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This Article is From Mar 13, 2026

कहां खो जाते हैं पुराने सैटेलाइट? जानिए 'ग्रेवयार्ड ऑर्बिट' और अंतरिक्ष के अनोखे 'कब्रिस्तान' का रहस्य

अंतरिक्ष में काम खत्म होने के बाद पुराने सैटेलाइट का क्या होता है? जानिए ‘ग्रेवयार्ड ऑर्बिट’ और प्रशांत महासागर के स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान का रहस्य, जहां भेजे जाते हैं पुराने अंतरिक्ष यान.

कहां खो जाते हैं पुराने सैटेलाइट? जानिए 'ग्रेवयार्ड ऑर्बिट' और अंतरिक्ष के अनोखे 'कब्रिस्तान' का रहस्य
पुराने सैटेलाइट जाते कहां हैं? जानिए अंतरिक्ष के ‘कब्रिस्तान’ का रहस्य

अंतरिक्ष में हजारों सैटेलाइट काम कर रहे हैं, लेकिन हर मशीन की तरह ये भी हमेशा नहीं चलते. मौसम की निगरानी, ग्रीनहाउस गैस मापन या दूर के तारों का अध्ययन करने वाले सैटेलाइट आखिरकार पुराने हो जाते हैं, खराब हो जाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है पुराने सैटेलाइट के साथ क्या होता है? क्या वे अंतरिक्ष में ही घूमते रहते हैं या उनका कोई अंत होता है?

पुराने सैटेलाइट के साथ क्या होता है?

ज्यादातर मामलों में दो मुख्य तरीके अपनाए जाते हैं, जो सैटेलाइट की ऊंचाई पर निर्भर करते हैं. पहला तरीका कम ऊंचाई वाली कक्षाओं यानी लो अर्थ ऑर्बिट के लिए है. इसमें इंजीनियर सैटेलाइट में बचे हुए थोड़े ईंधन का इस्तेमाल करके उसकी गति धीमी कर देते हैं. इससे सैटेलाइट अपनी कक्षा से नीचे आ जाता है और पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जाता है. बहुत तेज गति से गिरते हुए हवा के घर्षण से इतनी गर्मी पैदा होती है कि सैटेलाइट पूरी तरह जलकर राख हो जाता है. छोटे सैटेलाइट के लिए यह आसान और सुरक्षित तरीका है, कोई मलबा जमीन पर नहीं पहुंचता. लेकिन बड़े सैटेलाइट, अंतरिक्ष स्टेशन या अन्य बड़े यान पूरी तरह नहीं जल पाते. ऐसे में नियंत्रित तरीके से उन्हें गिराया जाता है ताकि मलबा सुरक्षित जगह पर गिरे.

अंतरिक्ष यान का कब्रिस्तान

इसके लिए प्रशांत महासागर में एक खास इलाका चुना जाता है, जिसे 'स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान' या 'अंतरिक्ष यान का कब्रिस्तान' कहते हैं. यह जगह पॉइंट निमो के आसपास है, जो पृथ्वी पर सबसे दूरस्थ समुद्री क्षेत्र है. यहां से जमीन की दूरी लगभग 2,600 किलोमीटर से ज्यादा है. न्यूजीलैंड से हजारों किलोमीटर दूर होने के कारण जहाज बहुत कम आते हैं, इसलिए कोई खतरा नहीं. मिर स्पेस स्टेशन, कई साल्यूट स्टेशन और अन्य बड़े यान इसी जगह पर गिराए गए हैं.

ये सैटेलाइट हजारों साल तक वहीं घूमते रह सकते हैं

वहीं, दूसरा तरीका ऊंची कक्षाओं जैसे जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के लिए है. यहां सैटेलाइट को पृथ्वी की ओर वापस लाने के लिए बहुत ज्यादा ईंधन चाहिए. इसलिए इंजीनियर उन्हें और दूर, 'ग्रेवयार्ड ऑर्बिट' या 'कब्रिस्तान वाली कक्षा' में भेज देते हैं. यह कक्षा सामान्य जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से 200-300 किलोमीटर या इससे ज्यादा ऊपर होती है, लगभग 36 हजार किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर होती है. यहां सैटेलाइट सुरक्षित रहते हैं, सक्रिय सैटेलाइट से टकराव का खतरा कम होता है. ये सैटेलाइट हजारों साल तक वहीं घूमते रह सकते हैं.

पुराने सैटेलाइट हटाना जरूरी क्यों है?

सवाल यह भी है कि आखिरकार पुराने सैटेलाइट हटाना जरूरी क्यों है? अमेरिकी स्पेस एजेंसी के अनुसार, आज पृथ्वी की कक्षा में कई सक्रिय सैटेलाइट हैं, साथ ही लाखों टुकड़े कबाड़ या स्पेस डेब्री हैं. ये टुकड़े काम कर रहे सैटेलाइट या अंतरिक्ष यानों से टकरा सकते हैं. एक टक्कर से और ज्यादा टुकड़े बनते हैं, जो और टक्कर पैदा करते हैं यह चेन रिएक्शन 'केसलर सिंड्रोम' या 'केसलर इफेक्ट' कहलाता है. अगर यह शुरू हुआ तो कुछ कक्षाएं इस्तेमाल के लायक नहीं रहेंगी, संचार, जीपीएस, मौसम पूर्वानुमान सब प्रभावित होंगे.

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