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बिहार में बीजेपी के 4 MLC उम्मीदवार, सियासी संदेश के साथ समीकरण और गठबंधन साधने की कोशिश

राजनीतिक तौर पर देखें तो इन चारों नामों में भाजपा का बड़ा सामाजिक और चुनावी गणित दिखाई देता है. जो राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है.

बिहार में बीजेपी के 4 MLC उम्मीदवार, सियासी संदेश के साथ समीकरण और गठबंधन साधने की कोशिश
बिहार में MLC उम्मीदवार (NDTV)
Bihar News:

पवन सिंह भाजपा के सबसे चर्चित चेहरों में गिने जा सकते है और पिछले कुछ समय से पार्टी के संगठनात्मक कामकाज से जुड़े रहे हैं. उनकी पहचान केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता की नहीं, बल्कि भोजपुरी फिल्म और सांस्कृतिक जगत से जुड़े एक लोकप्रिय चेहरे के रूप में भी रही है. बिहार, पूर्वांचल और प्रवासी भोजपुरी समाज के बीच उनकी अच्छी पहचान है. वे राजपूत समाज से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में प्रभावशाली सवर्ण जातियों में गिना जाता है. भाजपा उन्हें इस लिए मौका दे रही है की इससे पार्टी को कई स्तरों पर फायदा मिल सकता है. एक तरफ राजपूत समाज को मजबूत संदेश जाएगा, वहीं दूसरी तरफ भोजपुरी क्षेत्र में पार्टी को एक ऐसा चेहरा मिलेगा जिसकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान राजनीतिक दायरे से कहीं बड़ी है.

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा सवर्ण वोट बैंक को एकजुट रखने के साथ-साथ ऐसे चेहरों को आगे लाना चाहती है जिनकी पहुंच पारंपरिक राजनीति से बाहर भी हो. पवन सिंह को मौका देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

कायस्थ समाज से आते हैं संजय मयूख

डॉ. संजय मयूख भाजपा के सबसे चर्चित नेताओं में शामिल हैं. वे राष्ट्रीय प्रवक्ता होने के साथ-साथ राष्ट्रीय मीडिया सह-प्रभारी की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं. लगातार दो कार्यकाल से विधान परिषद सदस्य रहने के कारण उन्हें संगठन, सरकार और विधानमंडल तीनों का अनुभव है. दिल्ली और पटना दोनों जगह उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़ मानी जाती है. वे कायस्थ समाज से आते हैं. भाजपा उन्हें फिर मौका दे रही ताकि पार्टी के उस वर्ग को भी संदेश जाएगा जो संगठन के प्रति निष्ठा रखते है. साथ ही कायस्थ समाज और शहरी शिक्षित वर्ग के बीच भी सकारात्मक संदेश जाएगा. भाजपा के लिए यह राजनीतिक संतुलन बनाए रखने और अनुभवी चेहरों को आगे रखने की भी कवायत होगी.

अनिल ठाकुर के साथ गठबंधन साधने की कोशिश

अनिल ठाकुर भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और सीमांचल क्षेत्र में उनकी अच्छी राजनीतिक पकड़ मानी जाती है. वे नाई समाज से आते हैं, जो अतिपिछड़ा वर्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा है. बिहार की राजनीति में अतिपिछड़ा वर्ग चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाला बड़ा सामाजिक समूह माना जाता है. भाजपा और जेडीयू दोनों लंबे समय से इस वर्ग को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश करते रहे हैं. अनिल ठाकुर को मौका देकर भाजपा अतिपिछड़ा समाज को बड़ा संदेश देना चाहती है ताकि पार्टी में उनकी हिस्सेदारी लगातार बढ़े और साथ ही सीमांचल क्षेत्र में भी भाजपा अपनी राजनीतिक मौजूदगी को मजबूत करना चाहती है.

शीला पंडित हैं पिछला वर्ग की महिला प्रतिनिधित्व

शीला पंडित भाजपा की सक्रिय महिला नेताओं में शामिल हैं. वे बाल संरक्षण आयोग की सदस्य हैं और लंबे समय तक संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुकी हैं. वे प्रजापति समाज से आती हैं, जो पिछड़ा वर्ग की महत्वपूर्ण जातियों में माना जाता है. भाजपा पिछले कुछ वर्षों से गैर-यादव पिछड़ा वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. ऐसे में शीला पंडित को मौका देना महिला प्रतिनिधित्व और पिछड़ा वर्ग दोनों को साधने की कोशिश माना जाएगा. इससे भाजपा महिला मतदाताओं, पिछड़ा वर्ग और संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच सकारात्मक संदेश देने में सफल हो सकती है.

राजनीतिक तौर पर देखें तो इन चारों नामों में भाजपा का बड़ा सामाजिक और चुनावी गणित दिखाई देता है. पवन सिंह के जरिए राजपूत और सवर्ण समाज, संजय मयूख के जरिए कायस्थ और शहरी वर्ग, अनिल ठाकुर के जरिए अतिपिछड़ा समाज और सीमांचल, जबकि शीला पंडित के जरिए पिछड़ा वर्ग और महिला प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश दिखाई देती है.

विधान परिषद चुनाव को भाजपा केवल सदन की सीटों का चुनाव नहीं मान रही है. विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी सामाजिक समीकरण साधने, विभिन्न जातीय समूहों को प्रतिनिधित्व देने और गठबंधन के भीतर राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है.

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