राजद ने बिहार विधान परिषद चुनाव में सुनील सिंह को उम्मीदवार बनाकर अपने एक भरोसेमंद नेता पर दांव लगाया है, लेकिन इस फैसले के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी की चर्चा भी शुरू हो गई है. विधानसभा चुनाव से पहले यह मामला अब राजद नेतृत्व के लिए एक नई चुनौती बनता दिखाई दे रहा है. सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वरिष्ठ नेता शिवचंद्र राम ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. शिवचंद्र राम लंबे समय से राजद से जुड़े रहे हैं और दलित समाज में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. उन्हें भी विधान परिषद सीट का दावेदार माना जा रहा था. लेकिन टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी. उनके इस्तीफे ने यह संकेत दिया कि पार्टी के भीतर कई नेता टिकट वितरण से संतुष्ट नहीं हैं.
मुकेश सहनी को मिली निराशा
दूसरी तरफ वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी को लेकर भी चर्चाएं चल रही हैं. पिछले कुछ महीनों में मुकेश सहनी और तेजस्वी यादव कई कार्यक्रमों में साथ दिखाई दिए हैं. निषाद समाज को महागठबंधन के साथ जोड़ने में भी सहनी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि राजद उन्हें विधान परिषद भेजकर बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद सहनी समर्थकों के बीच भी निराशा की बातें सामने आने लगीं.
रोहणी आचार्य की नाराजगी
इस पूरे विवाद में एक नया मोड़ तब आया जब लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट किए. रोहिणी ने सीधे किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके पोस्ट को कई लोगों ने राजद के फैसले और नेतृत्व पर नाराजगी के तौर पर देखा. राजनीतिक हलकों में इन पोस्टों की खूब चर्चा हुई. इससे यह संदेश गया कि पार्टी के अंदर कुछ फैसलों को लेकर मतभेद हो सकते हैं.
लेकिन राजनीति में हर फैसले का असर कई स्तर पर होता है. एक तरफ सुनील सिंह को मौका देकर राजद ने अपने पुराने नेताओं को सम्मान देने का संदेश दिया है, तो दूसरी तरफ शिवचंद्र राम का इस्तीफा, मुकेश सहनी की नाराजगी की चर्चा और रोहिणी आचार्य के सोशल मीडिया पोस्ट ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं.
राजद की रणनीति
महागठबंधन के लिए भी यह मामला महत्वपूर्ण है. विधानसभा चुनाव करीब हैं और राजद को अपने सभी सहयोगी दलों को साथ लेकर चलना होगा. कांग्रेस, वाम दल और वीआईपी जैसे दल चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे. ऐसे में राजद यह कोशिश करेगा कि किसी भी सहयोगी दल को यह महसूस न हो कि उसकी अनदेखी की जा रही है.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजद इन नाराज नेताओं और सहयोगियों को कैसे मनाएगा. माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे, संगठन में जिम्मेदारियां और भविष्य की राजनीतिक भूमिका के जरिए असंतोष को कम करने की कोशिश की जाएगी.
फिलहाल इतना तय है कि विधान परिषद की एक सीट ने राजद और महागठबंधन के भीतर कई राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं. आने वाले दिनों में तेजस्वी यादव की चुनौती केवल एनडीए से मुकाबला करने की नहीं होगी, बल्कि अपने नेताओं और सहयोगियों को एकजुट बनाए रखने की भी होगी. विधानसभा चुनाव से पहले यह संतुलन बनाए रखना राजद के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा.
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