बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अब केवल एक सीट की जंग नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति का सबसे चर्चित और रणनीतिक मुकाबला बन चुका है. नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब कुल 26 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं. हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि नाम वापसी की अंतिम तारीख के बाद यह तस्वीर काफी हद तक बदल सकती है.
भाजपा-जन सुराज में दलबदल की जंग
चुनाव के ठीक पहले जन सुराज को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है. पार्टी के कद्दावर नेता बिट्टू सिंह और आर.के. सिन्हा का भाजपा में शामिल होना क्षेत्र की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर गया है. ये दोनों नेता लंबे समय से बांकीपुर में जन सुराज को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में जुटे थे. भाजपा इसे अपनी एक बड़ी सफलता के रूप में पेश कर रही है, वहीं जानकार इसे कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर डालने वाली घटना मान रहे हैं. भाजपा अपनी साख बचाने की कोशिश में है, क्योंकि यह सीट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई है.
प्रशांत किशोर की प्रतिष्ठा और गठबंधन का दबाव
दूसरी तरफ, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव अपनी राजनीतिक ताकत साबित करने की पहली बड़ी अग्निपरीक्षा है. अगर जन सुराज यहाँ अच्छा प्रदर्शन करता है, तो राज्य की राजनीति में उनकी पार्टी एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरेगी. वहीं, महागठबंधन की कोशिश है कि भाजपा विरोधी वोटों को बिखरने से रोका जाए ताकि जीत का रास्ता आसान हो सके.
छोटे उम्मीदवारों की भूमिका और बदलता गणित
चुनाव विश्लेषकों के अनुसार, फिलहाल मैदान में डटे 26 उम्मीदवारों में से कई ऐसे हैं जो वोटों का गणित बिगाड़ सकते हैं. भाजपा और जन सुराज दोनों ही स्थानीय नेताओं और प्रभावशाली निर्दलीयों को अपने पाले में लाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं. नाम वापसी की आखिरी तारीख के बाद यह साफ होगा कि मुकाबला सीधा होगा या त्रिकोणीय.
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