वैसे चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है. इस मामले में आज हालत फिर भी बहुत कुछ काबू में हैं. वर्ना तीन दशक पहले तो लगने लगा था कि अपनी लोकतांत्रिक सरकारें सांप्रदायिक हिंसा और दबंगई से ही बना करेंगी. बहरहाल इस बात में कोई शक नहीं कि इस बार चुनाव के पहले तीन चरणों में हिंसा की व्याधि ज्यादा नहीं दिखी थी. चौथे चरण के मतदान के फौरन बाद छिटपुट हिंसा की खबरों ने उफान मारने की कोशिश की लेकिन वह कोशिश भी सिरे चढ़ नहीं पाई. और आखिर चैथे दौर की वोटिंग भी निपट गई.
सनसनी पैदा नहीं हो पाई
चौथे दौर के मतदान शुरू होने के फौरन बाद ही यानी कोई दो घंटे बाद ही आसनसोल से खबरें आईं कि वहां एक मतदान केंद्र पर गरमागरमी हो गई है. कुछ टीवी चैनलों पर गरमागरमी के फुटेज दिखाए जरूर गए लेकिन इस फुटेज में ऐसे दृश्य उपलब्ध नहीं थे जो दूसरी जगहों पर भी उत्तेजना पैदा कर सकें. बात टीवी पर बहसों में ही सिमट गई. कुल मिलाकर हिंसा या दबंगई का तूफान बनता दिखाया नहीं जा सका. वैसे भी यह बात ज्यादा सनसनीखेज इसलिए नहीं बन सकती थी क्योंकि चुनाव के ऐलान के पहले से ही पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था का मुद्दा बनाने की हर संभव कोशिश हो रही थी. किसी भी सनसनी के लिए अचानकत्व होना जरूरी होता है जो आसनसोल की हिंसा में नहीं था.
इस चुनाव में एक नएपन पर ग़ौर
चुनाव में हिंसा सिर्फ एक प्रवृत्ति है. हिंसा के टक्कर की कई और भी कुप्रवृत्तियां हैं. घृणा और वैमनस्य किसी भी तरह से हिंसा से ओछी नहीं होतीं. देखने वाले गौर से देखेंगे तो इस चुनाव में धार्मिक घृणा का कम इस्तेमाल नहीं हुआ. भयादोहन यानी असुरक्षा का भाव पैदा करना और उसके जरिए मतदाता को थोड़ी देर के लिए अपने पक्ष में ले आना इस चुनाव में ज्यादा होता दिखा. ये हमारी मजबूरी है कि चुनावों में इन उपायों के इस्तेमाल को उजागर करने के लिए हमारे पास कोई निश्चित पाठ नहीं है. राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया में इसे उजागर करने में ज्यादा रुचि भी नहीं है. फिर भी साहित्यजगत में पाठकों को हिलाने डुलाने के लिए एक व्यवस्था जरूर उपलब्ध है जिसे रसशास्त्र कहते हैं. भारतीय साहित्य में नौ रसों की जो व्यवस्था है उसे हम मौजूदा चुनाव कथा में इस्तेमाल होते देख सकते हैं. मसलन रौद्र, भयानक, वीर, वीभत्स यानी घृणा व जुगुप्सा जैसे रस. वैसे नौ रसों में हास्य, अदभुत, श्रृंगार, शांत और करुण रस भी शामिल हैं. कोई साहित्यिक अभिरुचि का राजनीतिक विद्वान चाहे तो इस चुनाव में सभी साहित्यिक रसों के इस्तेमाल पर गौर कर सकता है और अपने पाठकों और श्रोताओं को गौर करा सकता है. वैसे पाठक चाहें तो खुद भी मौजूदा चुनाव रचना में इन रसों को महसूस कर सकते हैं, खासतौर पर भयानक और वीभत्स रस. वीभत्स रस में घृणा उपरस का इस्तेमाल कुछ ज्यादा ही गौरतलब है. इस चुनाव में अब तक कोईरस इस्तेमाल होने से अगर बचा रह गया वह शांत रस है.
करुण रस का सबसे कम इस्तेमाल
विद्वान लोग बताते हैं कि लोकतंत्र का मुख्य मकसद गरीबों, वंचितों और बेसहारा लोगों का ख़याल करना है. सभी दावा करते हैं कि राजनीति का मतलब जनता की सेवा है. इस लिहाज से देखें तो लोकतांत्रिक नेता या उसके दल में करुणा का भाव होना पहला गुण है. इस चुनाव में करुण रस ही सबसे कम दिख रहा है. इस चुनाव के कोई साल भर पहले लग रहा था कि इस बार किसान और बेरोजगार चुनावी मुद्दे होंगे. लेकिन देखते देखते चुनाव के चार दौर गुजर गए और करुणा के पात्र किसान और बेरोजगार इस चुनाव के पात्र बनने से रह ही गए.
मतदाता के लिहाज से यह चुनाव
यह बात मानने में किसी को ज्यादा दुविधा नहीं होनी चाहिए कि देश का औसत मतदाता दयनीय और करुण स्थिति में है. खासतौर पर इस समय गांव के लोगों की हालत और देश में भयावह बेरोजगारी के मद्देनज़र, क्योंकि हमारे लोकतंत्र में वे ही इस समय अधिसंख्य हैं. लेकिन इस बार के चुनाव में मुख्य मुद्दे अमूर्त गर्व, अदृश्य भय और धार्मिक आस्था बनवा दिए गए. ये सारे भाव हैं ही इतने तीव्र कि इनके असर से एक से एक बड़े विद्वान खुद को नहीं बचा पाते तो फिर बेचारे औसत मतदाता की क्या बिसात. इसीलिए तो कुछ विद्वान कहने लगे हैं कि लोकतंत्र में सबसे जरूरी है नागरिक का राजनीतिक तौर पर जागरूक होना. कम से कम इतना जागरूक होना ताकि उसे भरमाया न जा सके.
चुनाव के नतीजे बताएंगे हम कितने जागरूक हुए
यह चुनाव बहत्तर साल का लोकतांत्रिक अनुभव पा चुके देश के नागरिकों की तरफ से फैसला किए जाने का मौका है. बहुत साल बाद यह ऐसा चुनाव दिख रहा है जिसमें वोटर की मन की बात पता नहीं चल पा रही है. चुनावी सर्वेक्षण करने वाली एजंसियों की विश्वसनीयता लगभग समाप्त हो चुकी है. उधर कोई भी राजनीतिक पंडित ठोककर नहीं बता पा रहा है कि अगली सरकार कैसी होगी. बहरहाल मतदाता तो फैसला करेंगे ही, लेकिन इस चुनाव में मतगणना के बाद एक फैसला मतदाताओं पर भी आएगा कि वे कितने जागरूक हुए.
सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्त्री हैं...
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