अगर आप भी अपने लिए एक शानदार कार खरीदने का सपना देख रहे हैं और बजट कम पड़ने पर बैंक या NBFC से कार लोन लेने की सोच रहे हैं, तो आप अकेले नहीं हैं. आजकल लोग सिर्फ नई कार खरीदने के लिए ही कर्ज नहीं ले रहे हैं, बल्कि पुरानी यानी सेकंड हैंड कारों को फाइनेंस कराने के लिए लोन कंपनियों के चक्कर काट रहे हैं. आइए जानते हैं कि भारतीय ऑटो लोन मार्केट में अचानक यह बड़ा बदलाव क्यों आया है?
लोन मार्केट में आया जबरदस्त उछाल
RBI के डेटाबेस के मुताबिक, शेड्यूल कमर्शियल बैंकों द्वारा दिए गए व्हीकल लोन में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. साल 2019 में जहां कुल व्हीकल लोन 2.85 लाख करोड़ रुपये था, वह साल 2026 तक बढ़कर 7.39 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है. अगर ग्रोथ रेट की बात करें, तो अप्रैल 2025 में व्हीकल लोन की ग्रोथ 8.8 प्रतिशत थी, जो मार्च 2026 में बढ़कर 18.6 प्रतिशत हो गई. इसके मुकाबले होम लोन की रफ्तार काफी धीमी रही और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (टीवी, फ्रिज आदि) का ग्राफ तो माइनस में चला गया है.
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सेकंड हैंड कारें हो गईं 'प्रीमियम'
आखिर लोग पुरानी कार खरीदने के लिए इतना लोन क्यों ले रहे हैं? इसका जवाब है Used Car मार्केट का प्रीमियम होना. दरअसल, आजकल लोग अपनी गाड़ियों को बहुत जल्दी बेच रहे हैं, जिससे मार्केट में बहुत कम चली हुई और बिल्कुल नई जैसी दिखने वाली गाड़ियां आ रही हैं. इंडियन ब्लू बुक के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में बिकने वाली पुरानी कारें औसतन 70,000 किलोमीटर चली होती थीं, जो 2025 में घटकर सिर्फ 54,000 किलोमीटर रह गईं. कम चली होने के कारण इनकी एवरेज सेलिंग प्राइस भी 4 लाख रुपये (FY21) से बढ़कर 5.45 लाख रुपये (FY25) हो गई है.
लोन कंपनियों की चांदी
पुरानी गाड़ियों की बढ़ी हुई कीमतों के कारण ही अब लोग लोन का सहारा ले रहे हैं. साल 2021 में सिर्फ 13 प्रतिशत लोग ही पुरानी कार खरीदने के लिए लोन लेते थे, लेकिन 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 32 प्रतिशत हो गया है. क्रिसिल रेटिंग्स (Crisil Ratings) के मुताबिक, मार्च 2027 तक नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) का व्हीकल लोन पोर्टफोलियो करीब 11 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा. कंपनियों के लिए नई कारों के मुकाबले पुरानी कारों को फाइनेंस करना ज्यादा फायदेमंद और सुरक्षित सौदा साबित हो रहा है.
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भारतीय ब्लू बुक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का प्री-ओन्ड (Pre-owned) कार मार्केट साल 2025 में 59 लाख यूनिट्स तक पहुंच गया था, जिसके 2030 तक सालाना 10 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़कर 95 लाख यूनिट्स होने का अनुमान है. साल 2030 तक देश में यह स्थिति होगी कि बिकने वाली हर 10 नई कारों के मुकाबले 19 पुरानी कारें बिकेंगी.
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