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अंडे से बाहर आते ही इस चूजे को क्यों मिल रही है Z+ सिक्युरिटी?, सुरक्षा में तैनात 50 जवान और हाई-टेक दूरबीन!

10 साल के लंबे इंतजार के बाद अंडे से बाहर आई इस नन्ही जान को मिली है VVIP सुरक्षा...जानिए कैसे एक चिड़िया के बच्चे के लिए पूरा प्रशासन 'बॉडीगार्ड' बन गया है.

अंडे से बाहर आते ही इस चूजे को क्यों मिल रही है Z+ सिक्युरिटी?, सुरक्षा में तैनात 50 जवान और हाई-टेक दूरबीन!
कच्छ के इस नन्हे 'चूजे' को मिली Z+ सिक्योरिटी, मूवमेंट पर 24x7 निगरानी, छावनी में तब्दील हुआ कच्छ का इलाका
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Z+ Category Security for the Chick: कच्छ के तपते रेगिस्तान में एक नन्हे 'राजकुमार' की आमद हुई है, जिसकी एक मुस्कान (चहचहाहट) की खातिर 50 जांबाजों ने वहां दिन-रात का सख्त पहरा लगा दिया है. गुजरात के कच्छ में एक नन्हे मेहमान के स्वागत में ऐसी तैयारी की गई है, जैसी किसी बड़े नेता के लिए होती है. 10 साल के लंबे इंतजार के बाद जन्मे 'ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' (गोडावण) के एक चूजे की सुरक्षा के लिए 50 जवानों का पहरा लगा दिया गया है. आखिर क्यों यह चिड़िया इतनी खास है कि इसके लिए रास्ते तक बंद कर दिए गए? 

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आइए जानते हैं इस 'VVIP' चूजे की पूरी कहानी (50 People Is Monitoring A Newborn Chick)

गुजरात के कच्छ में इन दिनों एक नन्हे चूजे की चर्चा जोरों पर है. यह कोई आम चिड़िया नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे दुर्लभ प्रजातियों में से एक ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard) का बच्चा है. 26 मार्च 2026 को इसके जन्म लेते ही वन विभाग ने इसे 'राजकुमार' जैसा रुतबा दे दिया है. 10 साल बाद गुजरात की धरती पर इस पंछी का कुनबा बढ़ा है, इसलिए इसकी हिफाजत में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही.

50 जवान और 24 घंटे की हाई-टेक पहरेदारी (50 Guards and 24/7 High-Tech Surveillance)

इस नन्हे चूजे की सुरक्षा के लिए 50 से ज्यादा वनकर्मी तैनात किए गए हैं, जो तीन शिफ्टों में दिन-रात मुस्तैद रहते हैं. आसपास के इलाके को 'नो-मेंस लैंड' बना दिया गया है और आम लोगों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक है. दूरबीन और स्पॉटिंग स्कोप के जरिए वॉच टावर से हर पल की खबर रखी जा रही है. ताज्जुब की बात यह है कि इस चूजे की पल-पल की रिपोर्ट सीधे गांधीनगर और अहमदाबाद में बैठे बड़े अफसरों को भेजी जा रही है.

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दुश्मनों से बचाने के लिए 'वॉटर प्रूफ' चक्रव्यूह (Tactical Strategy to Protect from Predators)

वन विभाग ने चूजे को शिकारी जानवरों जैसे कुत्तों और लोमड़ियों से बचाने के लिए गजब का दिमाग लगाया है. इलाके के जलस्रोतों को जानबूझकर सुखा दिया गया है, ताकि कोई प्यासा जानवर वहां न आए. टूटी बाड़ ठीक कर दी गई है और गांव वालों को मवेशी चराने से भी मना किया गया है. यहां तक कि मादा गोडावण पर भी ट्रैकिंग टैग के जरिए नजर रखी जा रही है, ताकि किसी भी खतरे का आभास होते ही टीम मिनटों में वहां पहुंच सके.

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का यह बच्चा न सिर्फ वन विभाग की मेहनत का नतीजा है, बल्कि प्रकृति प्रेमियों के लिए उम्मीद की नई किरण है. 10 साल बाद आई इस खुशी को संजोने के लिए पूरा प्रशासन एक 'बॉडीगार्ड' की तरह खड़ा है, ताकि यह दुर्लभ प्रजाति एक बार फिर आसमान में ऊंची उड़ान भर सके.

(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर मिली जानकारी और वायरल पोस्ट के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)

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शालिनी सेंगर
Senior Sub Editor
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