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EV Cars: इस एक वजह से कबाड़ बन सकती है आपकी इलेक्ट्रिक कार, नई रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

नई रिपोर्ट के मुताबिक होम चार्जिंग की कमी और असुरक्षित वायरिंग के कारण भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) की रफ्तार धीमी हो रही है.

EV Cars: इस एक वजह से कबाड़ बन सकती है आपकी इलेक्ट्रिक कार, नई रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा
भारत में अचानक क्यों थमने लगी EVs की रफ्तार?
Photo Credit: Unsplash

भारत में EV का क्रेज बहुत तेजी से बढ़ा है, लेकिन अब इस रफ्तार पर ब्रेक लगता नजर आ रहा है. AEEE और Kazam की एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में EV की ग्रोथ धीमी होने की सबसे बड़ी वजह पब्लिक चार्जिंग नहीं, बल्कि लोगों के घरों में सुरक्षित होम चार्जिंग सेटअप का न होना है. शहरों के अपार्टमेंट्स और सोसायटियों में रहने वाले लोग अब EV खरीदने से कतराने लगे हैं.

घर पर चार्जिंग की बड़ी चुनौती

भारत में साल 2016 में जहां सिर्फ 0.5 लाख ईवी बिकी थीं. वहीं, 2025 तक यह आंकड़ा 23 लाख के पार पहुंच गया. इनमें से 91 प्रतिशत हिस्सेदारी टू-व्हीलर्स और थ्री-व्हीलर्स की है. लेकिन रिपोर्ट बताती है कि केवल 55 प्रतिशत संभावित EV खरीदारों के पास ही घर पर चार्जिंग की सुविधा है. बाकी बचे लोगों को या तो जुगाड़ का सहारा लेना पड़ता है या फिर भारी-भरकम बिजली अपग्रेड कराने पड़ते हैं.

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कामचलाऊ जुगाड़ बढ़ा रहा है खतरा

घर पर सही चार्जिंग बोर्ड न होने के कारण लोग साधारण सॉकेट, टेंपरेरी एक्सटेंशन कोड और शेयर्ड कनेक्शन का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह शॉर्टकट रातभर गाड़ी तो चार्ज कर देता है, लेकिन यह लॉन्ग टर्म के लिए बेहद खतरनाक है. इससे न सिर्फ शॉर्ट सर्किट और आग लगने का खतरा बढ़ता है, बल्कि गाड़ी की बैटरी भी जल्दी खराब होने लगती है.

अपार्टमेंट और सोसायटियों का सिरदर्द

यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब बात मल्टी-स्टोरी अपार्टमेंट्स या किराए के घरों की आती है. मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में 60 से 80 फीसदी लोग अपार्टमेंट में रहते हैं, जहां पार्किंग और बिजली का लोड शेयर करना पड़ता है. 

काज़म (Kazam) के सीईओ अक्षय शेखर का कहना है कि चार्जर की कीमत कोई मुद्दा नहीं है, क्योंकि वह गाड़ी के साथ ही मिलता है. असली दिक्कत आरडब्ल्यूए (RWA), मकान मालिकों और बिजली विभागों से परमिशन लेने और तालमेल बिठाने में आती है.

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गिग वर्कर्स की कमाई पर सीधा असर

होम चार्जिंग की यह समस्या सिर्फ अमीरों या कार मालिकों तक सीमित नहीं है. जोमैटो, स्विगी और अन्य डिलीवरी कंपनियों में काम करने वाले गिग वर्कर्स के लिए यह रोजी-रोटी का सवाल है. एक डिलीवरी बॉय हफ्ते में 250 से 300 किलोमीटर गाड़ी चलाता है. अगर उसे रात में घर पर सुरक्षित और सस्ती चार्जिंग नहीं मिलेगी, तो उसकी रोजाना की कमाई प्रभावित होती है.

रिपोर्ट का दावा है कि करीब 45 प्रतिशत भारतीय घरों को सुरक्षित EV चार्जिंग के लिए इलेक्ट्रिकल अपग्रेड की जरूरत है.
 

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