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DRDO की नई तकनीक से भारतीय नेवी की बढ़ेगी ताकत, पनडुब्बियां हफ्तों तक रहेंगी समुद्र के भीतर

भारतीय नौसेना की कलवरी‑क्लास INS खंडेरी में स्वदेशी AIP (एयर‑इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन) 2026 तक लगाया जाएगा. डीआरडीओ–NMRL की फॉस्फोरिक एसिड फ्यूल‑सेल तकनीक का यह सिस्टम 200 kW+ क्षमता दिखा चुका है.

DRDO की नई तकनीक से भारतीय नेवी की बढ़ेगी ताकत, पनडुब्बियां हफ्तों तक रहेंगी समुद्र के भीतर
एआई जेनरेटेड इमेज
  • भारतीय नौसेना की पनडुब्बी INS खंडेरी में इस साल के अंत तक स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम लगाया जाएगा
  • AIP तकनीक से पनडुब्बी कई हफ्तों तक समुद्र के भीतर रह सकती है, जिससे छिपकर संचालन क्षमता बढ़ेगी
  • यह सिस्टम फ्यूल-सेल आधारित है, जो पनडुब्बी के अंदर हाइड्रोजन तैयार कर स्वच्छ ऊर्जा उत्पन्न करता है
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नई दिल्ली:

भारतीय नौसेना को जल्द एक बड़ी तकनीकी बढ़त मिलने वाली है. इस साल के अंत तक नौसेना की एक पनडुब्बी में स्वदेशी एयर‑इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगाया जा सकता है. यह सिस्टम डीआरडीओ ने विकसित किया है. इसे सबसे पहले कलवरी क्लास की पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में फिट किया जाएगा. INS खंडेरी में यह सिस्टम दिसंबर 2026 तक लग जाने की उम्मीद है. इससे भारत की समुद्र के नीचे लड़ाई करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी.

AIP क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है

AIP एक खास तकनीक है, जिसकी मदद से डीजल‑इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र के अंदर रह सकती हैं. सामान्य तौर पर ऐसी पनडुब्बियों को हर कुछ दिनों में बैटरी चार्ज करने के लिए सतह के पास आना पड़ता है, जहां पकड़े जाने का जोखिम बढ़ जाता है. उस समय दुश्मन के रडार या एंटी‑सबमरीन सिस्टम उन्हें खोज सकते हैं. AIP लगने के बाद पनडुब्बी को बार‑बार सतह के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे स्टेल्थ (छिपकर संचालन) क्षमता काफी बढ़ जाती है.

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कितनी देर पानी के भीतर रह सकेगी पनडुब्बी

AIP सिस्टम लगने के बाद पनडुब्बी कई हफ्तों तक पानी के भीतर रह सकती है. कम गति पर यह लगभग 13 से 21 दिन तक लगातार समुद्र के भीतर काम कर सकती है. इस दौरान उसे बैटरी चार्ज करने के लिए सतह के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे सतर्कता और जीवंतता दोनों बेहतर होती हैं.

फ्यूल‑सेल आधारित स्वच्छ ऊर्जा, सबमरीन के भीतर हाइड्रोजन तैयार

इस तकनीक में फ्यूल‑सेल का इस्तेमाल किया जाता है. हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली बनती है. इस प्रक्रिया में धुआं या प्रदूषण नहीं निकलता और इसका मुख्य बाई‑प्रोडक्ट साफ पानी होता है. खास बात यह है कि पनडुब्बी के अंदर ही हाइड्रोजन तैयार किया जाता है.

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NMRL की फॉस्फोरिक एसिड फ्यूल‑सेल तकनीक, दीर्घकालिक ट्रायल सफल

भारत का यह AIP सिस्टम पुणे की नेवल मटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (NMRL) ने तैयार किया है. इस प्रयोगशाला ने फॉस्फोरिक एसिड फ्यूल‑सेल तकनीक का उपयोग किया है. परियोजना को करीब 2014 में स्वीकृति मिली थी. सिस्टम का जमीन पर लंबे समय तक परीक्षण किया गया है और यह सभी जरूरी मानकों पर खरा उतरा है. ट्रायल के दौरान इस सिस्टम ने 200 किलोवॉट से ज्यादा बिजली पैदा करने की क्षमता दिखाई.

फिटमेंट टाइमलाइन: मॉड्यूल हैंडओवर, सी‑ट्रायल और अपग्रेड शेड्यूल

अब इस तकनीक को INS खंडेरी में लगाया जाएगा. सूत्रों के मुताबिक अगले 3–4 महीनों में इस AIP का एनर्जी मॉड्यूल मझगांव डॉक शिपयार्ड लिमिटेड (MDL) को सौंप दिया जाएगा. जब INS खंडेरी मरम्मत और अपग्रेड के लिए डॉकयार्ड में होगी, तब इस मॉड्यूल को पनडुब्बी के अंदर फिट किया जाएगा. सूत्रों के अनुसार, शुरुआती समुद्री परीक्षण जुलाई–अगस्त 2027 के बीच शुरू हो सकते हैं. पूरा अपग्रेड और ओवरहॉल 2028 की शुरुआत तक पूरा होने की उम्मीद है.

रणनीतिक बढ़त और आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

यदि यह तकनीक पूरी तरह सफल होती है, तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने खुद AIP तकनीक विकसित की है. इससे भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ेगी और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी.

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