आप बस कल्पना कीजिए कि एक ऐसा डायनासोर जो इतना बड़ा था कि अगर वह अपने खुद के ही अंडों पर बैठ जाता, तो अंडों से ऑमलेट बन जाता! तो फिर सवाल कि अगर यह अपने अंडों पर नहीं बैठ सकता था तो फिर उसको गर्म किए बिना उसमें से बच्चे कैसे निकलते थे. इससे भी हैरानी की बात यह है कि अबतक इस डायनासोर के ज्यादातर अंडे और अंडों के छिलके भूमध्य रेखा के पास के गर्म इलाकों में मिले थे. लेकिन अब यह ठंडे इलाकों में भी मिले हैं तो सवाल और जटिल हो गया है. बात दुनिया के सबसे बड़े डायनासोर टाइटनोसॉर की हो रही है, जिसके अर्जेंटीना में मिले बड़ी संख्या में अंडों की स्टडी से वैज्ञानिक हैरान रह गए हैं.
CNN की रिपोर्ट के अनुसार स्टडी से पता चला है कि धरती पर रहने वाले सबसे बड़े डायनासोर टाइटनोसॉर भूमध्य रेखा से बहुत दूर, यानी ठंडे इलाकों में भी बच्चे पैदा कर सकते थे. ऐसे में उन्होंने अपने अंडों को गर्म रखने का एक खास तरीका अपनाया था. दरअसल आमतौर पर टाइटनोसॉर और दूसरे डायनासोर के ज्यादातर अंडे गर्म इलाकों में मिले हैं. वहां ज्यादा गर्मी होने की वजह से अंडों को गर्म रखना आसान होता था.
ठंडे इलाकों में कैसे गर्म रखते थे अंडे?
वैज्ञानिकों का मानना है कि टाइटनोसॉर की गर्दन लंबी थी, उनका दिमाग छोटा था और वे पौधे खाते थे. वे सॉरोपोड नाम के डायनासोर के एक बड़े समूह का हिस्सा थे. माना जाता है कि ये विशाल डायनासोर झुंड में रहते थे और लंबी दूरी तक जाते थे. वे हजारों साल तक एक ही जगह पर अंडे देने के लिए वापस आते रहे होंगे.
CNN की रिपोर्ट के अनुसार अल्बर्टा की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी की पेलियंटोलॉजिस्ट और एसोसिएट प्रोफेसर डार्ला जेलेनित्स्की ने कहा कि वैज्ञानिकों को पता है कि टाइटनोसॉर की हड्डियां अंटार्कटिका और दक्षिणी अर्जेंटीना जैसे बहुत दक्षिणी इलाकों से लेकर मंगोलिया और टेक्सास जैसे बहुत उत्तरी इलाकों तक मिली हैं. जेलेनित्स्की इस नई रिसर्च की मुख्य लेखकों में से एक हैं. यह रिसर्च मंगलवार को रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस नाम की मैगजीन में प्रकाशित हुई.
लेकिन अंडों को विकसित होने और उनसे बच्चे निकलने के लिए तो गर्मी की जरूरत होती है, और ऊंचे अक्षांशों पर सूरज की रोशनी कम मिलती है. वहां ठंड रहती है. लेकिन इस स्टडी से पता चलता है कि टाइटैनोसॉर ने धरती के सबसे दक्षिणी इलाकों में कम तापमान से निपटने का तरीका ढूंढ लिया था. प्रोफेसर जेलेनित्स्की ने बताया कि सबसे ज्यादा संभावना यही है कि ये टाइटैनोसॉर पेड़-पौधों और मिट्टी से बने टीले जैसे घोंसलों में अंडे देते थे. जहां अंडों को सेने के लिए जरूरी गर्मी ज्यादातर सड़ते हुए पेड़-पौधों से मिलती थी.
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