- बिहार की की वित्तीय व्यवस्था केंद्र से आने वाले टैक्स के हिस्से और अनुदान पर बहुत अधिक निर्भर है.
- बिहार की अपनी कमाई सीमित है. हाल ही में सरकार ने नई कमाई का जरिया भी निकाला है.
- ऐसे में राज्य के खजाने पर दबाव जरूर है, पर 'खजाना खाली है' यह कहना सरासर गलत है.
बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि सरकार के पास सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए पैसे नहीं हैं और राज्य का खजाना लगभग खाली हो गया है. उन्होंने यह भी दावा किया कि विकास के काम ठप पड़े हैं. लेकिन बिहार के बजट और सरकारी वित्त के आंकड़ों की तस्वीर थोड़ी अलग और थोड़ी जटिल है. बिहार सरकार के वित्त विभाग ने बुधवार को बताया कि बिहार की अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ रही है.
तेजस्वी यादव के 'बिहार का खजाना खाली है', ऐसा कहने के लिए फिलहाल सार्वजनिक वित्तीय आंकड़ों से पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता. पर सच यह भी है कि बिहार की अपनी कमाई उसके बड़े बजट की तुलना में काफी कम है और राज्य केंद्र से मिलने वाले पैसे पर बहुत अधिक निर्भर है.
बिहार आर्थिक सर्वेक्षण राज्य की प्रगति, विकास योजनाओं एवं आर्थिक मजबूती का प्रतिबिंब है।
— Finance Department, Govt. of Bihar (@BiharFinance) August 12, 2026
कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग एवं आधारभूत संरचना के क्षेत्र में बिहार निरंतर आगे बढ़ रहा है।#BiharEconomicSurvey #DevelopingBihar #Growth #Bihar pic.twitter.com/545nFHv7sz
बिहार की अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है?
आंकड़े बताते हैं कि बिहार की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में तेज गति से बढ़ी है.
संसदीय कामकाज का अध्ययन करने वाली संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने बिहार के बजट 2026-27 का विश्लेषण किया. इसके मुताबिक 2024-25 में बिहार का सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी स्थिर कीमतों पर 8.6 फीसद बढ़ा. मौजूदा कीमतों पर राज्य की अर्थव्यवस्था करीब 9.92 लाख करोड़ रुपये की थी. वहीं 2026-27 में बिहार ने जीएसडीपी करीब 13.09 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया है, यानी मौजूदा कीमतों पर इसमें करीब 15 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है.
लेकिन एक बड़ी समस्या बनी हुई है, जो ये है कि बिहार में प्रति व्यक्ति जीडीपी पूरे देश के मुकाबले बहुत कम है. 2024-25 में बिहार की प्रति व्यक्ति जीएसडीपी करीब 76,490 रुपये थी, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 2.35 लाख रुपये थी. बेशक, अर्थव्यवस्था बढ़ रही है पर प्रति व्यक्ति समृद्धि अभी भी बहुत पीछे है.
माननीय मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी जी की अध्यक्षता में बिहार कैबिनेट की बैठक में कुल 11 एजेंडों पर लगी मुहर। बैठक के बाद मीडियाकर्मियों को विस्तृत जानकारी देते मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग के सचिव मोहम्मद सोहैल।@samrat4bjp@BiharCabinet#BiharCabinetSecretariatDept pic.twitter.com/Qenb5Ee1Ym
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बिहार की अर्थव्यवस्था कमाई कहां से करती है?
राज्य की अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. 2024-25 में सेवा क्षेत्र का योगदान करीब 54 फीसद, उद्योग का करीब 23 फीसद और कृषि का करीब 23 फीसद था.
लेकिन सरकार की कमाई और राज्य की अर्थव्यवस्था एक ही चीज नहीं हैं. सरकार की कमाई मुख्य तौर पर करों, गैर-कर राजस्व और केंद्र से मिलने वाले हिस्से तथा अनुदानों से होती है. यहीं बिहार की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है.
माननीय मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में बिहार कैबिनेट की बैठक हुई। बैठक में कुल 10 एजेंडों पर मुहर लगाई गई।
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Samrat Choudhary
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बिहार सरकार के पास पैसा आता कहां से है?
2026-27 के बजट में बिहार की कुल राजस्व प्राप्तियां करीब 2.85 लाख करोड़ रुपये अनुमानित हैं.
इसमें राज्य खुद सिर्फ करीब 75,203 करोड़ रुपये जुटाने वाला है. बाकी करीब 2.10 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 74 फीसद केंद्र से आने हैं.
यानी हर 100 रुपये की राजस्व प्राप्ति में बिहार सरकार के अपने स्रोतों से करीब 26 रुपये और केंद्र से करीब 74 रुपये आते हैं.
केंद्र से मिलने वाला पैसा
2026-27 में बिहार को केंद्र के करों में अपने हिस्से के तौर पर करीब 1,58,178 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है.
इसके अलावा केंद्र से अनुदान के रूप में करीब 51,896 करोड़ रुपये का अनुमान लगाया गया है.
इसका मतलब बिहार की वित्तीय व्यवस्था में केंद्र सरकार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है.
यह निर्भरता इतनी अधिक है कि करों के हिस्से या अनुदान के पैसों के हस्तांतरण में देरी होने से बिहार पर नकदी का दबाव जल्दी दिखाई दे सकता है.
बिहार आर्थिक सर्वेक्षण राज्य की प्रगति, विकास योजनाओं एवं आर्थिक मजबूती का प्रतिबिंब है।
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फिर बिहार खुद कितना कमाता है?
साल 2026-27 में करों से बिहार की आय का अनुमान करीब 65,800 करोड़ रुपये अनुमानित है. इसके अलावा गैर-कर राजस्व से करीब 9,403 करोड़ रुपये आने का अनुमान है. यानी राज्य अपने संसाधनों से करीब 75,203 करोड़ रुपये कमाने की उम्मीद रखता है.
अब सवाल है कि यह पैसा आता कहां से है?
राज्य में जीएसटी कर से आय का सबसे बड़ा स्रोत है. 2026-27 में इससे करीब 38,000 करोड़ रुपये की कमाई होने की उम्मीद है. राज्य की खुद की कमाई में इसका हिस्सा करीब 59 फीसद होता है.
इसके बाद सेल टैक्स और वैट का नंबर आता है. पेट्रोल, डीजल और कुछ अन्य वस्तुओं पर राज्य के अधिकार क्षेत्र में आने वाले टैक्स भी होते हैं. इससे 2026-27 में 10,775 करोड़ रुपये आना अनुमानित है.
स्टांप शुल्क और जमीन की रजिस्ट्री से इस दौरान 10,000 करोड़ रुपये आने का अनुमान है.
इसके बाद नए वाहनों के रजिस्ट्रेशन पर मिलने वाले टैक्स में राज्य का हिस्सा और रोड टैक्स से आने वाली रकम आती है. इससे करीब 5000 करोड़ रुपये आने का अनुमान है.

इलेक्ट्रिसिटी पर टैक्स, शुल्क और कंपनियों के मुनाफे से होने वाली आय करीब 950 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. बता दें कि देश में इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रिब्यूशन का लगभग 93% हिस्सा राज्य सरकारों के स्वामित्व वाली कंपनियों (डिस्कॉम) के पास है. बिजली के उपभोक्ताओं के बिजली बिलों से होने वाली आय सीधे राज्यों के पास जाती है. हालांकि अधिकांश राज्य डिस्कॉम घाटे में चलते हैं और उन्हें भारी सब्सिडी चुकानी पड़ती है. लेकिन राज्य सरकारें बिजली की खपत या बिक्री पर इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी और सेस वसूलती हैं, जो सीधे राज्य के खजाने में जाता है. दूसरी ओर एनटीपीसी और पावरग्रिड जैसे केंद्र सरकार के उपक्रमों से मिलने वाले डेविडेंड और कॉरपोरेट टैक्स केंद्र सरकार के हिस्से में जाता है.
संविधान की 7वीं अनुसूचि के तहत आने वाले भू-राजस्व यानी लैंड रेवेन्यू पूरी तरह राज्य के खजाने में जाता है और इससे वित्त वर्ष 2026-27 में 800 करोड़ रुपये के कमाई का अनुमान है.
कुल मिलाकर बिहार की सालाना कमाई में जीएसटी, वैट, जमीन की रजिस्ट्री और व्हिकल रजिस्ट्रेशन टैक्स सबसे बड़े स्रोत हैं
बिहार पर कितना कर्ज, क्या वेतन देने के लिए पैसा नहीं है?
राज्य की कमाई का एक बड़ा हिस्सा बकाया चुकाने में खर्च हो जाता है. 2024-25 के अंत में बिहार पर बकाया देनदारियां करीब 3.74 लाख करोड़ रुपये थीं.
इसे बिहार के राजकोषीय घाटे से जोड़ कर देखें तो यह और बड़ा हो जाता है. 2025-26 के संशोधित अनुमानों में बिहार का राजकोषीय घाटा करीब 11.8 फीसद दर्शाया गया है जबकि इसके 3 फीसद रहने की अनुमान जताया गया था. यह बहुत बड़ा अंतर है और 2026-27 में इसे फिर तीन फीसद या 39,112 करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है.
क्या सरकारी कर्मचारियों का वेतन देने के लिए पैसा नहीं है?
ऐसे में तेजस्वी यादव के आरोपों को प्रमाणित करने के लिए बिहार सरकार के नकद की ताजा स्थिति, विभिन्न विभागों में लंबित वेतन और भुगतान से जुड़े आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत होगी. मौजूद बजट डॉक्युमेंट ये बताते हैं कि वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान बिहार सरकार के बड़े खर्चों में शामिल हैं.
2026-27 के बजट में शिक्षा विभाग से जुड़े खर्च करीब 41853 करोड़ रुपये, पेंशन में करीब 35170 करोड़ रुपये और ब्याज भुगतान में करीब 25364 करोड़ रुपये अनुमानित है. इसका मतलब यह है भी है कि ये खर्च रोक नहीं सकती.
अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार ठेकेदारों के वेलफेयर एसोसिएशन और विपक्षी दलों ने करीब 50000 करोड़ रुपये के ठेकेदार बकाये को लेकर चिंता जताई है.
सरकार ने इस आलोचना को खारिज करते हुए स्थिति को अस्थायी बताया और कहा कि केंद्रीय कर हस्तांतरण मिलने के बाद स्थिति सुधरेगी.
इसलिए बकाया होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि सरकार का खजाना पूरी तरह खाली है.

बिहार ने नए टैक्स से नई कमाई का जरिया निकाला
इस बीच राज्य सरकार ने अपने विभागों और स्थानीय निकायों की कमाई बढ़ाने पर जोर देते हुए ग्राम पंचायतों को ग्रामीण इलाकों में होल्डिंग टैक्स और अन्य शुल्क से जुड़े ग्राम पंचायत टैक्स, रेट्स और फीस रूल्स 2026 को मंजूरी दे दी है.
इसके तहत कच्चे मकान पर कर नहीं लगेगा पर अध-पक्के मकान पर सालाना 50 रुपये तो पक्के मकान पर 100 रुपये वसूले जाएंगे.
वहीं पीएम आवास योजना के मकानों पर भी सालाना 25 रुपये लिए जाएंगे. इसके अलावा पेट्रोल पंप, एलपीजी एजेंसी, ईंट भट्ठे और सिनेमा हॉल पर सालाना 5000 रुपये तक शुल्क लगाया जा सकेगा. तो कारोबार, विज्ञापन, हाट, होर्डिंग और ग्रामीण कुटीर उद्योगों पर भी शुल्क लगाया जा सकता है.
सरकार का लक्ष्य ग्रामीण करों से करीब 1300 करोड़ रुपये जुटाना है.
हालांकि यह पैसा सीधे राज्य सरकार के खजाने में नहीं जाएगा. यह ग्राम पंचायतों के पास रहेगा और स्थानीय सड़क, नाली, सफाई और पीने के पानी जैसे कार्यों पर खर्च किया जाएगा.

बिहार सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपये की कमाई का लक्ष्य रखा
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक राज्य सरकार 2028 तक अपनी सालाना आंतरिक आय को करीब 1 लाख करोड़ रुपये तक ले जाने का लक्ष्य बना रही है. इसका मतलब सरकार समझ रही है कि लंबे समय तक केवल केंद्र से मिलने वाले पैसे पर निर्भर रहना जोखिम भरा है. ऐसे में राज्य को अपनी कर क्षमता को बढ़ाना होगा.
लेकिन बिहार की आर्थिक समस्या की जड़ में उसका होने वाला खर्च है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, सिंचाई, ग्रामीण विकास, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और वेतन जैसे खर्च लगातार बढ़ रहे हैं.
2026-27 में बिहार का राजस्व खर्च करीब 2.84 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है. राजस्व खर्च वह खर्च है जो सरकार को रोजमर्रा के संचालन और सेवाओं के लिए करना पड़ता है.
पूंजीगत खर्च से सड़क, पुल, सिंचाई, भवन जैसी परिसंपत्तियां बनाई जाती हैं.
यानी सरकार के सामने चुनौती यह है कि रोजमर्रा के खर्च पूरे करने के बाद विकास के लिए पर्याप्त पैसा बचा रहे.

बिहार की असली आर्थिक समस्या को समझें
अगर बिहार के अर्थव्यवस्था के समूचे आंकड़ों को एक साथ रखें तो राज्य की आर्थिक स्थिति ऐसी बनती है.
अर्थव्यवस्था बढ़ रही है लेकिन प्रति व्यक्ति सकल उत्पाद अन्य राज्यों और राष्ट्रीय औसत के मुकाबले बहुत कम है. राज्य की अपनी आय सीमित है, तो करीब 74 फीसद राजस्व प्राप्तियां केंद्र से आने वाले टैक्स के हिस्से और अनुदानों पर निर्भर है. साथ ही कर्ज का बोझ व्यापक और लगातार बढ़ता हुआ है.
हालांकि इन सब के बावजूद उपलब्ध आंकड़े तेजस्वी यादव के 'बिहार का खजाना खाली है' के दावे को साबित नहीं करते पर यह पूरी तरह से काल्पनिक भी नहीं है.
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