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माता सती के मुकुट से गिरा था रत्न, बांग्लादेश में शक्तिपीठ और हिंदू मंदिरों की अनसुनी कहानी

हम आपको बताएंगे बांग्लादेश के उन ऐतिहासिक मंदिरों के बारे में जो आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. सदियों पुराने शक्तिपीठों के इतिहास से लेकर वर्तमान की दर्दनाक सच्चाई तक, जानिए बांग्लादेश में प्राचीन हिंदू मंदिरों के बारे में सबकुछ...

माता सती के मुकुट से गिरा था रत्न, बांग्लादेश में शक्तिपीठ और हिंदू मंदिरों की अनसुनी कहानी
बांग्लादेश में शक्तिपीठ और हिंदू मंदिरों की अनसुनी कहानी

Bangladesh Hindu temples: बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर पिछले कुछ समय से कई हिंसक हमले और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं. सोमवार रात एक और सनसनीखेज वारदात सामने आई, जिसमें नरसिंदी जिले के पोलाश उपजिला क्षेत्र में एक हिंदू दुकानदार की बेरहमी से हत्या कर दी गई. इस घटना के साथ ही बीते कुछ दिनों में मारे गए हिंदुओं की संख्या 6 हो गई है, जिससे देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. ये आंकड़ा उन मौतों का है, जो किसी न किसी तरह सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं, जबकि बांग्‍लादेश में हिंदुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है. 

इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे बांग्लादेश के उन ऐतिहासिक मंदिरों के बारे में जो आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. सदियों पुराने शक्तिपीठों के इतिहास से लेकर वर्तमान की दर्दनाक सच्चाई तक, जानिए बांग्लादेश में प्राचीन हिंदू मंदिरों के बारे में सबकुछ...

1- ढाकेश्वरी मंदिर 

ढाकेश्वरी राष्ट्रीय मंदिर बांग्लादेश के पुराने ढाका में स्थित एक हिंदू मंदिर है. इसे बांग्लादेश का 'राष्ट्रीय मंदिर' होने का गौरव प्राप्त है. 'ढाकेश्वरी' नाम का अर्थ है 'ढाका की देवी'. बांग्लादेश विश्व का एकमात्र मुस्लिम बहुल देश है जहां एक राष्ट्रीय हिंदू मंदिर है. यह सबसे पवित्र शाक्त पीठों में से एक है जहां देवी सती के मुकुट का रत्न गिरा था, लेकिन वह रत्न बहुत पहले खो गया था और बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों पर बढ़ते हमलों के कारण विभाजन के समय मुख्य पुजारी द्वारा मुख्य प्राचीन विग्रह या पत्थर की मूर्ति को पश्चिम बंगाल के कुमोरटुली में स्थानांतरित कर दिया गया था.

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2- यशोरेश्वरी शक्तिपीठ

यशोरेश्वरी शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है, जो वर्तमान बांग्लादेश के खुलना जिले के ईश्वरीपुर गांव में स्थित है, जहां माता सती की बायीं हथेली गिरी थी, इसलिए इसे 'यशोरेश्वरी' कहते हैं, और यहां के भैरव को 'चंद्र' कहा जाता है, और यह बांग्लादेश का एक महत्वपूर्ण और प्राचीन तीर्थस्थल है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद और अधिक प्रसिद्धि मिली.

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3- भवानीपुर शक्ति पीठ 

यह क्षेत्र एक प्रमुख शक्ति पीठ के रूप में प्राचीन हिंदू मान्यताओं से जुड़ा हुआ है, जहां देवी की पूजा होती है. यह 51 शक्तिपीठों में से एक है (देवी सती की बाईं पायल गिरने की मान्यता). यह शाक्त परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है. यह मंदिर में बोघरा में स्थित है.   

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4- सुगंधा शक्तिपीठ 

बांग्लादेश के शिकारपुर में बरिसल या बरीसाल से उत्तर में 21 किमी दूर शिकारपुर नामक गांव में सुनंदा नदी (सोंध) के किनारे स्थित है मां सुगंध, जहां माता की नासिका गिरी थी. इसकी शक्ति है सुनंदा और भैरव या शिव को त्र्यंबक कहते हैं. यहां का मंदिर उग्रतारा के नाम से विख्‍यात है. मंदिर की पत्थर की दीवारों पर भी देवी-देवताओं के चित्र उत्कीर्ण हैं. मंदिर के परिसर को देखकर समझा जा सकता है कि मंदिर बहुत ही प्राचीन है.

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5- महालक्ष्मी शक्ति पीठ

बांग्लादेश में महालक्ष्मी शक्ति पीठ सिलहट के पास जॉइनपुर गांव में स्थित है, जहां माना जाता है कि देवी सती का गला गिरा था, जिससे यह हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल बन गया है, जिसे स्थानीय रूप से श्री श्री महालक्ष्मी भैरबी गर्भ महा पीठ के रूप में जाना जाता है, जहां उनकी पूजा महालक्ष्मी के रूप में की जाती है और उनके भैरव संबरानंद हैं, जिन्हें अक्सर बिना छत वाली एक चट्टान (शिला) के रूप में पूजा जाता है, जो खुले में रहने की उनकी इच्छा का प्रतीक है.

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6- चट्टल मां भवानी शक्तिपीठ 

बांग्लादेश के चटगांव जिले के सीताकुंड में चंद्रनाथ पहाड़ी पर स्थित है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है; यहां माता सती की दाहिनी भुजा गिरी थी और उन्हें 'भवानी' के रूप में पूजा जाता है, जबकि भैरव 'चंद्रशेखर' हैं, और यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, जहां कई पवित्र कुंड भी हैं.

7- स्रवानी शक्तिपीठ (या सर्वाणी शक्तिपीठ) 

भारत और बांग्लादेश में दो प्रमुख स्थानों से जुड़ा है: बांग्लादेश के चटगांव जिले के कुमीरा में एक पीठ जहां देवी सती की रीढ़ गिरी थी, और तमिलनाडु के कन्याकुमारी में भी एक ऐसा स्थान है जहां देवी भगवती की पूजा की जाती है, जो तंत्र साधना के लिए महत्वपूर्ण है, और इसे भी स्रवानी या श्रावणी शक्तिपीठ कहा जाता है, जहां देवी को सर्वाणी/श्रावणी कहते हैं और भैरव निमिषवैभव हैं.

8- अपर्णा शक्तिपीठ 

बांग्लादेश के शेरपुर जिले के भवानीपुर गांव में करतोया नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है, जहां देवी सती के बाएं पैर की पायल गिरी थी, और यहां माता अपर्णा (भवानी/काली) की पूजा होती है, जिनके भैरव वामन हैं; यह स्थान चर्म रोगों से मुक्ति और आध्यात्मिक शांति के लिए प्रसिद्ध है और बांग्लादेश के प्रमुख हिन्दू तीर्थस्थलों में से एक है.

9- जयंती शक्तिपीठ

बांग्लादेश का जयंती शक्तिपीठ, सिलहट जिले के कनाईघाट के बौरबाग गांव में स्थित है, जहां पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी सती की बाईं जांघ गिरी थी, और यह 51 शक्तिपीठों में से एक है. यह प्राचीन स्थल, जो पहले जयंतिया साम्राज्य का हिस्सा था, अब श्रीहट्टा (वर्तमान सिलहट) से लगभग 43 किमी दूर है और इसे 'बाम जंघा पीठ' या 'फलिज़ुर कालीबाड़ी' के नाम से भी जाना जाता है, जहां देवी जयंती और भैरव क्रमादिश्वर की पूजा होती है.

10- रमना काली मंदिर 

यह जानकारी बिल्कुल सही है कि 1971 में पाकिस्तानी सेना द्वारा 'ऑपरेशन सर्चलाइट' के दौरान इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया गया था. रत सरकार की सहायता से इसे हाल के वर्षों में पुनर्जीवित और पुनर्निर्मित किया गया है. यह मंदिर ढाका के रमना क्षेत्र में है. इसका निर्माण 16वीं शताब्दी में मुगल काल में किया गया था. यह मंदिर भारत-बांग्लादेश विभाजन से पहले का एक प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थल रहा है. 1971 के मुक्ति संघर्ष के दौरान इसे नष्ट करने का दर्दनाक इतिहास भी है. धार्मिक संघर्षों के इतिहास के कारण यह स्थान आज भी याद किया जाता है.

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11- महिलारा सरकार मठ

यह बरिशाल में 18वीं शताब्दी का एक मठ है, जो अपनी वास्तुकला के लिए जाना जाता है. 18वीं सदी के दौरान अलिवर्दी खान के समय निर्मित यह मंदिर प्राचीन शिखर शैली का हिन्दू धार्मिक स्थल है और पुरातात्त्विक दृष्टि से संरक्षित है. वर्तमान में संरक्षण के तहत है, लेकिन भीड़-भाड़ और सांस्कृतिक तनाव के दौर में इसकी सुरक्षा और संरक्षण की आवश्यकता बनी हुई है.

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