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150 साल पुरानी फोटो ने खोली अमेरिकी इतिहास की परतें, तस्वीर में सबके नाम थे, बस इस लड़की का नहीं!

1868 में खींची गई एक ऐसी ही तस्वीर, जिसमें एक छोटी-सी मूल अमेरिकी लड़की ताकतवर सरकारी अफसरों के बीच खड़ी है, आज डेढ़ सौ साल बाद फिर चर्चा में है.

150 साल पुरानी फोटो ने खोली अमेरिकी इतिहास की परतें, तस्वीर में सबके नाम थे, बस इस लड़की का नहीं!
150 साल पुरानी फोटो ने खोली अमेरिकी इतिहास की परतें

अक्सर तस्वीरों को इतिहास का सच मान लिया जाता है, लेकिन क्या हर तस्वीर पूरी कहानी कहती है? 1868 में खींची गई एक ऐसी ही तस्वीर, जिसमें एक छोटी-सी मूल अमेरिकी लड़की ताकतवर सरकारी अफसरों के बीच खड़ी है, आज डेढ़ सौ साल बाद फिर चर्चा में है. एक नई किताब ने इस तस्वीर के पीछे छिपे इतिहास और उस अनाम लड़की की असली पहचान को सामने लाने की कोशिश की है.

1868 की वह ऐतिहासिक तस्वीर

यह तस्वीर मशहूर फोटोग्राफर अलेक्जेंडर गार्डनर ने खींची थी, जिन्हें अमेरिकी गृहयुद्ध के दौर के सबसे बड़े फोटोग्राफरों में गिना जाता है. उन्होंने अब्राहम लिंकन का प्रसिद्ध पोर्ट्रेट और युद्ध में मारे गए सैनिकों की दिल दहला देने वाली तस्वीरें भी खींची थीं. 1868 में गार्डनर डकोटा टेरिटरी के फोर्ट लैरामी पहुंचे थे, जहां अमेरिकी सरकार और लकोटा समेत कई जनजातियों के बीच संधि वार्ताएं चल रही थीं. वहीं उन्होंने यह ग्रुप फोटो खींची, छह अमेरिकी सरकारी शांति आयुक्त और उनके बीच एक छोटी मूल अमेरिकी लड़की.

सबके नाम, बस लड़की अनजान

तस्वीर में खड़े सभी पुरुषों के नाम दर्ज हैं. इनमें जनरल विलियम टेकमसेह शेरमन भी शामिल हैं, जो अमेरिकी गृहयुद्ध के बड़े सैन्य कमांडर रहे और अटलांटा को जलाने व जॉर्जिया मार्च के लिए जाने जाते हैं. लेकिन तस्वीर के बीच खड़ी उस लड़की का नाम कहीं नहीं है. उसे सिर्फ एक सामान्य जनजातीय पहचान के तौर पर दर्ज किया गया. यही चुप्पी इस तस्वीर को रहस्यमयी बना देती है.

किताब जिसने बदली तस्वीर की कहानी

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित नई किताब 'द गर्ल इन द मिडिल: ए रिकवर्ड हिस्ट्री ऑफ द अमेरिकन वेस्ट' में इतिहासकार मार्था ए. सैंडवाइस ने इसी एक तस्वीर को केंद्र में रखकर पूरा इतिहास टटोल डाला. उनका सवाल सीधा था- यह लड़की कौन थी? वह वहां क्यों थी? और उसकी जिंदगी हमें उस दौर के अमेरिका के बारे में क्या बताती है?

सामने आई लड़की की असली पहचान

गहरे शोध, सरकारी दस्तावेजों, कानूनी रिकॉर्ड्स, पारिवारिक इतिहास और संस्मरणों के आधार पर सैंडवाइस इस नतीजे पर पहुंचती हैं कि तस्वीर में दिख रही लड़की का नाम सोफी मूसो था. तस्वीर खींचे जाने के वक्त वह करीब आठ साल की थी. उसकी जिंदगी अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद से लेकर ग्रेट डिप्रेशन तक फैली, एक ऐसा दौर जो मूल अमेरिकी समुदायों के लिए उथल-पुथल, हिंसा और विस्थापन से भरा था.

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सोफी मूसो की दर्दभरी कहानी

किताब में सोफी की जिंदगी की परतें खोली गई हैं. उसके पहले पति ने परिवार के दो सदस्यों की हत्या कर दी. बाद में वही व्यक्ति स्थानीय इतिहास में 'पायनियर' कहलाया. उसके बच्चों को जबरन गोरे समाज में पाला गया. जबकि सोफी को ग्रेट सिउक्स रिजर्वेशन भेज दिया गया. उसकी दूसरी शादी भी नस्ल, पहचान और समाज के दबावों से जुड़ी जटिल कहानी कहती है.

क्या तस्वीरें पूरा सच बताती हैं?

मार्था सैंडवाइस इस किताब में यह भी सवाल उठाती हैं कि क्या तस्वीरों को इतिहास का अंतिम सच मान लेना सही है. उनके मुताबिक, 'तस्वीरें इतिहास नहीं होतीं, वे सिर्फ एक पल को रोक देती हैं. असली इतिहास उस पल से पहले और बाद में घटने वाली घटनाओं में छिपा होता है. वह कहती हैं कि इस तस्वीर में कोई 'निर्णायक क्षण' नहीं है, बल्कि यह इतिहास की एक बूंद है, जिसे समझने के लिए समय की पूरी नदी को देखना जरूरी है.

आज क्यों जरूरी है यह कहानी?

यह किताब सिर्फ एक लड़की की पहचान नहीं बताती, बल्कि अमेरिकी पश्चिम के उस दौर की सच्चाई उजागर करती है, जहां सत्ता, हिंसा और पहचान ने लाखों जिंदगियों को प्रभावित किया. एक अनाम चेहरा, जिसे इतिहास ने नजरअंदाज कर दिया था, अब पूरी सदी की कहानी कह रहा है.

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संज्ञा सिंह
Chief Sub Editor
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