- कुल आबादी में आत्महत्या के मामलों में दस प्रतिशत की कमी आई है और यह संख्या एक हजार उनतीस दर्ज की गई है
- 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र के बुजुर्गों में सुसाइड केस सबसे अधिक पाए गए, जो कुल केस का एक चौथाई से ज्यादा हैं
- प्रोफेसर पॉल यिप ने माता-पिता से बच्चों की उम्मीदों को काबू में रखने और नतीजों पर संयम रखने का सुझाव दिया है
हॉन्गकॉन्ग के कोरोनर कोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में 10-19 वर्ष आयु वर्ग में आत्महत्या के मामलों की संख्या पिछले 10 वर्षों में सबसे अधिक रही. रिपोर्ट में अच्छी बात ये है कि कुल आबादी में आत्महत्या के मामलों में 10 प्रतिशत की कमी आई और यह संख्या 1,019 हो गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट द्वारा पुष्टि किए गए आत्महत्या के मामलों में लगभग सभी उम्र के लोगों में कमी आई, सिवाय 10 से 19 साल की उम्र वालों के. पिछले साल, 10 से 19 साल की उम्र के 46 किशोरों ने आत्महत्या की; यह संख्या पिछले साल के 34 मामलों से ज्यादा थी और पिछले दस सालों में सबसे ज़्यादा रही. इनमें से ज्यादातर मौतें ऊंचाई से गिरने के कारण हुईं. 10 साल से कम उम्र की एक लड़की ने भी अपनी जान दे दी.
बुजुर्ग क्यों कर रहे सुसाइड
70 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोग सबसे ज्यादा जोखिम वाले ग्रुप में रहे, जिनमें 257 मामले सामने आए, जो कुल मामलों का एक-चौथाई से भी ज्यादा था. इसके बाद 60 से 69 साल की उम्र के लोग थे, जिनमें आत्महत्या से 179 मौतें दर्ज की गईं. आत्महत्या से हुई मौतों की कुल रिपोर्ट में पुरुषों की हिस्सेदारी 64 प्रतिशत थी, जो 2024 में दर्ज 67 प्रतिशत से थोड़ी कम है.
कुल मिलाकर, 70 साल या उससे ज्यादा उम्र के पुरुषों में मौतों की संख्या सबसे ज्यादा रही, और उसके बाद 50 से 60 साल की उम्र के पुरुषों का नंबर आता है. विशेषज्ञों ने बुजुर्गों के सुसाइड की वजह निजी रिश्ते को संभाल नहीं सकना बताया है.
युवाओं का हाल डराने वाला
हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी के जॉकी क्लब सेंटर फॉर सुसाइड रिसर्च एंड प्रिवेंशन के प्रोफेसर पॉल यिप सिउ-फाई ने कहा कि कुछ आत्महत्याएं बिना किसी शुरुआती संकेत के अचानक हो सकती हैं, लेकिन ऐसा माहौल बनाना जरूरी है, जिसमें युवाओं की सच में परवाह की जाए और उन्हें वैसा ही स्वीकार किया जाए जैसे वे हैं, क्योंकि कई युवा "गहरी निराशा" महसूस करते हैं. उन्होंने कहा, "युवाओं के सुसाइड नोट से हमें पता चलता है कि उनमें लक्ष्यों की कमी नहीं होती. बल्कि, उनके लक्ष्य अक्सर माता-पिता की उम्मीदों से मेल नहीं खाते. वे दूसरों की उम्मीदों के बोझ तले जीने का विरोध तो करते हैं, लेकिन अपनी परिस्थितियों को बदलने या माता-पिता के प्रभाव से बाहर निकलने में खुद को असमर्थ पाते हैं. इस गहरे तालमेल की कमी के कारण कई लोग बहुत ज्यादा पछतावा महसूस करते हैं."
पैरेंट्स के लिए सलाह
अगले बुधवार को यूनिवर्सिटी एंट्रेंस एग्जाम के नतीजे आने वाले हैं, इसलिए यिप ने माता-पिता से अपनी उम्मीदों को काबू में रखने की अपील की. उन्होंने कहा, "अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक न हों तो माता-पिता को अपने बच्चों को बुरा-भला नहीं कहना चाहिए, और न ही अच्छे नतीजों का श्रेय खुद लेना चाहिए – क्योंकि इसका उनसे शायद ही कोई लेना-देना होता है." यिप ने आगे कहा कि हो सकता है कि कोरोनर की रिपोर्ट में आत्महत्या के सभी मामले शामिल न हों क्योंकि मामलों को संभालने में समय लग सकता है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि सितंबर में उनके अपने अनुमान मॉडल का इस्तेमाल करके डेटा का जो विश्लेषण जारी किया जाएगा, उसमें भी इसी तरह का ट्रेंड दिखेगा.
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