- मकर संक्रांति पर चूड़ा-दही भोज की परंपरा सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है
- CM नीतीश कुमार के आवास पर मकर संक्रांति पर चूड़ा-दही भोज का आयोजन सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है
- इस बार चूड़ा-दही भोज की राजनीति सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहेगी, जिसमें नेताओं के फोटो और संदेश साझा किए जाएंगे
बिहार में जैसे ही मकर संक्रांति का त्योहार नज़दीक आता है, वैसे ही राजनीति में भी हलचल तेज़ हो जाती है.वजह है चूड़ा–दही. यह परंपरागत भोजन बिहार की संस्कृति का अहम हिस्सा है,लेकिन समय के साथ यह राजनीतिक प्रतीक भी बन गया है.हर साल मकर संक्रांति के मौके पर राज्य के बड़े-बड़े नेता चूड़ा–दही भोज का आयोजन करते हैं. इसके ज़रिये वे जनता, कार्यकर्ताओं और सामाजिक वर्गों से जुड़ने की कोशिश करते हैं.इस बार भी सत्ताधारी और विपक्षी, दोनों खेमों में इसकी तैयारियां ज़ोरों पर हैं.
बिहार में मकर संक्रांति पर चूड़ा, दही, तिलकुट और गुड़ खाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है.गांवों में लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते हैं.धीरे-धीरे नेताओं ने भी इस परंपरा को अपनाया.पहले यह सिर्फ एक सामाजिक आयोजन था,लेकिन अब यह सियासी कैलेंडर का स्थायी हिस्सा बन चुका है. नेताओं के आवास पर चूड़ा–दही भोज, कार्यकर्ताओं के साथ मुलाकात और मीडिया कवरेज, सब कुछ पहले से तय रहता है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवास पर हर साल मकर संक्रांति के दिन चूड़ा–दही का आयोजन होता है. इस कार्यक्रम में मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाता है. जदयू इसे सामाजिक समरसता का प्रतीक बताता है. पार्टी नेताओं का कहना है कि यह आयोजन राजनीति से ऊपर उठकर बिहार की संस्कृति को सम्मान देने के लिए होता है.
विपक्षी दल , राजद, कांग्रेस और वाम दल भी चूड़ा–दही की सियासत में पीछे नहीं हैं. राजद के नेता इसे गरीब, किसान संस्कृति से जोड़ते हैं. पार्टी का तर्क है कि चूड़ा–दही आम लोगों का भोजन है और इसी बहाने जनता से सीधे संवाद होता है. राजद कई जगहों पर कार्यकर्ता सम्मेलनों और छोटे सामाजिक आयोजनों के ज़रिये मकर संक्रांति मनाने की योजना बना रही है. कांग्रेस भी शहरों और कस्बों में छोटे स्तर पर कार्यक्रम कर सामाजिक सौहार्द और आम आदमी के मुद्दों को उठाने की तैयारी में है.
राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, चूड़ा–दही की सियासत इसलिए असरदार मानी जाती है क्योंकि यह भावनाओं से जुड़ी होती है. इसमें न तो बड़े मंच होते हैं, न महंगे इंतज़ाम. नेता जब आम लोगों के साथ ज़मीन पर बैठकर वही खाना खाते हैं, तो एक अपनापन बनता है.
इसके अलावा, यह आयोजन दिखावे से दूर माना जाता है. इसलिए जनता इसे आसानी से स्वीकार कर लेती है. यही कारण है कि हर पार्टी इस मौके को भुनाने की कोशिश करती है.
इस बार चूड़ा–दही की राजनीति सिर्फ ज़मीनी नहीं रहेगी. सोशल मीडिया पर भी इसका असर दिखेगा. नेताओं के चूड़ा–दही खाते हुए फोटो, वीडियो और शुभकामना संदेश फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम पर साझा किए जाएंगे. हालांकि कुछ लोग इस सियासत पर सवाल भी उठाते हैं. उनका कहना है कि त्योहारों पर ऐसे आयोजन ठीक हैं, लेकिन इससे आम लोगों की समस्याएं जैसे बेरोज़गारी, महंगाई और विकास हल नहीं होतीं. कुल मिलाकर, मकर संक्रांति के साथ ही बिहार में चूड़ा–दही की सियासत एक बार फिर शुरू हो गई है. सत्ताधारी हों या विपक्ष, सभी दल इस सांस्कृतिक मौके के ज़रिये जनता से जुड़ने और अपना संदेश देने में लगे हैं. यह परंपरा राजनीति और संस्कृति के मेल का उदाहरण बन चुकी है.
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