- बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव बीजेपी के लिए केवल एक सीट नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है
- लगभग पचास विधायकों को चुनाव अभियान में शामिल किया गया है, जो वार्ड और शक्ति केंद्रों की निगरानी कर रहे हैं
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बीजेपी के चुनावी अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई है, जिससे संगठन की ताकत बढ़ी है
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव बीजेपी के लिए सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है. राजधानी पटना की इस सीट को हर हाल में अपने कब्जे में बनाए रखने के लिए पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है. इस सीट से जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर भी चुनाव मैदान में हैं. वैसे तो ये सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है, लेकिन प्रशांत किशोर के चुनाव मैदान में आने के बाद बीजेपी ने इस चुनाव को और गंभीरता से लेना शुरू कर दिया. पार्टी की रणनीति बूथ से लेकर मोहल्ले तक फैली हुई है. संगठन, जनप्रतिनिधि और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मिलकर चुनावी मोर्चा संभाल रहे हैं.
60 शक्ति केंद्रों में बांट दी विधानसभा
बीजेपी ने पूरे विधानसभा क्षेत्र को करीब 60 शक्ति केंद्रों में बांट दिया है. हर शक्ति केंद्र की जिम्मेदारी अलग-अलग नेताओं और अनुभवी कार्यकर्ताओं को दी गई है. इनका काम केवल प्रचार करना नहीं, बल्कि हर बूथ की निगरानी करना, मतदाताओं से लगातार संपर्क बनाए रखना, घर-घर पहुंचना और मतदान के दिन अधिक से अधिक समर्थकों को बूथ तक लाना भी है. पार्टी की कोशिश है कि चुनाव तक हर परिवार से कई बार संपर्क हो और कोई भी समर्थक मतदान से वंचित न रहे.
50 विधायकों को दी गई जिम्मेदारी
चुनाव अभियान को मजबूत बनाने के लिए बीजेपी ने करीब 50 विधायकों को भी चुनाव मैदान में उतार दिया है. सभी विधायकों को अलग-अलग वार्डों और शक्ति केंद्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई है. उन्हें स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करने, चुनावी तैयारियों की समीक्षा करने, बूथ प्रबंधन को मजबूत बनाने और रोजाना पार्टी नेतृत्व को फीडबैक देने की जिम्मेदारी दी गई है. इसके अलावा सांसद, विधान परिषद सदस्य, पूर्व विधायक और वरिष्ठ संगठन पदाधिकारी भी अलग-अलग इलाकों में सक्रिय हैं.
हर दिन का लिया जा रहा फीडबैक
बीजेपी ने इस चुनाव को पूरी तरह संगठन के भरोसे लड़ने की रणनीति बनाई है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी खुद पूरे चुनाव अभियान पर नजर रखे हुए हैं. प्रदेश संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी, मंत्री, सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य लगातार बांकीपुर में कैंप कर रहे हैं. पार्टी ने अलग-अलग नेताओं को वार्ड और शक्ति केंद्र के हिसाब से जिम्मेदारी सौंपी है. हर दिन चुनावी तैयारियों की समीक्षा की जा रही है और बूथ स्तर तक फीडबैक लिया जा रहा है. जरूरत के अनुसार प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के वरिष्ठ नेताओं की सभाएं भी कराई जा रही हैं. पार्टी का पूरा फोकस संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय रखने और अधिक से अधिक मतदान सुनिश्चित करने पर है.
सामाजिक समीकरणों पर भी जोर
बीजेपी की रणनीति का सबसे अहम हिस्सा सामाजिक समीकरण है. पार्टी ने पूरे विधानसभा क्षेत्र के हर मोहल्ले का अलग-अलग अध्ययन कराया है. किस इलाके में किस समाज के मतदाता अधिक हैं, उसके आधार पर नेताओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय की गई है. जहां वैश्य मतदाता अधिक हैं, वहां उसी समाज के नेताओं को लगाया गया है. जहां भूमिहार मतदाता प्रभावी हैं, वहां उस समाज के नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है. इसी तरह कायस्थ, ब्राह्मण, पिछड़ा, अति पिछड़ा, दलित और अन्य समाजों के बीच भी उसी वर्ग के प्रभावशाली नेताओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं को लगाया गया है. बीजेपी का मानना है कि स्थानीय स्तर पर सीधे संवाद से मतदाताओं तक पहुंच ज्यादा प्रभावी होती है. पार्टी ने महिला मोर्चा, युवा मोर्चा, किसान मोर्चा, अनुसूचित जाति मोर्चा, पिछड़ा मोर्चा और अल्पसंख्यक मोर्चा समेत अपने सभी संगठनात्मक मोर्चों को भी सक्रिय कर दिया है. घर-घर संपर्क अभियान, छोटी बैठकें, नुक्कड़ सभाएं और सोशल मीडिया के जरिए लगातार प्रचार किया जा रहा है. पहली बार मतदान करने वाले युवाओं, महिलाओं और नए मतदाताओं तक पहुंचने के लिए अलग-अलग टीमें बनाई गई हैं. चुनाव के दिन बूथ प्रबंधन के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है ताकि समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में कोई परेशानी न हो.
आरएसएस का भी मिल रहा साथ
बीजेपी के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपनी संगठनात्मक ताकत मैदान में उतार दी है. संघ के स्वयंसेवक और उससे जुड़े विभिन्न संगठन कई दिनों से क्षेत्र में सक्रिय हैं. बूथ स्तर पर मतदाताओं से संपर्क, घर-घर संवाद, मतदान के दिन कार्यकर्ताओं के समन्वय और संगठन को मजबूत करने का काम किया जा रहा है. बीजेपी के चुनावी प्रबंधन से जुड़े नेताओं का मानना है कि राजधानी की इस प्रतिष्ठित सीट पर संगठन और संघ का संयुक्त नेटवर्क पार्टी की सबसे बड़ी ताकत है.
बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ मानी जाती है. यह सीट पहले बीजेपी के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन के पास थी. उनके राज्यसभा जाने के बाद उपचुनाव 30 जुलाई को होने जा रहा है. ऐसे में इस सीट को बचाना बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है. बीजेपी ने यहां से एक आम कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया है. दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव मैदान में उतरकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस उपचुनाव का असर केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल पर भी इसका असर दिखाई देगा. यही वजह है कि बीजेपी ने संगठन की पूरी ताकत झोंक दी है, जबकि विपक्ष भी इस सीट को बीजेपी के गढ़ में बड़ी चुनौती के रूप में पेश कर रहा है.
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