"मैं जिंदा हूं. पेंशन बंद की दी है. केवाईसी कराने गए, वहां पता चला मुझे मृत घोषित किया है. इसे चालू कर दीजिए..." यह गुहार किसी आम नागरिक की नहीं, बल्कि गया नगर निगम की महिला पार्षद शीला देवी की है. बिहार के गया जिले में सरकारी सिस्टम की एक ऐसी बड़ी लापरवाही सामने आई है, जिसने न सिर्फ व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि एक जीवित जनप्रतिनिधि को ही सरकारी आंकड़ों में मृत घोषित कर दिया है.
आखिर कैसे खुली पोल?
शीला देवी अपने पति के निधन के बाद मिलने वाली विधवा पेंशन ले रही हैं. पिछले कुछ समय से उनके बैंक खाते में पेंशन आनी बंद हो गई थी. तो वह कार्यालय पहुंची, जहां केवाईसी कराने की बात बताई गई. इसके बाद जब वो विधवा पेंशन का लाभ लेने के लिए KYC कराने पहुंची तो वार्ड पार्षद के होश हीं उड़ गए. दरअसल विधवा पेंशन की राशि बंद करने की वजह में अंकित था कि जांच में लाभुक मृत है.
अपनी ही मौत की खबर सुनकर पार्षद शीला देवी ने इसे अधिकारियों की लापरवाही बताया. दिया है. उन्होंने कहा कि इस गलती को जल्द सुधारा जाए और पेंशन को फिर से शुरू किया जाए. उन्होंने आरोप लगाया कि घर बैठे जांच करने का यह नतीजा है, जो घोर लापरवाही को उजागर करता है. ऐसे कर्मचारी और अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए.
क्या बोले पार्षद प्रतिनिधि?
वार्ड पार्षद प्रतिनिधि ओम यादव ने सवाल उठाया कि जब एक सक्रिय जनप्रतिनिधि को कागजों पर मृत दिखाया जा सकता है, तो न जाने ऐसे कितने गरीब और असहाय बुजुर्ग या विधवाएं होंगी, जिनकी पेंशन इसी तरह की लापरवाही की वजह से रोक दी गई होगी.
फिलहाल, अब वार्ड पार्षद खुद को जीवित साबित करने में जुटी हैं, जिससे उनकी पेंशन बहाल हो सके और सिस्टम की इस बड़ी भूल को सुधारा जा सके.
(गयाजी से रंजन सिन्हा की रिपोर्ट)
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