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वैज्ञानिकों ने खोजा अजीब ग्रह, हमेशा ‘पिघला हुआ’ रहता है, तापमान 1900°C, सड़े अंडों जैसी आती है बदबू!

वैज्ञानिकों ने 35 प्रकाश वर्ष दूर एक नए तरह के ‘लिक्विड प्लेनेट’ की खोज की है, जिसकी सतह पिघले लावा से भरी है और वहां का तापमान 1900°C तक पहुंच जाता है.

वैज्ञानिकों ने खोजा अजीब ग्रह, हमेशा ‘पिघला हुआ’ रहता है, तापमान 1900°C, सड़े अंडों जैसी आती है बदबू!
वैज्ञानिक भी हैरान! मिला ऐसा ग्रह जो हमेशा पिघली हुई हालत में रहता है

अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों ने एक बेहद अनोखे ग्रह की खोज की है, जो हमेशा पिघली हुई अवस्था में रहता है. इस नए तरह के ग्रह को वैज्ञानिक 'लिक्विड प्लेनेट' की नई श्रेणी में रख रहे हैं. शोध के अनुसार, इस ग्रह की पूरी सतह लावा के महासागर जैसी है और वहां का तापमान लगभग 1900 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. इतना ही नहीं, वहां का वातावरण ऐसी गैसों से भरा है जिनसे सड़े अंडों जैसी बदबू आ सकती है.

35 प्रकाश वर्ष दूर मिला यह अनोखा ग्रह

वैज्ञानिकों ने जिस ग्रह की पहचान की है, उसका नाम L 98-59 d है. यह ग्रह पृथ्वी से करीब 35 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है. इस खोज में अहम भूमिका जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (james Webb Space Telescope) की रही, जो अब तक अंतरिक्ष में भेजा गया सबसे शक्तिशाली टेलीस्कोप माना जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक,यह ग्रह आकार और द्रव्यमान में पृथ्वी से थोड़ा बड़ा है. इसका आकार पृथ्वी से लगभग 1.63 गुना और द्रव्यमान करीब 1.64 गुना बताया गया है.

पूरी सतह पर लावा का महासागर

Harrison Nicholls के अनुसार यह ग्रह 'मोलासेस' यानी गाढ़े तरल पदार्थ जैसा है. इसकी सतह और अंदरूनी हिस्सा पिघले हुए सिलिकेट से बना है, जिससे ऐसा लगता है मानो पूरे ग्रह पर लावा का महासागर फैला हो. इस ग्रह पर आसपास के अन्य ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण इतना प्रभाव डालता है कि वहां मौजूद लावा महासागर में विशाल लहरें उठती रहती हैं.

सड़े अंडों जैसी गंध वाला वातावरण

इस ग्रह का वातावरण भी काफी अलग है. यहां की हवा में हाइड्रोजन सल्फाइड गैस की मात्रा बहुत ज्यादा है. यही गैस सड़े हुए अंडों जैसी तेज बदबू के लिए जिम्मेदार होती है. इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कोई वहां जाए तो उसे बेहद तीखी गंध महसूस होगी.

क्यों हमेशा पिघला रहता है यह ग्रह

आमतौर पर ग्रह अपने बनने के शुरुआती समय में पिघली हुई अवस्था में होते हैं, लेकिन बाद में ठंडे होकर ठोस बन जाते हैं. पृथ्वी भी अरबों साल पहले इसी तरह पिघली हुई थी, लेकिन समय के साथ ठंडी हो गई. हालांकि, L 98-59 d अभी भी पिघली अवस्था में है. वैज्ञानिकों के अनुसार, इसका कारण रनअवे ग्रीनहाउस इफेक्ट और पड़ोसी ग्रहों से मिलने वाली टाइडल हीटिंग है. इसकी मोटी और गर्म वायुमंडलीय परत गर्मी को बाहर निकलने नहीं देती.

जीवन की संभावना बेहद कम

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के ग्रह पर जीवन की संभावना लगभग नहीं के बराबर है. हालांकि, यह खोज अंतरिक्ष में मौजूद ग्रहों की विविधता को समझने में बहुत मददगार है. यह खोज यह भी संकेत देती है कि जिन ग्रहों को पहले 'वॉटर वर्ल्ड' यानी पानी से भरे ग्रह माना जाता था, उनमें से कई वास्तव में ऐसे लावा से भरे 'मश' ग्रह भी हो सकते हैं.

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