अरब सागर की लहरों के बीच मालवण तट पर खड़ा सिंधुदुर्ग किला (Sindhudurg Fort ) छत्रपति शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Mahara) की उस सूझबूझ का सबूत है, जिसने दुश्मनों को पानी में ही मात दे दी थी. महाराष्ट्र टूरिज्म और हिन्दू जनजागृति समिति के दस्तावेजों के अनुसार, 17वीं सदी में पुर्तगालियों, अंग्रेजों और सिद्दियों से बचने के लिए इसे बनाया गया था. इस किले की सबसे बड़ी खासियत इसका मुख्य दरवाजा है, जो बाहर से किसी को नजर ही नहीं आता. समंदर के बीचों-बीच मीठे पानी के कुएं और पिघले सीसे से बनी इसकी मजबूती आज भी सबको हैरान कर देती है.
3000 मजदूर, पिघला सीसा और 42 तोपों का पहरा
इस किले को 1664-1667 के बीच सूरत की लूट के धन से तैयार किया गया था. वास्तुकार हिरोजी इंदुलकर और 100 पुर्तगाली एक्सपर्ट्स की मदद से 3000 मजदूरों ने इसे महज 3 साल में खड़ा कर दिया. NFDC के मुताबिक, 48 एकड़ में फैले इस किले की दीवारें 30 फीट ऊंची और 12 फीट चौड़ी हैं. हिन्दू जनजागृति समिति बताती है कि इसका 4 किलोमीटर लंबा परकोटा 42 बुर्जों से लैस है, जहां से तोपें हर दिशा में निशाना साध सकती थीं. नींव को मजबूत बनाने के लिए इसमें 'पिघला हुआ सीसा' और 72,576 किलो लोहा डाला गया था.
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खारे समंदर में मीठा पानी और बिना दाढ़ी वाले शिवाजी
चारों तरफ खारा समंदर होने के बाद भी किले के अंदर मीठे पानी के तीन कुएं हैं, जो मुसीबत के वक्त सैनिकों के काम आते थे. प्रवेश द्वार के पास चूने में शिवाजी महाराज के हाथों और पैरों के निशान बने हैं. यहां देश का इकलौता 'शिवाजी मंदिर' है, जहां उनकी बिना दाढ़ी वाली मूर्ति है. इसके अलावा यहां भवानी, महादेव और हनुमान जी के मंदिर भी हैं. इस किले में आज भी 20 परिवार पुश्तैनी तौर पर रहते हैं.
इतिहास के उतार-चढ़ाव और आज का एडवेंचर
सिंधुदुर्ग के पास कभी 'पद्मगढ़' नाम का एक छोटा किला था, जो अब खंडहर है. शिवाजी महाराज के बाद यह किला कई राजाओं के हाथों से गुजरा. 1765 में अंग्रेजों ने इस पर कब्जा कर इसे फोर्ट ऑगस्टस (Fort Augustus) नाम दिया और 1818 में इसकी रक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया. आज यह जगह इतिहास और रोमांच का संगम है.
सिंधुदुर्ग फोर्ट कब और कैसे पहुंचें?
इस किले का घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच का है. मानसून (जून-सितंबर) में समंदर के उफान के कारण बोटिंग पूरी तरह बंद रहती है. इस किले के सबसे नजदीकी चिपी एयरपोर्ट है जो करीब 22 KM दूर है. जबकि डाबोलिम एयरपोर्ट की दूरी करीब 130 KM है. ट्रेन से आने वालों के लिए कुडाल स्टेशन सबस नजदीक 34 KM दूर है.
बताते चलें कि मालवण NH66 के जरिए मुंबई, पुणे और कोल्हापुर से जुड़ा है. मालवण जेटी से किले तक जाने के लिए आपको 10-15 मिनट की एक रोमांचक बोट राइड करनी होगी.
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