बांकीपुर सीट पर होने वाला उपचुनाव बिहार की सियासत में फिलहाल हॉट स्पॉट बन गया है . ये सीट भाजपा का अभेद किला माना जाती हैं. पिछले 20 सालों से नितिन नबीन इस सीट से विधायक रहे हैं. उसके पहले उनके पिता स्वर्गीय नवीन किशोर सिन्हा इस सीट पर 3 बार विधायक रहे हैं, पिछले लगभग 40 सालों से इस सीट पर बीजेपी का कब्ज़ा रहा है . नितिन नबीन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट ख़ाली हुई है और इस सीट पर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने चुनाव लड़ने का ऐलान करके भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. इस सीट पर आने वाले 30 जुलाई को उपचुनाव होने जा रह है .
जन सुराज इस चुनाव में एंटी इनकंबेंसी का फ़ायदा उठा सकती हैं
पिछले 40 सालों से यह सीट एक पार्टी और एक परिवार के पास है, जिसका पूरा फ़ायदा जन सुराज और प्रशांत किशोर इस उपचुनाव में उठाने की कोशिश कर रहे हैं. वो इसे एंटी इनकंबेंसी बोल रहे हैं. इतने सालों से एक पार्टी के पास यह सीट रहना किसी भी पार्टी के शाख़ की लड़ाई बन जाती है. और इसी लड़ाई का फायदा प्रशांत किशोर उठा सकते हैं. जिस तरह से इस सीट पर कई लोगों में बीजेपी को लेकर नाराज़गी भी देखने को मिली है. प्रशांत किशोर को पता है कि यह सही वक़्त है. उनका मानना है कि यह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट है, इसके साथ पटना शहर के केंद्र की सीट भी है. इसके साथ ही सम्राट सरकार के सामने यह पहली चुनाव होगी, और अगर इस सीट पर बीजेपी को हरा दिया गया तो पूरे देश में इसका बढ़ा प्रभाव आने वाली राजनीति पर पड़ेगा.
प्रशांत किशोर जलजमाव, ट्रैफिक जाम, कचरा प्रबंधन और टूटी नागरिक सुविधाओं को बड़ा मुद्दा बना रहे हैं. उनका कहना है कि दशकों तक एक ही दल को जिताने के बाद भी पटना की जनता बुनियादी शहरी समस्याओं से जूझ रही है. यह सीधे तौर पर उन मिडिल-क्लास वोटर्स को प्रभावित कर रहा है जो बीजेपी के पारंपरिक समर्थक रहे हैं लेकिन स्थानीय व्यवस्था से नाराज
BJP के उम्मीदवार का बदलना और पार्टी के अंदर गुटबाजी का फायदा
बीजेपी ने इस सीट से पहले अभिषेक कुमार 'बंटी' को टिकट दिया, लेकिन पारिवारिक कारणों से उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया था. सूत्र बताते हैं कि उम्मीदवार को लेकर पार्टी के अंदर भी खींचतान की वजह से उन्होंने नाम वापस ले लिया था. बाद में पार्टी को नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारना पड़ा. हालांकि पार्टी नेताओं का यह भी मानना हैं किबीजेपी के इस आंतरिक कलह और उम्मीदवार बदलने के फैसले ने पार्टी के पारंपरिक कैडर में थोड़ी असंतुष्टि पैदा की है, जिसे जन सुराज अपने पाले में करने की कोशिश कर रहा है.
मुस्लिमों वोटरों को राजद से हटकर जन सुराज के तरफ़ शिफ्ट होना
इस बांकीपुर उपचुनाव में मुस्लमान वोटरी की संख्या भी बड़ी है, जिसपर प्रशांत किशोर की नज़र हैं, आम तौर पर ये वोटर्स पहले कांग्रेस को वोट करते थे , लेकिन 2025 के विधान सभा चुनाव में यह सीट राजद को चली गईं. जिसके बाद पार्टी ने रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया था, और फिर से पार्टी ने रेखा गुप्ता को मौका दिया है , जो कि वैश्य सामाज से आता हैं. बांकीपुर सीट वैश्य बहुल्य सीट हैं, ऐसे में पीके को मुस्लिमों के बड़े समझ का समर्थन इस चुनाव में मिलना जा रहा है, क्योंकि यही वोटर राजद से नाराज़ माने जा रहे हैं और यह भी एक परिवर्तन अपने क्षेत्र में प्रशांत किशोर के रुप में चाहते हैं.पीके के चुनाव लड़ने के फैसले ने इस चुनाव को बीजेपी बनाम जन सुराज बना दिया है.
प्रभावशाली उम्मीदवार नहीं मिल पाना, बन गई चुनौती
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर बीजेपी को प्रभावशाली उम्मीदवार नहीं मिल पाना यह बताता है कि उम्मीदवार के चयन में बीजेपी के अंदर चुनौती को खड़ा कर दिया हैं. हालांकि एक तरफ पार्टी का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी में कार्यकर्ता को टिकट मिलना यह हमारी पार्टी में दिखता है कि बीजेपी का एक कार्यकर्ता भी नेता बन सकता है लेकिन वहीं जन सुराज और प्रशांत किशोर कह रहे हैं कि उनके डर से बीजेपी ने अपना पहला उम्मीदवार बदल दिया . इसको अलावा राजद की के पास भी प्रशांत किशोर के बराबर के उम्मीदवार का नहीं हो पाना बताया हैं कि उनके पास भी चेहरे की चुनौती हैं.इस चुनाव में पीके सबसे बड़े चेहरे हैं. हालांकि की पीके को रोकने के लिए बीजेपी ने 40 स्टार प्रचारकों की लिस्ट जारी कर दी हैं. जिसमें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और पार्टी पार्टी के तमाम मंत्री सांसद को भी जगह दिया गया हैं.
युवाओं और शिक्षित वर्ग को लामबंद करना
प्रशांत किशोर अपनी उच्च शैक्षणिक पृष्ठभूमि (लखनऊ यूनिवर्सिटी और जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी से जुड़ाव) और एक प्रोफेशनल की छवि के दम पर युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं. बांकीपुर में बड़ी संख्या में छात्र और नौकरीपेशा लोग रहते हैं, जो पारंपरिक 'जातिवादी राजनीति' से हटकर कुछ नया चाहते हैं. जन सुराज का शिक्षा और रोजगार केंद्रित नैरेटिव सीधे तौर पर सरकार की नीतियों से नाराज युवाओं को जोड़ रहा है.
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