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प्रशांत किशोर को महागठबंधन में आने की सलाह, लेकिन बहुत कठिन है ये राह

प्रशांत किशोर को भाकपा (माले) महागठबंधन में शामिल होने की सलाह दी है. हालांकि उनकी अब तक की राजनीति और विपक्षी दलों के समीकरण इसमें कुछ और ही बता रहे हैं. 

प्रशांत किशोर को महागठबंधन में आने की सलाह, लेकिन बहुत कठिन है ये राह
बिहार में प्रशात किशोर को लेकर अब नई चर्चा शुरू हो गई है.

बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नई चर्चा जोर पकड़ रही है. बांकीपुर उपचुनाव के बाद भाकपा (माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने खुलकर प्रशांत किशोर को महागठबंधन में शामिल होने का न्योता दिया है. उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि क्या आने वाले समय में बिहार में विपक्ष का कोई नया और बड़ा गठबंधन आकार ले सकता है.

सबसे बड़ी चुनौती खुद प्रशांत किशोर का रुख

हालांकि महागठबंधन में शामिल होने का फैसला प्रशांत किशोर के लिए आसान नहीं होगा. वे लगातार खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग बताते रहे हैं. उन्होंने कई मौकों पर राजद, जदयू और भाजपा तीनों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं. उनकी राजनीति का आधार ही व्यवस्था में बदलाव और नए विकल्प की बात रही है. ऐसे में उन्हीं दलों के साथ जाना, जिनकी वे आलोचना करते रहे हैं, उनके लिए राजनीतिक रूप से कठिन फैसला साबित हो सकता है.

नेतृत्व का सवाल भी आसान नहीं

यदि भविष्य में विपक्षी एकता की कोई कोशिश होती है तो सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व का होगा. फिलहाल महागठबंधन में तेजस्वी यादव सबसे बड़े चेहरे के रूप में देखे जाते हैं. दूसरी तरफ प्रशांत किशोर भी खुद को बिहार के लिए एक वैकल्पिक नेतृत्व के तौर पर पेश कर रहे हैं. ऐसे में दोनों नेताओं के बीच भूमिका और नेतृत्व को लेकर सहमति बनाना आसान नहीं होगा.

साथ आए तो विपक्ष को मिल सकता है फायदा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कभी प्रशांत किशोर और महागठबंधन एक मंच पर आते हैं तो विपक्ष को बड़ा लाभ मिल सकता है. एक ओर राजद का पारंपरिक सामाजिक आधार है तो दूसरी ओर प्रशांत किशोर युवाओं, शिक्षित वर्ग और बदलाव की उम्मीद रखने वाले मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. इन दोनों ताकतों का मेल चुनावी समीकरण को बदल सकता है.

भाजपा के गढ़ में जीत के बाद बढ़ी अहमियत

प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने अपने शुरुआती चुनावी प्रयास में भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्र में प्रभावशाली प्रदर्शन कर राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है. इस सफलता के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि प्रशांत किशोर अब बिहार की राजनीति में एक गंभीर राजनीतिक ताकत बनकर उभरे हैं. यही कारण है कि विपक्षी दल भी अब उन्हें नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं.

विपक्ष क्यों चाहता है एकजुटता?

बिहार में भाजपा और एनडीए का संगठन लंबे समय से मजबूत माना जाता है. कई चुनावों में विपक्षी वोट अलग-अलग दलों में बंटने से भाजपा को फायदा मिला है. ऐसे में विपक्ष के कुछ नेताओं का मानना है कि अगर भाजपा विरोधी दल एक मंच पर आएं तो मुकाबला और अधिक मजबूत हो सकता है. इसी सोच के तहत प्रशांत किशोर को साथ लाने की चर्चा तेज हुई है.

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