने दुनिया का व्यापार अमेरिकी डॉलर में होने के लिए एक मजबूत ज़मीन दे दी. मार्शल प्लान और नेटो की स्थापना से पश्चिमी यूरोप सहित पूरे अमेरिकी महाद्वीप के लिए अमेरिका एक अमीर फाइनेन्सर और नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर बन गया. शीत युद्ध में अमेरिका को सोवियत चुनौती मिली. वियतनाम युद्ध में इसके सामरिक अहम को ठेस लगी. साठ के दशक तक अमेरिका अपनी बढ़ती आबादी के लिए खाद्य संसाधनों में आत्मनिर्भर बन चुका था, इस आत्मनिर्भरता ने अमेरिका को दक्षिण एशिया और भारत जैसे देशों में हरित क्रांति का बीजारोपण करके इसकी पहुंच इन बाजारों में भी कर दी. इससे उसकी वैश्विक भूमिका और मजबूत हुई. 1969 में अमेरिकी कदमों ने चांद को नापा तो अगले तीन सालों में अमेरिका ने वैश्विक स्तर पर गोल्ड स्टैण्डर्ड की जगह वैश्विक पेट्रोडॉलर सिस्टम से अपनी वैश्विक पैठ बनाई. दुनिया में सर्वाधिक 430 से अधिक नोबेल पुरस्कार के साथ अमेरिकी वैज्ञानिक उपलब्धियों ने दुनिया को भी सौगातें दीं. लेकिन इसका सर्वाधिक फ़ायदा अमेरिका को ही मिला.सोवियत संघ के ढहते ही शीत युद्ध खत्म हुआ. इसके बाद अमेरिका दुनिया का निर्विवाद एकल शक्ति बना.
1995 से डब्लूटीओ की शुरुआत हुई. यह धीरे-धीरे पूरी दुनिया में अमेरिका वैश्वीकरण का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया. पूरी दुनिया में रूल बेस्ड ऑर्डर, लिबरल वर्ल्ड ऑर्डर, फ्रीडम ऑफ़ नेविगेशन, उदारीकरण, ग्लोबल कॉमन्स, अंतरराष्ट्रीय कानून जैसे जुमले मशहूर हो गए. अमेरिका आदर्शों की बात करते-करते साम्राज्यवादी देशों जैसी दादागिरी भी जब-तब करने लगा. आज हम सभी एक अमेरिकन मूल्य व्यवस्था में सांस ले रहे हैं. यह इतना प्रभावी है कि इसके पक्ष और विपक्ष के विमर्शों के अधिकांश तर्क अमेरिकन स्रोतों से ही आयातित होते हैं और बहुधा यह इतना महीन होता है कि पता ही नहीं लगता. आज भी अमेरिका की हैसियत के आगे चीन की प्रगति एक शक्तिशाली उभार ही है. पचास के दशक का अमेरिका समूचे विश्व के लिए एक समान वैश्विक क्षेत्र की बात करता था, आज उसे ग्लोबल साउथ और भारत-चीन का उभार चुभता है. अमेरिका प्रचंड हथियारों को लगातार बेचते हुए विश्व शांति की बात करता है. यूरोपियन और अमेरिकी औद्योगिक विकास के कार्बन फुटप्रिंट के इतिहास को दरकिनार करते हुए विकासशील देशों से समानता के आधार पर क्लाइमेट चेंज अभियानों में अमेरिका हिस्सा मांगता है और रूल बेस्ड ऑर्डर के जुमले के साथ संयुक्त राष्ट्र के सुधार से ठिठकता है. ब्रितानी साम्राज्य ने दुनिया में जो फ़ॉल्टलाइंस गढ़ी थीं, उनमें अधिकांश में अमेरिका ने अपना अवसर पहचाना है. उसने उन्हें सुलझाने के बजाय उससे अपनी वैश्विक प्रासंगकिता बना रखी है.
आजादी का सफर और आज का अमेरिका
अमेरिका से उसकी इस ऐतिहासिक हैसियत की वजह से एक सकारात्मक अपेक्षा तो रहती ही है लेकिन आइए देखते ख़ुद अमेरिका आज की तारीख़ में इन अपेक्षाओं के लिए भीतर से कितना तैयार है. अमेरिका की आजादी के सौ साल होने पर 1876 में माहौल में गृह युद्ध की दुखद यादें थीं, लेकिन आजादी के दो सौ साल जब 1976 में पूरे हुए तो अमेरिका ने इसे बेहद धूमधाम से मनाया. इसकी यादें आज भी अमेरिकी समाज में हैं. आजादी के 250 साल होने पर भी अमेरिका ऐसे ही शानदार उत्सव मनाए, इस मंशा से दस साल पहले ही 2016 में अमेरिकी संसद कांग्रेस ने एक सेमिक्विनसेंटिनियल कमीशन (अमेरिका250) बनाया जो दलगत भाव से मुक्त था. जार्ज बुश और बराक ओबामा, दोनों इस कमीशन के को-चेयर बनाए गए. उम्मीद थी कि जो 250 सालों का जश्न होगा वो बिना किसी संकीर्ण जिरह के होगा और पूरी दुनिया देखेगी कि अमेरिका मजबूत है और संगठित भी है. लेकिन अफ़सोस ऐसा नहीं हो सका. ट्रंप प्रशासन ने इसे मनाने के लिए अपनी ख़ुद की मुहिम 'Freedom250' शुरू कर दी. अब अमेरिकी समाज का बंटवारा खुलकर दुनिया के सामने आ गया है.अख़बार 'द वाशिंगटन पोस्ट' और 'द गार्डियन' लिखता है कि इसमें बहुत संदेह है कि अमेरिका इस जश्न को मिलजुलकर मना पाने की स्थिति में है. दुनिया में बेहद प्रतिष्ठित प्यू रिसर्च सेंटर अमेरिकी समाज को वर्तमान में सर्वाधिक बंटा हुआ समाज बताता है, उसने नौ ऐसे क्षेत्र भी इंगित किए हैं, जहां अमेरिकी समाज बिल्कुल भी एक साथ नहीं खड़ा है. 83 फीसद अमेरिकी ये सोचते हैं कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि उनके पसंद-नापसंद के बारे में बिल्कुल नहीं सोचते. अधिकांश यह मानते हैं कि अमेरिकी प्रशासन लोकतांत्रिक मूल्यों की जगह व्यक्तिपूजक विचारों से अपने निर्णय कर रहा है.
एक जमाना था जब अमेरिकी विचारक ब्रितानी हुकूमत को दुकानदार की सोच वाला कहते थे और आज अमेरिका अपनी छवि स्वयं ही बस डीलमेकर की बना रहा है. 250 साल का अमेरिका अब हर समझौते में ख़ूब महीन तरीक़े से मोल-भाव कर रहा है, चाहे वे देश उसके इतिहास के दोस्तों में ही क्यों न हों या उसके अपने पड़ोसी ही क्यों न हों. रेसीप्रोकल टैरिफ का भारतीय अनुभव भी कोई बहुत सुखद नहीं है. ग्लोबल साउथ, दक्षिण एशिया और भारत जैसे देश अमेरिकी आजादी के 250 साल होने पर इस अमेरिका से काग़ज़ी अमेरिकी आदर्श की उम्मीद न रखें, वे तैयार रहें कि उनके दुनिया के रिश्तों में वैविध्य रहे और विदेश नीति उनकी अवश्य ही स्वायत्त बनी रहे. बंटे हुए 64 फीसद (गैलप पोल) अमेरिकी भी यही चाहते हैं कि अमेरिका अपनी वैश्विक भूमिका पर पकड़ बनाये रखे. अमेरिकी विदेश नीति की सर्वाधिक प्रसिद्ध पत्रिका 'फ़ॉरेन अफेयर्स' इस अवसर पर लिखती है,'डोंट गिव अप ऑन ग्लोबल ऑर्डर.' ऐसे में भारत जैसे देशों को अमेरिका के अगले 250 सालों में अपनी आर्थिक क्षमता, सुरक्षा क्षमता और विदेश नीति को इस मुक़ाम पर ले जाना है, जहां कोई एक देश दादागिरी पर उतारू न हो और भारत सहित सभी देश 'विश्वमित्र' बनें.
(डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ से पीएचडी और एमफिल हैं. इस समय वो एमिटी यूनिवर्सिटी के नोएडा कैंपस के एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल) हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)